सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, July 30, 2010

"मैं क्या चाहती हूं ?" शुक्रिया आशा जी इस कविता के लिये । आप प्रेरणा हैं हमारी पीढ़ी की .

लोग कहते हैं नयी लडकियां आजादी कि बात करती हैं और पता नहीं किस से आज़ादी चाहती हैं । कौन हैं नयी लड़कियों कि प्रेरणा । वो माँ जो आज उम्र के उस पढाव पर खड़ी हैं जहाँ उसको नानी / दादी कहते हैं । आशा मेम मे मैने वो प्रेरणा देखी हैं वो आग देखी हैं जो नयी लड़कियों मे आजाये तो समाज मे बदलाव आते देर नहीं लगेगी ।
आशा जी कि कविताओं मे मुझे वो सब दिखता हैं जो समाज को बदलने का आवाहन । शुक्रिया आशा जी इस कविता के लिये । आप प्रेरणा हैं हमारी पीढ़ी की . आशा जी के ब्लॉग का लिंक हैं

मैं क्या चाहती हूं ?


मुझे अपना ब्याह रचाना है ,
यह भली भांति जानती हूं ,
पर मैं कोई गाय नहीं कि ,
किसी भी खूंटे से बांधी जाऊं
ना ही कोई पक्षी हूं ,
जिसे पिंजरे में रखा जाए ,
मैं गूंगी गुड़िया भी नहीं ,
कि चाहे जिसे दे दिया जाए ,
मैं ऐसा सामान नहीं ,
कि बार बार प्रदर्शन हो ,
जिसे घरवालों ने देखा ,
वह मुझे पसंद नहीं आया ,
मैं क्या हूं क्या चाहती हूं ,
यह भी न कोई सोच पाया ,
ना ही कोई ब्यक्तित्व है ,
और ना ही बौद्धिकस्तर ,
ना ही भविष्य सुरक्षित उसका
फिर भी घमंड पुरुष होने का ,
अपना वर्चस्व चाहता है ,
जो उसके कहने में चले,
ऐसी पत्नी चाहता है ,
पर मैं यह सब नहीं चाहती ,
स्वायत्वता है अधिकार मेरा ,
जिसे खोना नहीं चाहती ,
जागृत होते हुए समाज में ,
कुछ योगदान करना चाहती हूं ,
उसमे परिवर्तन लाना चाहती हूं ,
वरमाला मैं तभी डालूंगी ,
यदि किसी को अपने योग्य पाऊँगी |


आशा



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Thursday, July 22, 2010

अब तो जागो

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कब तक तुम
अपने अस्तित्व को
पिता या भाई
पति या पुत्र
के साँचे में ढालने के लिये
काटती छाँटती
और तराशती रहोगी ?
तुम मोम की गुड़िया तो नहीं !

कब तक तुम
तुम्हारे अपने लिये
औरों के द्वारा लिये गए
फैसलों में
अपने मन की अनुगूँज को
सुनने की नाकाम कोशिश
करती रहोगी ?
तुम गूंगी तो नहीं !

कब तक तुम
औरों की आँखों में
अपने अधूरे सपनों की
परछाइयों को
साकार होता देखने की
असफल और व्यर्थ सी
कोशिश करती रहोगी ?
नींदों पर तुम्हारा भी हक है !

कब तक तुम
औरों के जीवन की
कड़वाहट को कम
करने के लिये
स्वयम् को पानी में घोल
शरबत की तरह
प्रस्तुत करती रहोगी ?
क्या तुम्हारे मन की
सारी कड़वाहट धुल चुकी है ?
तुम कोई शिव तो नहीं !

कब तक तुम
औरों के लिये
अपना खुद का वजूद मिटा
स्वयं को उत्सर्जित करती रहोगी ?

क्यों ऐसा है कि
तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं?
तुम्हारी कोई राय नहीं ?
तुम्हारा कोई निर्णय नहीं ?
तुम्हारा कोई सम्मान नहीं ?
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं ?
तुम्हारा कोई हमदर्द नहीं ?
तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं ?

अब तो जागो
तुम कोई बेजान गुडिया नहीं
जीती जागती हाड़ माँस की
ईश्वर की बनायी हुई
तुम भी एक रचना हो
इस जीवन को जीने का
तुम्हें भी पूरा हक है !
उसे ढोने की जगह
सच्चे अर्थों में जियो !
अब तो जागो
नयी सुबह तुम्हें अपने
आगोश में समेटने के लिये
बाँहे फैलाए खड़ी है !
दैहिक आँखों के साथ-साथ
अपने मन की आँखें भी खोलो !
तुम्हें दिखाई देगा कि
जीवन कितना सुन्दर है !


साधना वैद

Wednesday, July 21, 2010

नन्ही परी

नन्ही परी
देख तेरे आंगन आई नन्ही परी
हर तरफ से देखो
वह प्रेम से भरी,
सुनकर उसकी कोयल सी आवाज
चला आये तू उस आगाज़
जहां वह खेल रही
देख तेरे अँागन आई नन्ही परी,
वह ले जाती तुझे   
 किसी और लोक में
जब होती वह
तेरी कोख में
तेज आवाज सुन
वह दुनिया से डरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी,
रौनक वह आँचल
में लेकर आई,
पास है उसके
चंचलता की झांई
जिसके छूकर
तू हो गई हरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी ..... रुचि राजपुरोहित 'तितली'

Friday, July 2, 2010

शुभकामना

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मैंने तुम्हारे लिए
एक खिड़की खोल दी है
ताकि तुम
स्वच्छंद हवा में,
अनंत आकाश में,
अपने नयनों में भरपूर उजाला भर कर ,
अपने पंखों को नयी ऊर्जा से सक्षम बना कर
क्षितिज के उस पार
इतनी ऊँची उड़ान भर सको
कि सारा विश्व तुम्हें देखता ही रह जाए !

मैंने तुम्हारे लिए
बर्फ की एक नन्हीं सी शिला पिघला दी है
ताकि तुम पहाड़ी ढलानों पर
अपना मार्ग स्वयम् बनाती हुई
पहले दरिया तक पहुँच जाओ
तदुपरांत उसके अनंत प्रवाह में मिल
सागर की अथाह गहराइयों में
अपने स्वत्व को समाहित कर
उससे एकाकार हो जाओ
और उसके उस अबूझे रहस्य का हिस्सा बन जाओ
जिसे सुलझाने में
सारा संसार सदियों से लगा हुआ है !

मैंने तुम्हारे लिए
तुम्हारे घर आँगन की क्यारी में
सौरभयुक्त सुमनों के कुछ बीज बो दिये हैं
ताकि तुम उनमें नियम से खाद पानी डाल
उन्हें सींचती रहो
और समय पाकर तुम्हारे उपवन में उगे
सुन्दर, सुकुमार, सुगन्धित सुमनों के सौरभ से
सारा वातावरण गमक उठे
और उस दिव्य सौरभ की सुगंध से
तुम अपने काव्य को भी महका सको
जिसे पढ़ कर सदियों तक लोग
मंत्रमुग्ध एवं मोहाविष्ट हो बैठे रह जाएँ !

मैंने तुम्हारे लिए
मन की वीणा के तारों को
एक बार फिर झंकृत कर दिया है
ताकि तुम उस वीणा के उर में बसे
अमर संगीत को
अपनी सुर साधना से जागृत कर सको
और दिग्दिगंत में ऐसी मधुर स्वर लहरी को
विस्तीर्ण कर सको
कि सारी सृष्टि उसके सम्मोहन में डूब जाए
और तुम उस दिव्य संगीत के सहारे
सातों सागर और सातों आसमानों को पार कर
सम्पूर्ण बृह्मांड पर अपने हस्ताक्षर चस्पाँ कर सको !
तथास्तु !


साधना वैद

Wednesday, June 30, 2010

हाँ मैं नारी हूँ !

सदियों से इस जगत में
पुनीता , पूजिता औ' तिरस्कृता
बनी और सब शिरोधार्य किया
कभी उन्हें दी सीख
औ' कभी मौत भी टारी हूँ ,
हाँ मैं नारी हूँ.
सदियाँ  गुजरी ,
बहुरूप मिले
विदुषी भी बनी
औ बनी नगरवधू
धैर्य  कभी न हारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
वनकन्या सी रही कभी,
कभी बंद कर दिया मुझे
सांस चले बस इतना सा
जीने को खुला था मुख मेरा
जीवित थी फिर भी
सौ   उन पर  मैं भारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
जीने की ललक मुझ में भी थी
जीवन मेरा सब जैसा था,
जुबान मेरे मुख में भी थी
पर बेजुबान बना दिया मुझे
बस उस वक्त की मारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
आज चली हूँ मर्जी से
आधी दुनिया में तूफान मचा
कैसे नकेल डालें इसको
जुगत कुछ ऐसी खोज रहे
कहीं बगावत बनी मौत
औ कहीं जीती मैं पारी हूँ,
हाँ मैं नारी  हूँ.
अब छोडो मुझे
जीने भी दो
तुम सा जीवन मेरा भी है
अपने अपने घर में झांको
मैं ही दुनियाँ सारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.

Wednesday, June 23, 2010

भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं

भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं

पहले हमारी बेटी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी पत्नी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी माँ बन कर वो
नाम पाती थी

अब वो अपना नाम खुद बनाती हैं
हमारे नाम के बिना भी
जीना चाहती हैं
अब इसको भटकाव ना कहे तो
क्या कहे ??

वो समानता की बात करती हैं
वो बदलाव की बात करती हैं
वो निज अस्तित्व की बात करती हैं
ये सब भटकाव नहीं तो और क्या हैं

भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं


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Friday, June 18, 2010

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ------ सुभद्राकुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़

महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झांसी में
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छायी झांसी में
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छायी
किंतु कालगति चुपके चुपके काली घटा घेर लायी
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भायी
रानी विधवा हुई, हाय विधि को भी नहीं दया आयी

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक समानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हर्षाया
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई बिरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट फिरंगी की माया
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों बात
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात
उदैपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

रानी रोयीं रनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
बहिन छबीली ने रण चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी
यह स्वतंत्रता की चिन्गारी अंतरतम से आई थी
झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

रानी बढ़ी कालपी आयी, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खायी रानी से हार
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

रानी गयी सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुष नहीं अवतारी थी
हमको जीवित करने आयी, बन स्वतंत्रता नारी थी

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी
यह तेरा बलिदान जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी
होये चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

सुभद्राकुमारी चौहान

Wednesday, June 2, 2010

ऐसा क्यों होता है !

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ऐसा क्यों होता है
जब भी कोई शब्द
तुम्हारे मुख से मुखरित होते हैं
उनका रंग रूप, अर्थ आकार,
भाव पभाव सभी बदल जाते हैं
और वे साधारण से शब्द भी
चाबुक से लगते हैं,
तथा मेरे मन व आत्मा सभी को
लहूलुहान कर जाते है !

ऐसा क्यों होता है
जब भी कोई वक्तव्य
तुम्हारे मुख से ध्वनित होता है
तुम्हारी आवाज़ के आरोह अवरोह,
उतार चढ़ाव, सुर लय ताल
सब उसमें सन्निहित उसकी
सद्भावना को कुचल देते है
और साधारण सी बात भी
पैनी और धारदार बन
उपालंभ और उलाहने सी
लगने लगती है
और मेरे सारे उत्साह सारी खुशी को
पाला मार जाता है !

ऐसा क्यों होता है
तुमसे बहुत कुछ कहने की,
बहुत कुछ बाँटने की आस लिये
मैं तुम्हारे मन के द्वार पर
दस्तक देने जब आती हूँ तो
‘प्रवेश निषिद्ध’ का बोर्ड लटका देख
हताश ही लौट जाती हूँ
और भावनाओं का वह सैलाब
जो मेरे ह्रदय के तटबंधों को तोड़ कर
बाहर निकलने को आतुर होता है
अंदर ही अंदर सूख कर
कहीं बिला जाता है !
और हम नदी के दो
अलग अलग किनारों पर
बहुत दूर निशब्द, मौन,
बिना किसी प्रयत्न के
सदियों से स्थापित
प्रस्तर प्रतिमाओं की तरह
कहीं न कहीं इसे स्वीकार कर
संवादहीन खड़े रहते हैं
क्योंकि शायद यही हमारी नियति है !

साधना वैद

Saturday, May 29, 2010

धनिया का सपना

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धनिया लेटी है अपनी खाट पर
देख रही है सुंदर सपना
सोच रही है इस दुनिया में
कोई तो होगा अपना,
वो खुश है आज, बहुत खुश
क्योंकि कुछ ही महीनों के बाद
वो बनने वाली है माँ
उसके मन में
माँ बनने की उमंग है
दिल में ममता की तरंग है,
सोच रही है
मेरे जैसी होगी मेरी बेटी
जो घूमेगी घर के आँगन में
रुनझुन-रुनझुन,
जो बोलेगी
अपनी तोतली बोली में
और कहेगी ‘माँ जला छुन
जब मेली छादी होदी न
सुंदल-सा दूल्हा आएदा
मैं दोली में बैठतल
अपनी छुछराल चली जाऊँदी !
पर माँ लोना नईं
जब तू बुलाएगी ना
मैं झत से दौलतल
तेरे पास चली आऊँगी
या फिल तुझे बुला लूँदी अपने पाछ !’
धनिया खुश थी मन ही मन
उसके दिल में
प्रसन्नता की हिलोरें उठ रही थीं
उसने पहले ही सोच लिया था
कि अपनी चाँद-सी बेटी को
पढ़ना सिखाऊँगी,
लिखना सिखाऊँगी
और उससे खत लिखवाऊँगी,
फिर मैं अपने मन की बात को
अपनी अम्मा और बापू तक
पहुँचा सकूँगी !
इन्हीं विचारों में उलझी
धनिया बड़ी बेसब्री से
सुबह होने का
कर रही थी इंतज़ार
सोच रही थी बारंबार
कल जब अल्ट्रासाउंड की
रिपोर्ट आएगी घर पर
तो खुश होंगे
मेरे साथ-साथ सभी परिवारी-जन
करेंगे इंतज़ार
नन्ही-सी परी के आने का !
पास-पड़ौस के सभी लोग
देने आएँगे बधाई
मेरे माँ-बापू भी मनाएँगे उत्सव
गाए जाएँगे मंगलगीत
मिलेगी मुझे सबकी प्रीत !
अपनी परी का नाम
रखूँगी चमेली जो बड़ी होकर बनेगी
अनोखी, अलबेली
रक्षाबंधन के दिन
भैया की सूनी कलाई पर
बाँधेगी राखी
भैया भी उसको
देगा रक्षा का वचन !
मेरे सपनों की परी
जब और बड़ी होगी
तो घर के कामों में
बटाएगी मेरा हाथ
मेरे थकने पर प्यार से
मेरा सिर सहलाएगी,
अपने दादी-बाबा की
वो बनेगी लाडली
घर में बनेगी सबकी दुलारी
दोपहर को खेत पर
अपने बापू के लिए
लेकर जाएगी रोटी
तब मेरे बुझे मन को
और थके तन को
मिलेगा थोड़ा-सा आराम
मुझे मिलेगा मेरा खोया हुआ
अपना ही सुंदर नाम !
यही सोचते-सोचते धनिया
न जाने कब सो गई
मीठे-मीठे सपनों में खो गई
मुँह अँधेरे ही वो उठकर बैठ गई
जब उठी तो थी बहुत
उल्लसित और प्रफुल्लित,
जल्दी-जल्दी कर रही थी
घर के सारे काम
कामों से निपटकर
वह बैठी ही थी
कि अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट लेकर
उसका पति मुँह लटकाए आया
समझ नहीं आ रहा था
उसकी उदासी का राज़
पूछने पर उसने बताया
‘रिपोर्ट नहीं है अच्छी’
सभी थे चिंतामग्न
सभी थे परेशान
अनहोनी की आशंका से
सब तरफ थी खामोशी ,चुप्पी
और सभी कर रहे थे इंतज़ार
रिपोर्ट को जानने का !
छाई हुई खामोशी को तोड़ते हुए
धनिया का पति बोला ¬–
‘ रिपोर्ट में तो लड़की बताई है ‘
घर के सभी सदस्यों ने
ठंडी साँस ली और बोले-
‘ इसमें चिंता की क्या बात है
अब तो हमारे देश ने
बड़ी उन्नति कर ली है ‘
घर के बुजुर्ग बोले-
‘ चिंता मतकर
डॉक्टर से मिलकर
इस आफत से मुक्ति पा लेंगे
इस बार नहीं
तो कोई बात नहीं
अगली बार
घर का चिराग पा लेंगे !’
पर किसी ने
उस माँ के दिल की पीड़ा को
न समझा, न जाना
न उसकी मन:स्थिति को पहचाना !
वह बुझी-सी, टूटी-सी
उठकर चली गई अंदर
और बहाती रही आँसू
वह अपने मन की टीस को
किसी से बाँट भी तो नहीं सकती
अपने मन की बात
किसी से कह भी तो नहीं सकती
कहेगी तो सुनेगा कौन
इसीलिए तो वो है मौन !
धनिया की आँखें निरंतर
बरस रही थीं झर-झर
मानो कह रही हों, सुनो,
समाज के कर्णधारो ! सुनो
समाज के सुधारको सुनो,
बेटों के चाहको सुनो न !
मेरा तो बस यही है कहना
ऐसे सोच को समाज के
दिलो-दिमाग से पूरी तरह
निकालकर फेंक दो न !
और उन सबको समझाओ
जो बेटी नहीं, चाहते हैं बेटा !
यदि देश में इसी तरह
सताई जाती रहेंगी बेटियाँ
होती होती रहेंगी भ्रूण हत्याएँ
तो एकदिन ऐसा आएगा
जब हमारे चारों ओर
होंगे केवल बेटे-ही-बेटे
दु:ख-दर्द को मिटाने वाली
बेटियाँ कहीं दूर तक
नज़र नहीं आएँगीं,
और एकदिन ऐसा आएगा
जब पुरुष रह जाएगा अकेला
अच्छा नहीं लगेगा
उसे दुनिया का मेला,
और फिर वह अकेले ही अकेले
ढोएगा जीवन का ठेला !


डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, May 21, 2010

मेरा होना या न होना

आज पढिये मुक्ति कि कविता

मेरा होना या न होना

मैं तभी भली थी
जब नहीं था मालूम मुझे
कि मेरे होने से
कुछ फर्क पड़ता है दुनिया को
कि मेरा होना, नहीं है
सिर्फ औरों के लिए
अपने लिए भी है.
मैं जी रही थी
अपने कड़वे अतीत,
कुछ सुन्दर यादों,
कुछ लिजलिजे अनुभवों के साथ
चल रही थी
सदियों से मेरे लिए बनायी गयी राह पर
बस चल रही थी ...
रास्ते में मिले कुछ अपने जैसे लोग
पढ़ने को मिलीं कुछ किताबें
कुछ बहसें , कुछ तर्क-वितर्क
और अचानक ...
अपने होने का एहसास हुआ
अब ...
मैं परेशान हूँ
हर उस बात से जो
मेरे होने की राह में रुकावट है...
हर वो औरत परेशान है
जो जान चुकी है कि वो है
पर, नहीं हो पा रही है अपनी सी
हर वो किताब ...
हर वो विचार ...
हर वो तर्क ...
दोषी है उन औरतों का
जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
कि उन्हें होना कुछ और था
और... कुछ और बना दिया गया ..

Tuesday, May 18, 2010

मन बाबरे

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आज मन ने
मेरी बात मानी है
आज समझा है वह,
नहीं गँवाएगा समय
व्यर्थ की बातें सोचने में,
जीवन में ऐसा तो
चलता ही रहता है
मतभेद, विवाद,
अतिवाद, या फिर....
यही तो है जीवन !
अब मुझे विगत बातों को
कभी नहीं सोचना
कुछ करना है ऐसा
जो समाज में
बने मिसाल,
बने नई पहचान !
इसलिए मन बावरे
तू आज मेरी बात को
ध्यान से सुन
और गुन
मत हो परेशान
बनाकर रख
अपना सम्मान !
यह तू जान ले
कि जो डरता है
दूसरों की ताकत से
वही डराता भी है दूसरों को !
इसलिए तू डर मत
निर्भय होकर
आगे बढ़
ऊँचाइयाँ चढ़
अनुभव की झालर में
नव जीवन गढ़ !

डॉ. मीना अग्रवाल

Sunday, May 16, 2010

मौन

मेरे मौन को तुम मत कुरेदो !
यह मौन जिसे मैंने धारण किया है
दरअसल मेरा कम और
तुम्हारा ही रक्षा कवच अधिक है !
इसे ऐसे ही अछूता रहने दो
वरना जिस दिन भी
इस अभेद्य कवच को
तुम बेधना चाहोगे
मेरे मन की प्रत्यंचा से
छूटने को आतुर
उलाहनों उपालम्भों
आरोपों प्रत्यारोपों के
तीक्ष्ण बाणों की बौछार
तुम सह नहीं पाओगे !
मेरे मौन के इस परदे को
ऐसे ही पड़ा रहने दो
दरअसल यह पर्दा
मेरी बदसूरती के
अप्रिय प्रसंगों से कहीं अधिक
तुम्हारी मानसिक विपन्नता की
उन बदरंग तस्वीरों को छुपाता है
जो अगर उजागर हो गयीं
तो तुम्हारी कलई खुल जायेगी
और तुम उसे भी कहाँ
बर्दाश्त कर पाओगे !
मेरे मौन के इस उद्दाम आवेग को
मेरे मन की इस
छिद्रविहीन सुदृढ़ थैली में
इसी तरह निरुद्ध रहने दो
वगरना जिस भी किसी दिन
इसका मुँह खुल जाएगा
मेरे आँसुओं की प्रगल्भ,
निर्बाध, तूफानी बाढ़
मर्यादा के सारे तट बंधों को
तोड़ती बह निकलेगी
और उसके साथ तुम्हारे
भूत भविष्य वर्त्तमान
सब बह जायेंगे और
शेष रह जाएगा
विध्वंस की कथा सुनाता
एक विप्लवकारी सन्नाटा
जो समय की धरा पर
ऐसे बदसूरत निशाँ छोड़ जाएगा
जिन्हें किसी भी अमृत वृष्टि से
धोया नहीं जा सकेगा !
इसीलिये कहती हूँ
मेरा यह मौन
मेरा कम और तुम्हारा
रक्षा कवच अधिक है
इसे तुम ना कुरेदो
तो ही अच्छा है !


साधना वैद




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Tuesday, May 11, 2010

कितनी बार...

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कितनी बार...
कितनी बार तुम मुझे अहसास कराते रहोगे
कि मेरी अहमियत तुम्हारे घर में,
तुम्हारे जीवन में
मात्र एक मेज़ या कुर्सी की ही है
जिसे ज़रूरत के अनुसार
कभी तुम बैठक में,
कभी रसोई में तो कभी
अपने निजी कमरे में
इस्तेमाल करने के लिए
सजा देते हो
और इस्तेमाल के बाद
यह भी भूल जाते हो कि
वह छाया में पड़ी है या धूप में !
कितनी बार तुम मुझे याद दिलाओगे
कि मैं तुम्हारे जीवन में
एक अनुत्पादक इकाई हूँ
इसलिए मुझे कैसी भी
छोटी या बड़ी इच्छा पालने का
या कैसा भी अहम या साधारण
फैसला लेने का
कोई हक नहीं है
ये सारे सर्वाधिकार केवल
तुम्हारे लिए सुरक्षित हैं
क्योंकि घर में धन कमा कर
तो तुम ही लाते हो !
कितनी बार तुम मुझे याद दिलाओगे
कि हमारे साझे जीवन में
मेरी हिस्सेदारी सिर्फ सर झुका कर
उन दायित्वों को ओढ़ने
और निभाने की है
जो मेरे चाहे अनचाहे
तुमने मुझ पर थोपे हैं,
और तुम्हारी हिस्सेदारी
सिर्फ ऐसे दायित्वों की सूची को
नित नया विस्तार देने की है
जिनके निर्वहन में
तुम्हारी भागीदारी शून्य होती है
केवल इसलिए
क्योंकि तुम ‘पति’ हो !

साधना वैद

Monday, May 10, 2010

माँ के लिए ..........जागरण से

लबो पे जिसके कभी बद्दुआ नहीं होती
वो माँ है जो कभी खफा नहीं होती
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

Sunday, May 9, 2010

मातृ दिवस ना मनाये

मातृ दिवस पर
माँ को करते हैं सलाम
और मातृ दिवस पर ही
कहीं किसी बेटी को करते हैं हलाल

जब भी कहीं कोई बेटी मरती हैं
एक माँ को भी तो आप ख़तम करते हैं
एक बच्चे का ममत्व आप छिनते हैं


आज से कुछ और साल बाद
शायद ना कोई माँ होगी
और ना ही होगी कोई संतान

मातृ दिवस ना मनाये
ऐसी परम्पराए क्यूँ बनाये
जिनेह आगे चल कर
ख़तम ही होना हैं

चलिये मानते हैं
ऑनर किल्लिंग दिवस
कन्या भुंण ह्त्या दिवस
दहेज के नाम पर जलती बहु - दिवस

क्या रखा हैं
मातृ दिवस मे
बालिका दिवस मे

जब मन मे स्नेह नहीं
बेटी के लिये
केवल सम्पत्ति हैं बेटी
कभी अपने घर तो
कभी ससराल
उसका मरना निश्चित हैं
दिवस बस अनिश्चित हैं
सो करिये घोषणा

कब मारेगे अपनी बेटी को
कुछ जश्न फिर नया हो



अजन्मी बेटियों , और्नर किल्लिंग के नाम पर मारी जाती बेटियों और दहेज़ के लोभ मे जलाई जाती बहुओ को समर्पितअरुशी और निरुपमा की याद मे
और हाँ पोस्ट समाज से संबंधित है माँ पिता भाई बहिन सास ससुर से नहीं वैसे समाज मे और कौन होता हैं ??
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Thursday, May 6, 2010

टुकड़ा टुकड़ा आसमान

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अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?

अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?

अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?

अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?

साधना वैद

Tuesday, May 4, 2010

आत्म साक्षात्कार

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अब खुले वातायनो से
सुखद, मन्द, सुरभित पवन के
मादक झोंके नहीं आते,
अंतर्मन की कालिमा उसमें मिल
उसे प्रदूषित कर जाती है।
अब नयनों से विशुद्ध करुणा जनित
पवित्र जल की निर्मल धारा नहीं बहती,
पुण्य सलिला गंगा की तरह
उसमें भी घृणा के विष की पंकिल धारा
साथ-साथ बहने लगी है।
अब व्यथित पीड़ित अवसन्न हृदय से
केवल ममता भरे आशीर्वचन और प्रार्थना
के स्वर ही उच्छवसित नहीं होते,
कम्पित अधरों से उलाहनों,
आरोपों, प्रत्यारोपों की
प्रतिध्वनि भी झंकृत होने लगी है।
अब नीरव, उदास, अनमनी संध्याओं में
अवसाद का अंधकार मन में समा कर
उसे शिथिल, बोझिल,
निर्जीव सा ही नहीं कर जाता,
उसमें अब आक्रोश की आँच भी
नज़र आने लगी है
जो उसे धीमे-धीमे सुलगा कर
प्रज्वलित कर जाती है।
लेकिन कैसी है यह आँच
जो मेरे मन को मथ कर
उद्वेलित कर जाती है?
कैसा है यह प्रकाश
जिसके आलोक में मैं
अपने सारे स्वप्नों के साथ-साथ
अपनी समस्त कोमलता,
अपनी मानवता,
अपनी चेतना, अपनी आत्मा,
अपना अंत:करण
और अपने सर्वांग को
धू-धू कर जलता देख रही हूँ
नि:शब्द, अवाक, चुपचाप !
साधना वैद

Monday, May 3, 2010

तुम क्या जानो

कुछ आपबीती कुछ जगबीती
पुरुष प्रधान भारतीय समाज में नारी को किस तरह से विषम परिस्थितियों में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करना पड़ा है । रूढिवादी रस्मों रिवाज़ और परम्पराओं की बेड़ियों से जकड़े होने के बावज़ूद भी जीवनधारा के विरुद्ध प्रवाह में तैरते हुए किस तरह से उसने आधुनिक समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है , अपनी पहचान पुख्ता की है यह कविता स्त्री की हर हाल में जीत हासिल करने की उसी अदम्य जिजिविषा को अभिव्यक्ति देने की छोटी सी कोशिश है ।


तुम क्या जानो

रसोई से बैठक तक,
घर से स्कूल तक,
रामायण से अखबार तक
मैने कितनी आलोचनाओं का ज़हर पिया है
तुम क्या जानो !

करछुल से कलम तक,
बुहारी से ब्रश तक,
दहलीज से दफ्तर तक
मैंने कितने तपते रेगिस्तानों को पार किया है
तुम क्या जानो !

मेंहदी के बूटों से मकानों के नक्शों तक,
रोटी पर घूमते बेलन से कम्प्यूटर के बटन तक,
बच्चों के गड़ूलों से हवाई जहाज़ की कॉकपिट तक
मैंने कितनी चुनौतियों का सामना किया है
तुम क्या जानो !

जच्चा सोहर से जाज़ तक,
बन्ना बन्नी से पॉप तक,
कत्थक से रॉक तक मैंने कितनी वर्जनाओं के थपेड़ों को झेला है
तुम क्या जानो !

सड़ी गली परम्पराओं को तोड़ने के लिये,
बेजान रस्मों को उखाड़ फेंकने के लिये,
निषेधाज्ञा में तनी रूढ़ियों की उँगली मरोड़ने के लिये
मैने कितने सुलगते ज्वालामुखियों की तपिश को बर्दाश्त किया है
तुम क्या जानो !

आज चुनौतियों की उस आँच में तप कर,
प्रतियोगिताओं की कसौटी पर घिस कर, निखर कर,
कंचन सी, कुंदन सी अपरूप दपदपाती
मैं खड़ी हूँ तुम्हारे सामने
अजेय, अपराजेय, दिक्विजयी !
मुझे इस रूप में भी तुम जान लो
पहचान लो !

साधना वैद


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Saturday, May 1, 2010

नारी जीवन - तेरी यही कहानी!

जीवन जिया,
मंजिलें भी मिली,
एक के बाद एक
बस नहीं मिला तो
समय नहीं मिला।
कुछ ऐसे क्षण खोजती ही रही ,
जो अपने और सिर्फ अपने लिए
जिए होते तो अच्छा होता।
जब समझा अपने को
कुछ बड़े मिले कुछ छोटे मिले
कुछ आदेश और कुछ मनुहार
करती रही सबको खुश ।
दूसरा चरण जिया,
बेटी से बन बहू आई,
झूलती रही, अपना कुछ भी नहीं,
चंद लम्हे भी नहीं जिए
जो अपने सिर्फ अपने होते।
पत्नी, बहू और माँ के विशेषण ने
छीन लिया अपना अस्तित्व, अपने अधिकार
चाहकर न चाहकर जीती रही ,
उन सबके लिए ,
जिनमें मेरा जीवन बसा था।
अपना सुख, खुशी निहित उन्हीं में देखी
थक-हार कर सोचा
कुछ पल अपने लिए
मिले होते
ख़ुद को पहचान तो लेती
कुछ अफसोस से
मुक्त तो होती
जी तो लेती कुछ पल
कहीं दूर प्रकृति के बीच  या एकांत में
जहाँ मैं और सिर्फ मैं होती.

Friday, April 30, 2010

जीने की ललक अभी बाकी है

आशा जी ने नारी ब्लॉग पर कमेन्ट दिया था वहाँ से मे उनके ब्लॉग तक गयी और इस कविता को पढ़ा आप भी पढे

स्वत्व पर मेरे पर्दा डाला ,
मुझको अपने जैसा ढाला ,
बातों ही बातों में मेरा ,
मन बहलाना चाहा ,
स्वावलम्बी ना होने दिया ,
अपने ढंग से जीने न दिया |
तुमने जो खुशी चाही मुझसे ,
उसमें खुद को भुलाने लगी ,
अपना मन बहलाने लगी ,
अपना अस्तित्व भूल बैठी ,
मन की खुशियां मुझ से रूठीं ,
मै तुम में ही खोने लगी |
आखिर तुम हो कौन ?
जो मेरे दिल में समाते गए ,
मुझको अपना बनाते गए ,
प्रगाढ़ प्रेम का रंग बना ,
उसमें मुझे डुबोते गए ,|
पर मै ऊब चुकी हूं अब ,
तुम्हारी इन बातों से ,
ना खेलो जजबातों से,
मुझको खुद ही जी लेने दो ,
कठपुतली ना बनने दो ,
उम्र नहीं रुक पाती है ,
जीने कीललक अभी बाकी है |
आशा


आशा जी ने नारी ब्लॉग पर कमेन्ट दिया था वहाँ से मे उनके ब्लॉग तक गयी और इस कविता को पढ़ा आप भी पढे
उनके ब्लॉग पर कमेन्ट दे शायाद वो पढ़े क्युकी उनका ईमेल आ ई डी नहीं मिला हैं सो उनको सूचित नहीं कर सकी

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Saturday, April 17, 2010

विश्वास

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तुम किसी को कुछ भी कहो
किसी को डाँटो, प्यार करो
पर मैं कुछ न बोलूँ
मुँह न खोलूँ
और बोलने से पहले
स्वयं को तोलूँ
फिर कैसे जीऊँ !
समाज की असंगतियाँ
और विसंगतियाँ
कब होंगी समाप्त
कब मिलेगा समान रूप से
जीने का अधिकार,
रेत होता अस्तित्व
कब लेगा सुंदर आकार
किसी साकार कलाकृति का !
इसी आशा में, इसी प्रत्याशा में
जी रही है आज की नारी
कि कोई तो कल आएगा
जो देगा ठंडक मन को,
काँटों में फूल खिलाएगा
देगा हिम्मत तन-मन को,
खुशियों से महकाएगा
जीवन को !
जागेगी तन में आस,
जीने की प्यास
और जागेगा
मन में विश्वास !
पूरा है भरोसा
और पूरी है आस्था
कि वह अनोखा एक दिन
अवश्य आएगा !

डॉ. मीना अग्रवाल

Monday, April 12, 2010

'मज़हब' की सलीब पर टंगी औरतें


आज़ाद मुल्क की ग़ुलाम औरतें...

मुस्लिम समाज में
जन्म लेने की
उम्रभर सज़ा भोगतीं
बेबस, लाचार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

शाहबानो, इमराना
और गुड़िया-सी
कठमुल्लों के ज़ुल्मों की
शिकार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

'मज़हब' की सलीब पर तंगी
इंसानों के बाज़ार में
ऐश का सामान-सी
हरम में चार-चार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

इंसाफ़ के लिए
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर
हैवानों के हाथों
सरेआम मरतीं संगसार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

मुस्लिम समाज में
जन्म लेने की
उम्रभर सज़ा भोगतीं
बेबस, लाचार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

शाहबानो, इमराना
और गुड़िया-सी
कठमुल्लों के ज़ुल्मों की
शिकार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

'मज़हब' की सलीब पर टंगी
इंसानों के बाज़ार में
ऐश का सामान-सी
हरम में चार-चार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

इंसाफ़ के लिए
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर
हैवानों के हाथों
सरेआम मरतीं संगसार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...

पुरुषों को जन्म देने वालीं
मर्दों के शोषण से कराहती
ख़ुद जीने का मांगती
अधिकार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
-फ़िरदौस ख़ान

Monday, March 29, 2010

नारी और नदी

नारी ने सीखा नदी से बहना
मौसम की हर मार को सहना
क्योंकि नदी बहने के साथ-साथ
सिखाती है गतिशील रहना
देती है संदेश निरंतरता का
देती है संदेश तत्परता का
नदी देती है शीतलता हृदय को
देती है तरलता मन को
सिखाती है बँधना किनारों से
सिखाती है जुड़ना धरती से !
नदी कराती है समन्वय मौसम से
कराती है मिलन धारा से
देती है संदेश प्रेम का
नदी नहीं सिखाती भँवर में फँसना
वह तो सिखाती है भँवर से उबरना !
नदी नाम है निरंतरता का
नदी नाम है एकरूपता का
नदी ही नाम है समरूपता का
नदी कल्याणी है मानवता की
वह तो संवाहक है नवीनता की
आओ हम भी सीखें नदी से
कर्मपथ पर गतिशील रहना
कंटकाकीर्ण मार्ग पर
निरंतर आगे ही आगे चलना,
नदी की ही तरह निरंतर बहना,
और हर मौसम में
या फिर तूफ़ानी क्षणों में
दृढ़ता के साथ
अडिग खड़े रहकर
ऊँचाइयों के चरम शिखर की
अंतिम सीढ़ी पर पहुँचना !


डॉ.मीना अग्रवाल

नारी की सृष्टि

समस्त संसार में
एक क्षेत्र है जहां
पुरुष का प्रवेश नहीं
नितांत नारी की
सृष्टि है वह
पुरुष का समावेश सही,
गृह संसार का अनाड़ी है
पुरुष प्राणी
दुनिया जीतने का
दावा करने वाले
भी बगलें झांकते
यहां!
नहीं असंभव ब्रह्माण्ड में विचरना
किन्तु
कठिन है
रसोई में चावल ढूंढना;
अन्नपूर्णा के
सपनों का स्वर्ग!!!
जहां यथार्थ से
लोहा लिया जाता है
वर्तमान को
संवारते संवारते
शुभकामनाओं के साथ
भविष्य रचा जाता है
तमाम झंझावातों का
कवच है,
शंका है न
डर ,झिझक
डगर के कांटों से
बिना किसी बाधा के
नारी निर्द्वदं
है चलती जाती
साम्राज्ञी की भांति
सभी बाधायें
चटकाती जाती
चुटकियों में सुलझाती
विकट
पारिवारिक पहेलियां,
मानस संसार की
व्याधियों का दमन
धैर्य से करती नारी
सहज सधे हाथों से
साधती
घर परिवार और
परिचित
बच्चों से लेकर
नौकरों तक
भर ममत्व उंड़ेलती ;
समाज
परिवार
बंधुजन को एक
डोर से बांधती;
पुरातन से
अधुनातन
सदैव
रुप भले
नवीन नित
किंतु सदावाही है
उसमें
ममत्व
प्रेम
स्नेह
संघर्ष
संतोष.........किरण राजपुरोहित नितिला

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Sunday, March 28, 2010

इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।

नहीं सौपा मैने अपना शरीर उसे
इसलिये
कि उसने मेरे साथ सात फेरे लिये
कि उसने मुझे सामाजिक सुरक्षा दी
कि उसने मेरे साथ घर बसाया
कि उसने मुझे माँ बनाया
सौपा मैने अपना शरीर उसे
इस लिये
क्योंकि "उस समय" उसे जरुरत थी
मेरे शरीर की , मेरे प्यार , दुलार की
और उसके बदले नहीं माँगा मैने
उससे कुछ भी , ना रुपया , ना पैसे
ना घर , ना बच्चे , ना सामाजिक सुरक्षा
फिर भी मुझे कहा गया की मै दूसरी औरत हूँ !!
घर तोड़ती हूँ ।
प्रश्न है मेरा पहली औरतो से , क्या कभी तुम्हें
अपनी कोई कमी दिखती है ??
क्यो घर से तुम्हारे पति को कहीं और जाना पड़ता है ?
क्यो हमेशा तुम इसे पुरुष की कमजोरी कहती हो ?
क्यो कभी तुम्हें अपनी कोई कमजोरी नहीं दिखती ?
जिस शरीर को सौपने के लिये ,
तुम सात फेरो की शर्ते लगती हो ,
उसे तो मैने योहीं दे दिया बिना शर्त ,
बिना शिक़ायत
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।



ये एक पुरानी कविता हैं लेकिन आज कल के संदर्भो मे इतनी पुरानी भी नही हैं ब्लॉग पर हर जगह आज लिव इन रिलेशन पर चर्चा हो रही हैं जबकि मैने ये कविता १७ दिसम्बर २००७ को लिखी थी और फिर १० जुलाई 2008 कि पोस्ट मै इसी ब्लॉग पर इस कविता को पुनेह डाला था और काफी बहस हुई थी आप ही देखे और अपने विचार दे
उसी पुराने लिंक पर
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Friday, March 26, 2010

प्रीत --- वि-- प्रीत

भाग १
सालों बाद
घर से बाहर रहा
पति लौट आया
घर मे ताँता लग गया
बधाईयों का, मिठाईयों का
आशीष वचनों का, प्रवचनों का
गैस पर चाय बनाती
पत्नी सोच रही हैं
क्या वो सच में भाग्यवान हैं ?
कि इतना घूम कर पति
वापस तो घर ही आया
पर पत्नी खुश हैं कि
अब कम से कम घर से बाहर
तो मै जा पाऊँगी
समाज मै मुहँ तो दिखा पाऊँगी
कुलक्षिणी के नाम से तो नहीं
अब जानी जाऊँगी

भाग २
सालों बाद
घर से बाहर रही
पत्नी लौट आयी
घर में एक सन्नाटा है
व्याप्त है मौन
जैसे कोई मर गया हो और
मातम उसका हो रहा है
दो चार आवाजें जो गूँज रही हैं
वह पूछ रही हैं
कुलक्षिणी क्यों वापस आयी ??
जहाँ थी वहीं क्यों नहीं बिला गयी
सिगरेट के कश लेता
सोच रहा हैं पति
समाज मे क्या मुँह
अब मै दिखाऊँगा
कैसे घर से बाहर
अब मै जाऊँगा
और घर में भी
इसके साथ
अब कैसे मैं रह पाऊँगा ??

कमेन्ट यहाँ दे
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Thursday, March 18, 2010

हम किराये पर लेते हें विदेशी कोख

हम बहुत तरक्की कर रहें हें
पहले बेटियों को मारते थे
बहुओ को जलाते थे
अब तो हम
कन्या भ्रूण हत्या करते है
दूर नहीं है वो समय
जब हम फक्र से कहेगे
पुत्र पैदा करने के लिये
हम किराये पर लेते हें
विदेशी कोख

कुछ पुराने कमेंट्स यहाँ देखे और अपनी बात भी वही कहे
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Tuesday, March 16, 2010

तुम क्यूं

तुम क्यूं झेल रही हो
पुरूषों को
जो नित्य ही मनुष्य के खोल
से बाहर आते हैं,
अधिकतर पुरूष का भी लबादा
नहीं रखते
बन जाते है हाड़ मांस के वहषी
सिर्फ मादा ही नजर आती है
हर नारी
जो कभी माँ,बहन-पत्नि होती है,
भभूका सा काबिज हो जाता है
हर लेता है समस्त विवेक
पुरूष से,मनुष्य से,
ओ! कापुरूषों क्यूं नही छोड़ देते
ये वहशीपन
जो दुनिया को गर्त में धकेल रहा है!
..किरण राजपुरोहित नितिला

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Thursday, March 11, 2010

वह चीख चीखकर कहती है मै आज की नारी हूँ

वह आज की नारी है
हर बात मे पुरुष से उसकी बराबरी है
शिक्षित है कमाती है
खाना बनाने जेसे
निकृष्ट कामो मे
वक़्त नहीं गवाँती है
घर कैसे चलाए
बच्चे कब पैदा हो
पति को वही बताती है
क्योकि उसे अपनी माँ जैसा नहीं बनना था
पति को सिर पर नहीं बिठाना था
उसे तो बहुत आगे जाना था
अपने अस्तित्व को बचाना था
फिर क्यों
आज भी वह आंख
बंद कर लती है
जब की उसे पता है
की उसका पति कहीँ और भी जाता है
किसी और को चाहता है
समय कहीं और बिताता है
क्यों आज भी वह
सामाजिक सुरक्षा के लिये
ग़लत को स्विकारती है
सामाजिक प्रतिशठा के लिये
अपनी प्रतिशठा को भूल जाती है
और पति को सामाजिक प्रतिशठा कव्च
कि तरह ओढ़ती बिछाती है
पति कि गलती को माफ़ नहीं
करती है
पर पति की गलती का सेहरा
आज भी
दूसरी औरत के स्रर पर
रखती है
माँ जेसी भी नहीं बनी
और रूह्रिवादी संस्कारो सै
आगे भी नहीं बढी.
फिर भी वह चीख चीखकर कहती है
मै आज की नारी हूँ
पुरुष की समान अधिकारी हूँ



कमेन्ट यहाँ दे

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Tuesday, March 9, 2010

यह एक दिन




हर वर्ष आता है
या शायद
लाया जाता है
यह दिन ,
आंकड़ों को टटोलते हुये
कभी कहता 1000 पर 945
कभी 33प्रतिशत
कभी 18 प्रतिशत ,
इनमें हेरफेर से
हो जाता है
क्या समाज में परिवर्तन ?
बदल तो नही जाती
मानसिकता ,
प्रकृति की प्रकृति
और कुछ कुछ नियति,
कम तो नही होती
रोज की घटनायें
प्रताड़ना
गली सड़क पर
उछलते फिकरे
बसों में हाथों की हरकतें
भीड़ में ठेलमठेल
मां से शुरु होकर
बहन तक जाती गालियां
लड़कियों की पाबंदी
बचपन से स्त्री बनने का दबाव
और नुमाइश लड़की की
कुछ लोगों के सामने
जो आखिर पुरुष बन
तय करता है
उसका भविश्य
अपनी शर्तों पर
रिवाजों की दुहाई देकर !
सदियों की मानसिकता ही तो
कायम रखता है ,
कितनी ही उचाईयां छूकर भी
समाज की
प्रश्नवाचक दृष्टि
वक्रता कम नही होती
वह तीक्ष्ण होकर
कसौटियों के कांटे
और बिछाकर कहता
अब!
पार होकर
दिखाओ तो जानें!
..............किरण राजपुरोहित नितिला

Saturday, March 6, 2010

हे नर क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम

क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालय
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है

हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम


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Friday, March 5, 2010

अनैतिकता बोली नैतिकता से

अनैतिकता बोली नैतिकता से
मंडियों , बाजारों और कोठो
पर मेरे शरीर को बेच कर
कमाई तुम खाते थे
अब मै खुद अपने शरीर को
बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
कमाई खुद खाती हूँ
तो रोष तुम दिखाते हो
मनोविज्ञान और नैतिकता
का पाठ मुझे पढाते हो
क्या अपनी कमाई के
साधन घट जाने से
घबराते हों इसीलिये
अनैतिकता को नैतिकता
का आवरण पहनाते हो
ताकि फिर आचरण
अनैतिक कर सको
और नैतिक भी बने रह सको


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Thursday, March 4, 2010

तुम्हारे अस्तित्व की जननी हूँ मै

पार्वती भी मै
दुर्गा भी मै
सीता भी मै
मंदोदरी भी मै
रुकमनी भी मै
मीरा भी मै
राधा भी मै
गंगा भी मै
सरस्वती भी मै

लक्ष्मी भी मै
माँ भी मै
पत्नी भी मै
बहिन भी मै
बेटी भी मै
घर मे भी मै
मंदिर मे भी मै
बाजार मे भी मै

"तीन तत्वों " मे भी मै
पुजती भी मै
बिकती भी मै
अब और क्या
परिचय दू
अपने अस्तित्व का
क्या करुगी तुम से
करके बराबरी मै
जब तुम्हारे
अस्तित्व की
जननी हूँ मै
तुम जब मेरे बराबर
हो जाना तब ही
मुझ तक आना




पार्वती माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमनी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा , पवित्रता का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
बाजार , वासना का प्रतीक
तीन तत्व , अग्नि , धरती , वायु

Wednesday, March 3, 2010

अघोषित अपराधी - बेटी का पिता!

वह दुनियाँ का सबसे
निरीह प्राणी है -
अपने जिगर के टुकड़े को 
साथ लिए लिए
उसके बचपन से 
जवानी तक
घूमता रहा.
कभी पढ़ाई, कभी कोचिंग,
औ' फिर कभी 
एडमिशन, कम्पटीशन, जॉब सर्चिंग
हाथ पकड़े घूमता रहा,
जब तक
उसके पैरों तले ठोस जमीं न मिली.
उस मुकाम पर पहुंचा कर
फिर खुद का सफर,
एक नया सफर
अपनी उम्र के तीसरे पड़ाव पर,
दर-दर भटका 
अब बारी थी
बेटी के ब्याहने की.
कहीं दरवाजा खोला गया,
कहीं एक गिलास पानी मिला 
औ' कहीं
बंद दरवाजे से आवाज आई
घर में कोई नहीं है,
फिर कभी आइयेगा.
कई कई दरवाजों की
धूल छानकर
पसीना पोंछते हुए वापस 
घर में आकर सांस ली.
पत्नी पानी का गिलास
हाथ में लेकर
चेहरा पढ़ने की कोशिश में
हताश चेहरा 
अपनी कहानी खुद
बयां कर रहा होता.
फिर दो चार दिन में
नए पते लेकर
फोटो और बायोडाटा के साथ
घर घर जाना
कोई पूछता--
आपका कितने का संकल्प है?
कितना खर्च करने की सोची है?
कुछ और बढ़ जाइये तो?
इतने ?? में तो 
मैं बात ही नहीं करता.
अभी इससे अधिक देनेवालों  को
मैं ने बुलाया ही नहीं है.
अजी पैसे नहीं है,
क्या मेरा ही घर बचा है?
कुछ रिश्तेदारों की सलाहें
पहले ही कहा था कि 
अधिक मत पढ़ाइये 
जल्दी शादी कर दीजिये.
कुछ के व्यंग्य भरे कटाक्ष
उनकी अपनी उपलब्धियों की गाथा
बिना मांगी सलाह
'मेरी मानिये तो
अब नीचे उतर आइये
बस देखिये 
लड़का ठीक ठाक हो,
बेटी को कमा रही है
दोनों आराम से रहेंगे.'
वह निरीह प्राणी
रात की नींद 
गिरवी रखकर
तारों को निहारता
सोचता है --
क्या गुनाह किया?
बेटी को जन्म दिया?
उसको उच्च शिक्षा दिलाई?
या उसके लिए
सुयोग्य वर की कामना की?
सब अनुत्तरित प्रश्न
उसको निरीह बना रहे हैं
क्योंकि

एक अघोषित अपराधी,
जिसका अपराध अक्षम्य है.
इस समाज की अदालत में
गुनाहगार बना खड़ा है.
क्योंकि वह एक 
बेटी का पिता है.

Monday, February 22, 2010

नारी का एक और सच !

जीवन समर्पित किया 
बचपन से बुढ़ापे तक 
बेटी बनी,
एक गर्भ से,
एक घर में, 
जन्म लेकर 
पली बढ़ी 
सब कुछ किया.
पर कही पराया धन ही गयी.
बेटा सब कुछ पा  गया
उसको  कहा--
ऐसा 'अपने घर ' जाकर करना
 ये मेरे वश में नहीं.
पराया धन
अपनी समझ से
सब कुछ देकर विदा किया
जिनकी अमानत थी,
उनको बुलाकर सौप दिया.
इस घर में आकर 
घर की दर औ' दीवारें
अपनेपन से सींच दीं,
यहाँ भी सब कुछ किया
पति के परिवार  में 
खोजे और सोचे 
अपने रिश्ते
अपनापन और अपना घर
जिसकी बात बचपन से सुनी थी.
किन्तु 
सास न माँ बन सकी,
पिता , बहन औ' भाई 
का सपना अधूरा ही रहा.
इस यथार्थ की चाबुक
'क्या सीखा  'अपने घर' में?'
'वापस 'अपने घर ' जा सकती हो.'
'अपने घर ' की बात मत कर'
'अपना घर' समझ होता तो?'
जब बार बार सुना औ' हर घर में सुना
खुद को कटघरे में खड़ा किया
मेरा घर कौन सा है?
जहाँ जन्मी पराई थी,
अपने घर चली जायेगी एकदिन.
जहाँ आई वहाँ भी......
अपने घर को न खोज पायी.
 जन्म से मृत्यु तक
बलिदान हुई 
पर एक अपने घर के लिए
तरसते तरसते
रह गयी
क्योंकि वह तो
सदा पराई ही रही.
किसी ने अपना समझ कहाँ?
बिना अपने घर के जीती रही, 
मरती रही जिनके लिए,
वे मेरे क्या थे?
एक अनुत्तरित सा  यक्ष प्रश्न 
हमेशा खड़ा रहेगा.

Sunday, February 21, 2010

स्त्री का सच


स्त्री सुहाती हैं
कब
जब
नयनो को
झुका कर
ओठ को दबा कर
इठलाती हैं
रति बन जाती हैं
या
आँखों मे आंसूं
झुकी हुई गर्दन
सहनशीलता कि प्रतिमा
बन जीती जाती हैं

जिन्दगी शांति से चलती रहे
चाहे स्त्री उसमे कितनी भी
तपती रहे

सच बोलने से
हर स्त्री को
मना किया जाता हैं
और रहेगा

क्युकी
स्त्री का सच
अपच



कल अपनी एक महिला मित्र से बात हुई जो जिन्दगी से परेशान हैं जबकि उसके पास सब कुछ हैं , पति भी , बच्चे भी । दुनिया कि नज़र मे मृदुभाषी हैं सर्व गुणी हैं , शांत हैं , धीर गंभीर हैं और खुश हैं क्युकी दुनिया वो देख रही हैं जो उसका बाहरी आवरण हैं । जब अविवाहित थी तब सौतेली माँ के आतंक से त्रस्त थी , सबने कहा शादी कर लो एक घर तुम्हारा अपना होगा । शादी हुई , बेटिया हुई लेकिन सुख और शांति कि तलाश आज भी बदस्तूर जारी हैं और ये सच वो किसी से नहीं कह सकती क्युकी स्त्री का सच अपच
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Sunday, February 14, 2010

पहला प्यार (वेलेंटाइन दिवस पर)

पहली बार
इन आँखों ने महसूस किया
हसरत भरी निगाहों को

ऐसा लगा
जैसे किसी ने देखा हो
इस नाजुक दिल को
प्यार भरी आँखों से

न जाने कितनी
कोमल और अनकही भावनायें
उमड़ने लगीं दिल में

एक अनछुये अहसास के
आगोश में समाते हुए
महसूस किया प्यार को

कितना अनमोल था
वह अहसास
मेरा पहला प्यार !!

आकांक्षा यादव © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Sunday, January 10, 2010

एक लिंक

जो लोग नारी आधारित विषयों पर कविताओं का संकलन देखना चाहते हैं इस लिंक पर जाए
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Monday, January 4, 2010

नारीवादी नारीविरोधी

तमगा देते हो नारी को नारीवादी होने का
पर मतलब क्या हैं
कौन हैं नारीवादी
क्या हैं आज के परिवेश मे
नारी वादी कि परिभाषा तुम्हारी
जो नारी खाना नहीं जानती बनाना
उसको क्या तुम कहते हो नारीवादी ?
तो ज़रा आओ मुझसे बेहतर खाना तुम बना कर दिखाओ
जो नारी स्वेटर नहीं बुनना जानती
उसको क्या तुम कहते हो नारीवादी ?
तो ज़रा आओ और मुझसे बेहतर स्वेटर का डिज़ाइन तुम बुन कर दिखाओ
जो घर के काम नहीं करती
उसको क्या कहते हो तुम नारीवादी ?
तो ज़रा आओ और मेरे घर से साफ़ और सुंदर घर अपना मुझे दिखाओ
जो माता पिता कि सेवा नहीं करती
उस क्या कहते हो नारीवादी
तो आओ और देखो मेरी माँ आज भी गरम रोटी खाती हैं
जिसको मै बनाती हूँ
वैसी गोल रोटी , प्यार से सेक कर कभी अपनी माँ को तुमने खिलाई हो तो बताओ
बस शर्त इतनी हैं कि ये सब तुम कर के दिखाओ
अपनी माँ बहिन या पत्नी का किया मत मुझ को दिखाना
क्युकी कहीं कोई और उनको भी तमगा दे रहा होगा नारीवादी का

घर तुम्हारा एक नारी ही चलाती हैं
वंश तुम्हारा एक नारी ही चलाती हैं
अधिकार अपने ना कभी तुमसे मांगे
अपने अधिकारों को वो कभी ना जाने
इसीलिये
हर वो स्त्री नारीवादी हैं जो
उनको उनके अधिकार से अवगत कराती हैं


चलो और आगे बढते हैं
क्यूँ कहते हो तुम नारीवादी
केवल क्या इसलिये कि नारी कि बात को खुल कर
मै कहती हूँ और तुम्हारे अस्तित्व से हटकर
अपने अस्तित्व को जीती हूँ

खुद कमाती हूँ
खुद सोचती हूँ
और दूसरी नारियों को
उनके अधिकार से अवगत कराती हूँ
अगर इस लिये मै नारीवादी हूँ
तो फक्र हैं कि मै नारीवादी हूँ

और तुम क्या हो ज़रा सोच कर बताना
देखा हैं मैने तुमको एक ऐसी लाइन मे
खड़े हुए , जहां एक ऐसा व्यक्ति
बाँट रहा हैं पुरूस्कार
जो निरंतर नारियों का करता रहा हैं तिरस्कार
और तुम उन चंद रुपयों के लिये बेच रहे हो
अपनी थाती और कला
और बजा रहेहो उसका ढोल
जिसकी हर आवाज तुमको
नारी विरोधी बताती हैं




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Thursday, November 26, 2009

स्वर

तुहिन कणों में हास्य मुखर
सौरभ से सुरभित हर मंजर
रंगों का फैला है जमघट
मूक प्रकृति को मिले स्वर
बाहर कितना सौन्दर्य बिखरा -
पर अंतर क्यों खाली है
काश कि ये सोन्दर्य सिमट
मुझमे भर दे उल्लास अमिट

Monday, November 9, 2009

वन्दे मातरम -- मातृ भूमि कुमाता कैसे हो जाये ??

ना जाने क्यूँ लोग बार बार

उनसे कहते हैं वन्दे मातरम गाओ

वन्दे मातरम

और

जन गण मन

तो वही गाते हैं

जिनके मन मे देश प्रेम होता हैं

मातृ भूमि को जो चाहेगे

वो ईश्वर से भी मातृ भूमि के लिये लड़ जायेगे

दो बीघा जमीन बस दो बीघा जमीन नहीं होती हैं

अन्न देती हैं , जीवन देती हैं

उस माँ कि तरह होती हैं

जो नौ महीने कोख मे रखती हैं

खून और दूध से सीचती हैं

पर माँ को माँ कब ये मानते हैं

कोख का मतलब ही कहां जानते हैं

मातृ भूमि भी माँ ही होती हैं

कुमाता नहीं हो सकती हैं

इसीलिये तो कर रही हैं इनको

अपनी छाती पर बर्दाश्त

ये जमीन हिन्दुस्तान कि

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Tuesday, November 3, 2009

एक फौज औरतो की

सदियों से
तैयार की जाती रही हैं
एक फौज
औरतो की जो चलती रहे
बिना प्रश्न किये , बिना मुंह खोले
करती रहे जो शादी जनति रहे जो बच्चे
जिसके सुख की परिभाषा हो
पति और पुत्र के सुख की कामना
और
जो लड़ती रहे एक दूसरे से
बिना ये जाने की वो
एक चाल मे फंस गयी हैं
जहाँ पूरक वो कहलाती हैं
पर पूरक शब्द का
अर्थ पूछने का अधिकार
भी उसका नहीं होता हैं
तैयार की जा रही हैं
एक फौज औरतो की
जिसकी संवेदना मर गयी हैं
उसके अपने लिये
क्युकी उस को कहा जाता हें
और जाता रहेगा
की औरत का सुख
पति बच्चो और घर से ही होता हैं





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Tuesday, October 20, 2009

राह

उत्ताल तरंगों को देखकर
नही मिलती सागर की गहराई की थाह
शांत नजरों को देखकर ,
नही मिलतीनारी मन की राह
टुकडों में जीती जिन्दगी पत्नी ,प्रेमिका ,मां ,
अपना अक्स निहारती कितनी है तनहा
सूरज से धुप चुराकर सबकी राहें रोशन करती
उदास अंधेरों को मन की तहों में रखती
सरल सहज रूप को देखकर
नही मिलतीनारी मन की राह

Saturday, September 26, 2009

मेजर गौतम तुम्हे सलाम

गौतम का नाम मिला हैं तुमको
गौतम बनना होगा तुमको
इंसान नहीं हो तुम
शिला हो , सो भाव ना हो तुममे
तुम हो तो सुरक्षित हम हैं गौतम
तुम जैसी शिलाओ से
सुरक्षित हैं सीमाये
माँ बनने वाली हैं पल्लवी
फिर जन्मेगा एक सुरेश
फिर उसको तुम्हे ही बनाना है मेजर
हम भी पीछे नहीं हैं गौतम
जहां कहोगे शिला बन कर खडे रहेगे
ना सुरेश अकेला था
ना पल्लवी अकेली होगी
तुम हुकुम करना
हम पूरा करेगे
मेजर गौतम तुम्हे सलाम
क्युकी जीते हो जिंदगी की
लड़ाई भी तुम

डॉ अनुराग की पोस्ट देखे सन्दर्भ के लिये
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Wednesday, September 23, 2009

खामोश क्यों हो?

आजकल खामोश क्यों?
कलम
क्या जज्बा संघर्ष का
कुछ टूटने लगा है,
या फिर
अपनी लड़ाई में
बढ़ते कदमों के नीचे
कुछ कांटे बिछाए गए हैं
उनकी चुभन ने
थाम दिए है पग
कुछ इस तरह
रखो कदम
चरमराकर पिस जाएँ
और सिर उठाकर गुजर जाओ
उनके ऊपर से।
कांटे क्या?
लोहे की सलाखें भी
जज्बों के आगे
मुड़कर नतमस्तक हो जायेंगी
कटाक्ष , लांछन
हमेशा श्रृंगार के लिए
तैयार रहे हैं।
जब भी किसी नारी ने
अपनी सीमाओं से परे
कुछ कर के दिखाया है।
अंगुलियाँ उठती ही
रहती हैं।
आखिर कब तक
उठेंगी
अपनी मंजिल की तरफ
चुपचाप चले चलो
जब मिल जायेगी
यही अंगुलियाँ
झुककर
तालियाँ बजायेंगी
लांछन लगाने वाली
जबान
शाबाशी भी देगी।
बस
मेधा , क्षमता, शान्ति से,
जीत लो मन सबका.

Saturday, August 22, 2009

'प्रतिभा' ~ रश्मि स्वरुप

'प्रतिभा'


वह शांत थी अनजान थी
और उससे भी अधिक गुमनाम थी
घनघोर अँधेरे में रोशनी का एक कतरा गया
उसे जगाया गया, सहलाया गया
पर संकोच की परतों में वह, ढंकी रही, छिपी रही
पहचान तो गयी खुद को, पर सबकी नजरों से बची रही
ठहर ठहर के उसे ललकारा और उभारा गया
आ दिखा जौहर अपना, कहकर उसे पुकारा गया
मान अटल इस पुकार को, कठिन साधना से निखरी
ओजस्वी उसका आत्मबल, किरणें जिसकी बिखरी
आखिर जम कर चमकी गगन में, नजरो में उसकी कौंध चुभी
वो तो नहाई रोशनी में, औरों को उसकी चकाचौंध चुभी
लेकर आड़ खुबसूरत परन्तु खोखली बातों की, दुहाई दी,
फुसलाया और डराया भी
बनी रही जब हठी तनिक वह, ज़रा उसे बहलाया भी
चकित हुई दोहरे बर्ताव से, हताश हुई, दुःख की हुँकार उठी
चख लिया था स्वाद उसने स्वतंत्रता का, कुचले जाने पर फुंफकार उठी
अंत किया इस द्वंद का, की सिंहनी सी गर्जना
जन्म लिया विद्रोह ने, तोड़ दी ये वर्जना
बीत गयी रात अन्धकार की, ये सुनहरी प्रभा है
ना छिप सकेगी, न दबेगी, ये अदम्य प्रतिभा है...!
~ रश्मि स्वरुप


रश्मि स्वरुप ने भेजी हैं लिंक हैं
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Saturday, August 15, 2009

रहस्यमयी



उम्र कोई हो,
एक लड़की-
१६ वर्ष की,
मन के अन्दर सिमटी रहती है...
पुरवा का हाथ पकड़
दौड़ती है खुले बालों मे
नंगे पाँव....
रिमझिम बारिश मे !
अबाध गति से हँसती है
कजरारी आंखो से,
इधर उधर देखती है...
क्या खोया? - इससे परे
शकुंतला बन
फूलों से श्रृंगार करती है
बेटी" सज़ा-ए-आफ़ता पत्नी" बनती होगी
पर यह,
सिर्फ़ सुरीला तान होती है!
यातना-गृह मे डालो
या अपनी मर्ज़ी का मुकदमा चलाओ ,
वक्त निकाल ,
यह कवि की प्रेरणा बन जाती है ,
दुर्गा रूप से निकल कर
" छुई-मुई " बन जाती है-
यह लड़की!
मौत तक को चकमा दे जाती है....
तभी तो
"रहस्यमयी " कही जाती है...!

Thursday, August 6, 2009

मुझसे सुंदर कौन??????????

मैं हूँ पायल,
मैं हूँ गीत,
रिमझिम-रिमझिम बारिश हूँ..
।मैं हूँ खनकती पुरवाई,
मैं ही बसंत की खुशबू हूँ...
मैं हूँ आँगन,
मैं हूँ पवन,
मैं ही बाबुल की दुनिया हूँ....
मैं हूँ ममता का दूजा रूप,
भाई की कलाई की डोरी हूँ,
मैं हूँ शक्ति,
मैं विद्या हूँ,
मैं ही लक्ष्मी का रूप हूँ....
बुलबुल हूँ,
गौरैया हूँ,
कोयल की गूंजती कूक हूँ....
धरती में हूँ,
अम्बर पे हूँ,
मुझसे सुंदर कौन?
थामलो मेरा हाथ,
मुझसे कर लो बात,
मैं ही मन हूँ,
मैं हूँ जीवन,
धड़कनों के संग-संग हूँ....
क्यूँ मुझको यूँ खोते हो,
मुझसे सुंदर कौन?
कहो...मुझसे सुंदर कौन??????????

Saturday, August 1, 2009

जीत निश्चित है !

बाल-विवाह , सती-प्रथा ,
अग्नि-परीक्षा........................
जाने कितने अंगारों से गुजरी
ये मासूम काया !
यातनाओं के शिविर में,
विरोध की शिक्षा ने ,
उसे संतुलन दिया ,
शरीर पर पड़े निशानों ने
'स्व' आकलन का नजरिया दिया !
हर देहरी पर ,
'बचाव' की गुहार लगाती,
अपशब्दों का शिकार होती,
लान्छ्नाओं से धधकती नारी ने
अपना वजूद बनाया.........
माँ सरस्वती से शिक्षा,
दुर्गा से नवशक्ति ली ,
लक्ष्मी का आह्वान किया-
प्रकाशपुंज बनकर ख़ुद को स्थापित किया !
समाज का दुर्भाग्य -
उसकी शक्ति,उसकी क्षमताओं से परे
ह्त्या पर उतर आया !
आज फिर ,
कुरुक्षेत्र का मैदान है ,
और कृष्ण नारी सेना के सारथी............
यकीनन,
जीत निश्चित है !

Wednesday, July 29, 2009

परिणाम !!!!!!!

अपना घर होगा,
अपनी इच्छा ,अपने ख्यालों से
उसे एक अनोखा रंग दूंगी........
ख्वाहिशों की टोकरी में
यह भी एक ख्वाहिश रही नारी की,
पर घर?
वह अपना होता कहाँ है !
पनाह मिलती है,
खाने को दो रोटी
और एक नाम.........
बहुत कम लोगों की पोटली के ख्वाहिश
सच होते हैं
वरना जिधर देखो
ख्वाहिशों के आंसू बहते हैं
जिनको पोछ्नेवाले भी बिरले होते हैं..........
बेटी होने का भय
यूँ ही नहीं प्रबल होता है !
सात फेरों का परिणाम अनिश्चित........
उससे पार पाने के लिए,
अपने पैरों पर खड़ा होना,
भीड़ में गुम हो जाना है,
घर की दीवारों से वह गंध नहीं आती,
जो खनकती चूड़ियों से होती है,
छनकते पायल से होती है
माँ-माँ की गूँज से होती है,
पर...............
रोटी की बराबरी ने
सबकुछ विछिन्न कर दिया !
सहमे,दबे रूप से अलग
जो काया निकली
वह या तो ज्वाला है
या किसी कोने में हतप्रभ आकृति........

Saturday, July 25, 2009

बसंत को आने दो !

औरत -एक माँ ,
संस्कारों की धरती ,
पावन गंगा................
लोग इसे भूल जाते हैं !
एक माँ , काली बन जाती है
जब उसके बच्चे पर कुदृष्टि पड़ती है !
एक औरत ,बन जाती है दुर्गा ,
करती है महिषासुर का वध
जब संस्कारों की धरती पर
पाप के बीज पड़ते हैं !
पावन गंगा बन जाती है विभीषिका
जब उसकी पावनता के उपभोग की अति होती है !
सूखी नज़र आती गंगा काल का शंखनाद बनती है
दिशा बदल - सर्पिणी बन जाती है !
लड़की के जन्म को नकारकर वंश की परम्परा में ख़ुद आग भरते हो ,
जो पुत्र जन्म लेता है लड़की की मौत के बाद ,
वह पुत्र -विनाश का करताल होता है !
जागो,संस्कारों की धरती को बाँझ मत बनाओ...........
गंगा में संस्कारों को मत प्रवाहित
करो विश्वास की देहरी कोअंधकारमय मत करो।
लक्ष्मी को आँगन से निष्कासित मत करो !
नारी का सम्मान करो,
उसकी ममता को मान दो,
अन्धकार से प्रकाश की ओर प्रस्थान करो ,
आँगन में -बसंत को आने दो !

Wednesday, July 22, 2009

स्वयम्बर से वनवास तक सीता ने बहुत सहा था

राखी सावंत ने रचा स्वयम्बर
बनने चली वो सीता
उम्मीद थी उसको
मिलेगे राम
पर शायद ये भूल गयी
राम मिलेगे
तो एक कहीं धोबी भी होगा
और फिर एक वनवास भी होगा

क्यूँ उन प्रथाओं को बारबार
दोहराते हैं जिनको
मिटाने मे लोगो ने युग लगा दिये

स्वयम्बर क्यूँ हो फिर
अग्निपरीक्षा क्यूँ हो फिर
और वनवास भी क्यूँ हो फिर

मत दोहराओ इतिहास
मत बनाओ नारी को फिर
रुढिवादी सोच का दास

सीता से राखी तक सफर तो ठीक था
कहीं कुछ आगे तो बढ़ा था
पर राखी से सीता तक का सफर
एक तरीका होगा
फिर नारी के अस्तित्व को मिटने का

स्वयम्बर से वनवास तक
सीता ने बहुत सहा था
क्या राखी तुम भी सहना चाहोगी

नहीं तो फिर क्यूँ रचा
ये स्वयम्बर
क्यूँ पुरानी परिपाटी
फिर दोहरायी



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Sunday, July 19, 2009

ठहरा हुआ इंतजार


एक टुकडा जीवन
लगातार घुमती हुई खामोश बेचैनी
संदिग्ध लम्बा अंतराल
अनुगूंज की घिस चुकि आवाजें
मौन पवित्र प्रार्थनाऐ
सम्पूर्ण अतिंम आवेग
प्रेम की परकटी ऊडान
समुद की बंधुआ कसमसाहट
देर तक जागता ऊनींदा संदेश
तिलमिलाती हुई दारूण प्रतीक्षा
रिश्तों की भारी खुरदुराहट
सपनों का अथाह भारीपन
हँसी की भीतरी लडखडाहट
साथ ही
आहट की इंतहा कंपन भी
क्या कुछ नहीं है यहाँ
इस जीवन में
मगर फिर भी क्या
जरूरी है
हर मील के पत्थर के बाद
वही ठहरा हुआ इंतजार।

Wednesday, June 24, 2009

ड्रेस कोड ----- अब हुआ न्याय

सलवार सूट पहने एक लड़की
दिल्ली की बस मे जा रही थी
लोगो ने छेडा ,
गालो पर चाकू से निशाँ बना दिये

हादसा था

साड़ी पहने एक महिला
इन्दोर मे सड़क पर
पति के साथ जा रही थी
कार मे चार लोगो ने
जबरन उठा लिया
हादसा था

कानपुर कॉलेज मे लडकियां
जींस पहन कर आयी
शोहदों ने सीटी बजाई
लड़की की गलती
प्राचार्या ने बतायी
क्युकी वो जींस पहन कर आयी


वाह क्या न्याय हैं


ड्रेस कोड लागू करवाओ
प्राचार्या ने गुहार लगाई

पर इस बार जिला प्रशासन
चेत गया
और ड्रेस कोड की जगह
हेल्प लाइन खुलवा दी
जहाँ लड़की
चाहे जींस मे हो या साड़ी मे
फोन पर बिना अपना नाम बताये
सीटी बजाने वालो के ख़िलाफ़
अपनी शिकायत दर्ज करवाये

अब हुआ न्याय
चीज़ नहीं लड़की की
गलती तुम्हारी और सजा भुगते वो









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Sunday, June 21, 2009

बाबुल

आज पितः दिवस पर कहने और लिखने के लिए बहुत कुछ सोचा ,मगर बस स्नेह के अलावा और कुछ समझ न आया ,बहुत पहले लिखे कुछ ख्याल है

नयनो की जलधारा को, बह जाने दो सब कहते
पर तुम इस गंगा जमुना को मेरे बाबुल कैसे सहते
इसलिए छूपा रही हूँ दिल के एक कोने में
जहाँ तेरे संग बिताए सारे पल है रहते
होठों पर सजाई हँसी,ताकि तू ना रोए
इन आखरी लम्हों को,हम रखेंगे संजोए
आज अपनी लाड़ली की कर रहे हो बिदाई
क्या एक ही दिन मे, हो गयी हू इतनी पराई
जानू मेरे जैसा तेरा भी मन भर आया
चाहती सदा तू बना रहे मेरा साया
वादा करती हूँ निभाउंगी तेरे संस्कार
तेरे सारे सपनो को दूँगी में आकार
कैसी रीत है ये,के जाना तेरा बंधन तोड़के
क्या रह पाउंगी बाबुल, मैं तेरा दामन छोड़के.

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Friday, May 29, 2009

सबके लिये क्यूँ नहीं हैं

कम उम्र विवाहिता
माँ नहीं बना चाहती
समाज कहता हैं
नहीं गर्भपात नहीं करवा सकती

कम उम्र अविवाहिता
माँ बनना चाहती हैं
समाज कहता हैं
नहीं गर्भपात करवा दो

बच्चे का आना
खुशी अगर हैं
माँ बनना खुशी अगर हैं

तो सबके लिये क्यूँ नहीं हैं

{ बालिका वधु सीरीयल की आज की कड़ी देखकर बस यही समझ आया }

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Thursday, May 14, 2009

बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ

मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं
कह कर कब तक
बेटी को बेटे से कमतर मानोगे
और
कब बेटी को सिर्फ़ और सिर्फ़ इस लिये चाहोगे
कि वो बेटी तुम्हरी हैं

हर समय बेटे रूपी कसौटी पर
क्यों बेटियों के हर किये को
कसा जाता हैं


और कब तक बेटियों को
अपना खरा पन
बेटे नाम कि कसौटी पर
घिस घिस कर
साबित करना पडेगा

कुछ इतिहास हमे भी बताओ
कुछ कारण यहाँ भी दे जाओ
बेटो ने ऐसा क्या किया
जो बेटी को बेटे जैसा
तुम बनाते जाते हो
और उसके अस्तित्व को
ख़ुद ही मिटाते जाते हो

या
बेटे जैसा कह कर
अपने मन को संतोष तुम देते हो

बेटा और बेटी
दोनों अंश तुम्हारे ही हैं
फिर जैसा कह कर
एक आंख को क्यूँ
दूसरी से नापते हो


बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
बेटियाँ बस बेटियाँ होती हैं





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Wednesday, May 13, 2009

ईश्वर बस बेटी न देना

लडकियां इतना कैसे लड़ लेती हैं
कैसे अपने लिये हर जगह
जगह बना लेती हैं ??
कैसे जीतना हैं उनको
अपना मिशन बना लेती हैं ??
कैसे कम खाना खा कर भी
सेहत सही रहे ये जान लेती हैं ??

बहुत आसन हैं
जब माँ के पेट मे होती हैं
तभी से सुनती हैं
माँ की हर धड़कन कहती हैं
इश्वर लड़की ना देना
जो कष्ट मैने पाया
वो संतान को पाते ना देख पाउंगी
हे विधाता बेटी ना देना

बस यही सुन सुन कर नौ महीने मे
माँ के खून के साथ
सरवाईवल ऑफ़ फीटेस्ट
की परिभाषा
को जीती हैं लडकियां

और

जिन्दगी की आने वाली लड़ाई के लिये
अपने को तैयार कर लेती हैं

हर सफल लड़की के पीछे
होती हैं एक माँ की
कामना की
ईश्वर बस बेटी न देना



कुछ कमेंट्स पढ़ने के बाद ये लिखना जरुरी होगया हैं की ये किसी माँ की कामना नहीं हैं की उसके बेटी ना हो ये एक माँ का दर्द हैं जो ईश्वर से बेटी न देने की प्रार्थना कर रहा हैं कल मेरी एक दोस्त ने बताया था की वो अपनी बेटी के लिये विवाह योग्य वर देख रही हैं पर नहीं मिल रहा और क्युकी उसकी शादी से ले कर उसकी बेटी की शादी तक मे भी समाज मे कुछ नहीं बदला हैं । आज भी बेटी की शादी केवल और केवल पैसे से ही होती हैं ।
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Sunday, May 10, 2009

उड़ान


चंचल मन की चाह अधिक है

कोमल पंख उड़ान कठिन है

सीमा छूनी है दूर गगन की

उड़ती जाऊँ मदमस्त पवन सी

साँसों की डोरी से पंख कटे

पीड़ा से मेरा ह्रदय फटे

दूर गगन का क्षितिज न पाऊँ

आशा का कोई द्वार ना पाऊँ !

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Monday, April 27, 2009

युवामन - वृद्धतन

किसी अज्ञात भय से / मेरा बुढापा नहीं डरता हैं
दुसरो के सुख का संकल्प लिये / आज भी दौड़ता फिरता हैं
शरीर भले ही आयु से बंध जाए
मन तो सदैव स्वतंत्र चलता हैं ।
मै नहीं मानती मेरा बचपन खो गया कहीं
वह तो आज भी / ममता की झोली में
अबोध बच्चो की तुतली बोली में
उत्सुक चंचल आँखों में
झांकता हैं , स्वर्ग सुख मांगता हैं ।
मै नहीं मानती मेरी युवावस्था बीत गयी
वह तो आज भी युवा मित्रो के साहस मे
चहकती हैं , फूलो सी महकती हैं
मेरा वृद्ध तन युवा हो जाता हैं
जब किसी युवा साथी का हाथ
हाथ मे मदद को आता हैं ।
बुढापा कोई पड़ाव नहीं
प्रक्रिया हैं आगे बढ़ने की
जो नहीं कर सके अब तक
उसे पूरा करने की ।
भूत - भविष्य की चिंता छोडो
केवल वर्तमान से नाता जोडो ।
यही सच हैं बाकी सब बेमानी हैं ।
बुढापा अभिशाप नहीं
इश्वर की मेहरबानी हैं

कमेंट्स यहाँ दे युवामन - वृद्धतन
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Friday, April 24, 2009

घूँघट का पट

क्यूँ सखी
इतना अन्तर
तुझ में और मुझ में
मैं देख सकती हूँ
तारों के पार का जहाँ
बोल सकती हूँ
अपने आज़ादी के शब्द
सुन सकती हूँ
अपना मनचाहा स्वर
शायद मेरे इन्द्रिय
जाग उठे है समय के साथ

तू क्यूँ ग़लत परम्पराओं का
लंबा सा पल्लो
ओढ़ के बैठी है अब तक
जहाँ से तुझे सिर्फ़
अपने पैरों के नाखून ही नज़र आते है
एक कदम भी नही चल सकती तू
दूसरो के सहारे बिन
तेरी मुस्कान सिल जाती है जिस में
खोल दे वो घूँघट का पट सखी
मेरे संग तुझे बहुत दूर चलना है
नज़रों से पलकों का परदा हटा
तुझे नीला आसमान देखना है











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Wednesday, April 8, 2009

जीने का हक है मुझे

जाने क्यों

बगावत कर
तन कर खड़ी हो गई
वर्जनाओं और प्रतिबंधों की
जंजीरों को तोड़कर
नए स्वरूप में
जंग का ऐलान कर.
माँ लगी समझाने
वे बड़े हैं,
पिता हैं,
भाई हैं ,
उन्हें हक है
कि तुझे अपने अनुसार
जीवन जीने देने का।
नहीं, नहीं, नहीं..........
बचपन से प्रतिबंधों की
जंजीरों में जकड़ी
औ' अपनी बेबसी पर
रोते हुए देखा है तुम्हें
घुट-घुटकर जहर
पीते हुए देखा है तुम्हें
तुम्हारी छाया में
पिसती मैं भी रही
लाल-लाल आँखों का डर
हर पल सहमाये रहा
पर अब क्यों?
नहीं उनका रिश्ता
मैं नहीं ओढ़ सकती
जीवन भर के लिए
अपने को
दूसरों की मर्जी पर
नहीं छोड़ सकती।
जिन्दगी मेरी है,
उसे जीने का हक है मुझे
चाहे झूठी मान्यताओं
औ' प्रथाओं से लडूं
जीवन अपने लिए
जीना है तो क्यों न जिऊँ
पिता के साए से डरकर
तेरी गोद में
छुपी रही
अब नए जीवन में
उनका साया नहीं,
उन जैसे किसी भी पुरूष की
छाया भी नहीं
मैं पति से डरकर
जीना नहीं चाहती
अब परमेश्वर की मिथ्या
परिकल्पना को
तोड़कर
एक अच्छे साथी
तलाश ख़ुद ही करूंगी
चाहे जब भी मिले
मंजिल
उसके मिलने तक
अपनी लडाई
ख़ुद ही लडूंगी
मुझे जीने का हक है
मुझे जीने का हक है
और मैं उसको
अपने लिए ही जिऊंगी.

पता नहीं क्यों

Monday, March 30, 2009

प्रेम - व्यापार

देव हो या दानव

वासना का समुद्र

जब - जब उफनता हैं

सयम का कगार टूट जाता हैं ।

सुंदर प्रकाशवान मछली

सम्मोहन के जाल मै

स्वयं फँस जाती हैं ।

तामसी - वृत्तियाँ

प्यार के अनछुये आकाश पर

काले बादल बन छा जाती हैं ।

चारो और फैले

तामसी कोहरे के भीतर

बलात्कार होता हैं

चीखे उभरती हैं

पर

सत्यवती को बचाने वाला

कोई नहीं आता ।

चीखे मौन हो जाती हैं

वासना तृप्त

चलता रहता हैं

संसार का प्रेम - व्यापार



कमेंट्स यहाँ दे प्रेम - व्यापार


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Friday, March 27, 2009

मै अपनी धरती को अपना वोट दूंगी आप भी दे कैसे ?? क्यूँ ?

शनिवार २८ मार्च २००९
समय शाम के ८.३० बजे से रात के ९.३० बजे
घर मे चलने वाली हर वो चीज़ जो इलेक्ट्रिसिटी से चलती हैं उसको बंद कर दे
अपना वोट दे धरती को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिये
पूरी दुनिया मे शनिवार २८ मार्च २००९ समय शाम के .३० बजे से रात के .३० बजे

ग्लोबल अर्थ आर { GLOBAL EARTH HOUR } मनाये गी और वोट देगी अपनी धरती को
इस विषय मे ज्यादा जानकारी यहाँ उपलब्ध हैं

जीवन के भीतर स्त्री


लम्बी चौडी जायदाद नहीं
एक घर चाहती हैं वे केवल
शायद पूरा घर भी नहीं
बस एक चुल्हा ताकि
घर भर को खिला कर
संतुष्ट हो, सो सके
कल के भोजन के बारें में
फिक करते हुये।


चाँद की कहानी कहते हुये वे चाँद पर जा पहुँचती हैं
अपनी कमनियता के किस्सों को
हवाओं में बिखरते हुये
कुछ न करते हुये भी
बहुत कुछ कर रही होती हैं वे
अपनी सृजनशीलता से रच रही होती है
स्वपनिले संसार की रूपरेखा


हमेशा बचाये रखा है उन्होनें
घर का सपना
आँधी तुफानों के बीच भी
जितनी शिद्दत से वे प्रेम करती है
उतनी ही शिद्दत से घृणा
मासुमियता, उदारता, करुणा के विष्षणों के साथ
वे बेहद खूबसूरत दिखाई पडती हैं


कभी कभी वे सच के इतने करीब होती हैं
की छू सकती हैं अपनी आत्मा का पवितर जल
कभी वे बिना पक्षपात के इतनी झूठी हो सकती है
की आप दुनिया जहान से नफरत करने लगें
अपनी अनेकता के साथ
राधा, मीरा, सीता का बाना ओढती हैं
एक देश में अरृणा राय तो
दुसरे देश में सु कि
किसी तीसरे देश में शीरीन आबादी बन
अपने आप को सिदध कर रही होती हैं

उन्कें यहाँ हक्कीत और स्वपन में अधिक अंतर नहीं है
यही एकमात्र कारण है
हक्कीत को सपना और
सपने को हक्कीत समझनें में वे भूल कर देती हैं
जीवन का नब्बे प्रतिशत प्रेम
उन्के करीब से हो कर गुजरता है


उन्का साथ इन्दरधनुष, तितली, फुल, कविता,
खुश्बू, घटाओं और जिंदगी का साथ है
उन्की आखें जिस क्षण तुम्हारी ओर
देखती है वे क्षण ठहरे रहते हैं हमेशा
तमाम उमर तुम उन क्षणों के बीच से होकर
गुजरना चाहते हो तुम


कभी वे मुस्कुराहट बन
तस्वीर के चारों कोनों में फैल जाती हैं
तो कभी आँसुओं की तरह
शून्य में सिमट जाती हैं
स्त्री कभी बिखरती नहीं
अरबों खरबों अणुओं में जुडती नहीं
बिम्ब से मूरत में तबदील हो्
माँ, बहन, बेटी बन जाती है
और कविता के अंदर
हमेशा जीवित रहती हैं
संवेदना बन कर।

Friday, March 13, 2009

होली

फागुन आया उड़ रहाअबीर और गुलाल
होली में सब मस्त हुएकिसका पूछे हाल


बसंती रंगो मे डूबे
khila हास परिहासफागुन में मदमस्त हुए सबछाया उल्लास
सरसों फूली टेसू महकाखिला हारसिंगार


पीली चुनर ओढ़करप्रकृति ने किया श्रृंगार .

Tuesday, March 10, 2009

होली के पावन पर्व की हिन्दी ब्लॉग परिवार को बधाई ।

*रोशनी*

मन के अंधेरों में भटकोगे तो रोशनी कैसे पाओगे ,
सोचने को तो बहुत है पर कुछ करके तो दिखाओगे ,
कल्पना की उड़ान तज कर अब यथार्थ अपना लो ,
तभी तो संकट- संघर्ष में धरा पर पैर जमालोगे.।

साहस करो तो मन के अंदर भी तेज ही पाओगे ,
तन की तपन तज तब ही तो तुम आगे आओगे,
जीवन की सूखी फुलवारी में आशा के दीप जलेंगे ,
विद्युत् लय से तिमिर चीरकर स्वप्न पूरा पाओगे।


*अलका मधुसूदन पटेल*


Monday, March 9, 2009

औरतें औरतें नहीं हैं !

कविता का मन

ये पोस्ट कविता वाचक्नवीजी की मेहनत हैं । आप भी पढे और अपने विचार दे



बचपन
में खेलते खेलते या खाते-खाते, या कई बार सोते में ही (मुख्य तो यही क्रम होता है, उस उम्र में) एक आवाज, बल्कि आवाज़ भी क्या चीत्कार सुनाई पड़ा करती थी, यह चीत्कार इतनी भयंकर इतनी तीखी होने के साथ साथ इतनी दीर्घकालिक होती कि कई बार उस चीखने वाले/वाली से ही घृणा से भर जाता मन।उस चीख /चीत्कार की खोज में दौड़ते एक दिन पाया कि .... की बस्ती के कुछ लोग एक सूअर/ सूअरी को पकड़ने के लिए धड़े दल में उस मोहल्ले से इस मोहल्ले तक की घेरेबंदी वाली दौड़ लगा रहे हैं और हमें घृणित प्रतीत होने वाला वह प्राणी भाग भाग कर बेहाल दुरावस्था में है| हर बार अंत में वह पकडा जाता /जाती। अंत उसका यही होता कि उस बिरादरी के लोगों के यहाँ होने जा रहे आयोजन के लिए उसे जिंदा जला कर भूना जाता। वह पूरी प्रक्रिया तो जान ने का कभी दुस्साहस नहीं हो पाया किंतु उसके चारों पैर बाँध कर उसे अग्नि के हवाले किए जाते तक देखा। भीषण दृश्य होता था। हवा में दुर्गन्ध चीत्कारें। कई कई रात डर पीड़ा में कांपते गुजरते। बचपन बीता, घर छूटा और वह चीत्कार दृश्य भी।

गत दिनों एक ऐसे यथार्थ से आँखें फटी रह गईं कि वह बचपन का दृश्य उस दिन से बार बार डरपा रहा है, यादों में उमड़ा रहा है। आज के एक भीषण यथार्थ को प्रस्तुत करती कविता के लिए जब मैंने तत्सम्बन्धी वास्तविकताओं के चित्र देखे तो तब से हाथ- पैर बँधी एक स्त्री का चित्र ठीक उस सूअरी की याद दिलाता है, जिसे जिंदा आग में झोंक दिया जाता था और उसके तड़फड़ा कर आग से बाहर उलट/ झपट पड़ने की आशंका को दूर करने के लिए चारों और लोग उसे डंडे से ताने आग पर सेंकते रहते, धकेलते रहते। यदि किसी स्त्री को आज के युग में आप ऐसी अवस्था में देखें तो क्या हो मन की स्थिति ? ऐसी ही कष्ट में बेहाल स्त्रियों के चित्र देख मेरे रोंगटे खड़े हो गए, उनकी पीड़ा से त्रस्त हूँ .


चित्र के लिए तो वहीं जाना होगा ( वहाँ पहला चित्र ), किंतु इस पीड़ा को ऋषभदेव जी ने जो शब्द दिए हैं उन्हें मैं अपनी पसंद के रूप में आप को यहीं पढ़वा रही हूँ --





औरतें औरतें नहीं हैं !

-ऋषभ देव शर्मा




वे वीर हैं
मैं वसुंधरा.
उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
'वीर भोग्या वसुंधरा.'

वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
भोगते आए हैं,
उनकी विजयलिप्सा अनादि है
अनंत है
विराट है.

जब वे मुझे नहीं जीत पाते
तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
दिखाते हैं अपनी वीरता.

युद्ध कहने को राजनीति है
पर सच में जघन्य अपराध !
अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
औरतों के खिलाफ !

युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
उनके वस्त्र उतारे जाते थे
बाल खींचे जाते थे
अंग काटे जाते थे
शील छीना जाता था ,
आज भी यही सब होता है.
पुरुष तब भी असभ्य था
आज भी असभ्य है,
तब भी राक्षस था
आज भी असुर है.

वह बदलता है हार को जीत में
औरतों पर अत्याचार करके.

सिपाही और फौजी
बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.

औरते या तो मर जाती हैं
[ लाखों मर रही हैं ]
या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
..

वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !

वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
मेरी आँखों के आगे.
पति की आँखों के आगे
पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
माता-पिता की आँखों आगे
कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.

एक एक औरत की जंघाओं पर से
फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !

औरतें औरतें हैं
न बेटियाँ हैं, न बहनें;
वे बस औरतें हैं
बेबस औरतें हैं.
दुश्मनों की औरतें !

फौजें जानती हैं
जनरल जानते हैं
सिपाही जानते हैं
औरतें औरतें नहीं होतीं
अस्मत होती हैं किसी जाति की.

औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
औरतें हैं अस्मिता
औरते हैं आज़ादी
औरतें गौरव हैं
औरतें स्वाभिमान.

औरतें औरतें नहीं
औरतें देश होती हैं.
औरत होती है जाति
औरत राष्ट्र होती है.

जानते हैं राजनीति के धुरंधर
जानते हैं रावण और दुर्योधन
जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
जानते हैं हिटलर और याहिया
कि औरतें औरतें नहीं हैं,
औरतें देश होती हैं.
औरत को रौंदो
तो देश रौंदा गया ,
औरत को भोगो
तो देश भोगा गया ,
औरत को नंगा किया
तो देश नंगा होगा,
औरत को काट डाला
तो देश कट गया.

जानते हैं वे
देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
जब तक स्वाभिमान बचा रहे!

इसीलिए
औरत के जननांग पर
फहरा दो विजय की पताका
देश हार जाएगा आप से आप!

इसी कूटनीति में
वीरगति पा रही हैं
मेरी लाखों लाख बेटियाँ
और आकाश में फहर रही हैं
कोटि कोटि विजय पताकाएँ!

इन पताकाओं की जड़ में
दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
बच्चियों की
उनकी माताओं की
उनकी दादियों-नानियों की.

उन सबको सजा मिली
औरत होने की
संस्कृति होने की
सभ्यता होने की.

औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!

औरत को जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना,
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना,
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,

इसीलिए तो
उनके लिए
औरतें ज़मीनें हैं;
वे ज़मीन जीतने के लिए
औरतों को जीतते हैं!
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