सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, May 14, 2009

बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ

मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं
कह कर कब तक
बेटी को बेटे से कमतर मानोगे
और
कब बेटी को सिर्फ़ और सिर्फ़ इस लिये चाहोगे
कि वो बेटी तुम्हरी हैं

हर समय बेटे रूपी कसौटी पर
क्यों बेटियों के हर किये को
कसा जाता हैं


और कब तक बेटियों को
अपना खरा पन
बेटे नाम कि कसौटी पर
घिस घिस कर
साबित करना पडेगा

कुछ इतिहास हमे भी बताओ
कुछ कारण यहाँ भी दे जाओ
बेटो ने ऐसा क्या किया
जो बेटी को बेटे जैसा
तुम बनाते जाते हो
और उसके अस्तित्व को
ख़ुद ही मिटाते जाते हो

या
बेटे जैसा कह कर
अपने मन को संतोष तुम देते हो

बेटा और बेटी
दोनों अंश तुम्हारे ही हैं
फिर जैसा कह कर
एक आंख को क्यूँ
दूसरी से नापते हो


बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
बेटियाँ बस बेटियाँ होती हैं





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12 comments:

vandana said...

bahut hi gahri soch ke sath likhi gayi ...........kash ye soch sabki hoti.

रंजन said...

"बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
बेटियाँ बस बेटियाँ होती हैं"

बहुत सुक्ष्म.. व्यर्थ क्यो तुलना करें... हो है जैसा है..

बहुत खुब..

कुश said...

मैं इस विषय पर पहले भी कई बार लिख चूका है.. बहुत ठीक कहा है आपने..

शोभना चौरे said...

bhut ateek vichar .beta betahi hota hai aur beti beti .dono ki apni visheshta hai .ha ye bhi sach haiki dusre ko bura banakar ham ache nhi ban skte theek usi tarh ,bdi line chahye to choti line ko mitaye nhi uske upar bdi line khichna hoga .
aur kuch ne bdi line ko khichar kar apne ko bada sabit kiya hai .
dhnywad

Abhishek Mishra said...

Sahi kaha aapne.

प्रकाश गोविन्द said...

"कब तक बेटियों को
अपना खरा पन
बेटे नाम कि कसौटी पर
घिस घिस कर
साबित करना पडेगा"

बहुत सारगर्भित बात कही आपने कविता के माध्यम से !

मीनाक्षी said...

बहुत गहरी बात कह दी आपने...समाज इस बात को पचाने में अभी वक्त लेगा... वैसे सोच मे बदलाव तो आ रहा है लेकिन बेहद धीमी गति में...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

समाज अभी और वक़्त मांगता है बेटी बेटे को एक समान समझने के लिए ...अभी भी बेटे होने का गरूर बेटे वालों के चेहरे पर दिख जाता है ...बेटी को कम आंकना कोई माँ बाप नहीं चाहता ..

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया लिखा आपने .. बेटियां तभी पिछडती हैं .. जबतक उन्‍हें माहौल नहीं मिलता .. वरना वे बेटों से कम नहीं ।

आकांक्षा~Akanksha said...

Sundar Bhav...sundar kavita.

Science Bloggers Association said...

और अक्सर बेटों से बेहतर साबित होती हैं बेटियां।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

डा.राष्ट्रप्रेमी said...

बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
बेटियाँ बस बेटियाँ होती हैं
बहुत खूब आप यथार्थ को स्वीकार कर रही है
किंतु बेटियाँ बस बेटियाँ नही,
बेटियाँ, बेटियाँ ही होती है,
बेटियो को को बेटा बनाने का प्रयत्न ही बेटियो व समाज के लिये घातक सिद्ध हो रहा है,
बेटे, बेटियाँ दोनो ही अपनी-अपनी भूमिका मे महत्व पूर्ण है, प्रकृति की अद् भुत रचनाये है.