सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, June 23, 2010

भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं

भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं

पहले हमारी बेटी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी पत्नी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी माँ बन कर वो
नाम पाती थी

अब वो अपना नाम खुद बनाती हैं
हमारे नाम के बिना भी
जीना चाहती हैं
अब इसको भटकाव ना कहे तो
क्या कहे ??

वो समानता की बात करती हैं
वो बदलाव की बात करती हैं
वो निज अस्तित्व की बात करती हैं
ये सब भटकाव नहीं तो और क्या हैं

भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं


© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!

8 comments:

वन्दना said...

गज़ब का कटाक्ष्।

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत सही ,
इसी पथ को भटकने में उसने सदियों लगा दीं .
इस जीवन का अर्थ समझने में जिंदगियां गवां दीं .
आज आँखें खुली है तो सबने उनको गलत हवा दी है.
चर्चा का विषय बना कर उसकी आजादी को सजा दी है.

kunwarji's said...

"भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं"

gehre bhaav...

kunwar ji,

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सत्य वचन।
--------
आखिर क्यूँ हैं डा0 मिश्र मेरे ब्लॉग गुरू?
बड़े-बड़े टापते रहे, नन्ही लेखिका ने बाजी मारी।

Sadhana Vaid said...

भटकाव के इस पथ पर पहुँच कर वह वस्तु से इंसान तो बनी कम से कम ! यह भटकाव भी वन्दनीय है ! बहुत खूब !

Tarkeshwar Giri said...

Blkul sahi kaha hai aapne.

रचना दीक्षित said...

कविता तो बहुत अच्छी है पर इसे एक हल्की फुल्की हंसी कहें, एक कटाक्ष कहें या समाज पर एक सीधा प्रहार????? इतने सारे सवाल!!!!!!!!

mukti said...

great !