सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, March 27, 2009

जीवन के भीतर स्त्री


लम्बी चौडी जायदाद नहीं
एक घर चाहती हैं वे केवल
शायद पूरा घर भी नहीं
बस एक चुल्हा ताकि
घर भर को खिला कर
संतुष्ट हो, सो सके
कल के भोजन के बारें में
फिक करते हुये।


चाँद की कहानी कहते हुये वे चाँद पर जा पहुँचती हैं
अपनी कमनियता के किस्सों को
हवाओं में बिखरते हुये
कुछ न करते हुये भी
बहुत कुछ कर रही होती हैं वे
अपनी सृजनशीलता से रच रही होती है
स्वपनिले संसार की रूपरेखा


हमेशा बचाये रखा है उन्होनें
घर का सपना
आँधी तुफानों के बीच भी
जितनी शिद्दत से वे प्रेम करती है
उतनी ही शिद्दत से घृणा
मासुमियता, उदारता, करुणा के विष्षणों के साथ
वे बेहद खूबसूरत दिखाई पडती हैं


कभी कभी वे सच के इतने करीब होती हैं
की छू सकती हैं अपनी आत्मा का पवितर जल
कभी वे बिना पक्षपात के इतनी झूठी हो सकती है
की आप दुनिया जहान से नफरत करने लगें
अपनी अनेकता के साथ
राधा, मीरा, सीता का बाना ओढती हैं
एक देश में अरृणा राय तो
दुसरे देश में सु कि
किसी तीसरे देश में शीरीन आबादी बन
अपने आप को सिदध कर रही होती हैं

उन्कें यहाँ हक्कीत और स्वपन में अधिक अंतर नहीं है
यही एकमात्र कारण है
हक्कीत को सपना और
सपने को हक्कीत समझनें में वे भूल कर देती हैं
जीवन का नब्बे प्रतिशत प्रेम
उन्के करीब से हो कर गुजरता है


उन्का साथ इन्दरधनुष, तितली, फुल, कविता,
खुश्बू, घटाओं और जिंदगी का साथ है
उन्की आखें जिस क्षण तुम्हारी ओर
देखती है वे क्षण ठहरे रहते हैं हमेशा
तमाम उमर तुम उन क्षणों के बीच से होकर
गुजरना चाहते हो तुम


कभी वे मुस्कुराहट बन
तस्वीर के चारों कोनों में फैल जाती हैं
तो कभी आँसुओं की तरह
शून्य में सिमट जाती हैं
स्त्री कभी बिखरती नहीं
अरबों खरबों अणुओं में जुडती नहीं
बिम्ब से मूरत में तबदील हो्
माँ, बहन, बेटी बन जाती है
और कविता के अंदर
हमेशा जीवित रहती हैं
संवेदना बन कर।

7 comments:

vandana said...

badi gahri soch ke sath likhikavita

रचना said...

bahut gehraayii haen aap ki kavita mae
vipin accha lagaa ki aapney is blog ko join kiya

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही बढ़िया कविता .....विपिन आपका स्वागत है ..बहुत सच्चा अच्छा लिखा है आपने

gyaana said...

प्रिय विपिन चौधरी ,

बहुत अच्छा व सरल लिखा है ,बधाई.

पड़ोस की वृद्धा कुछ भी काम न रहने पर,
हाथ में सुई तागा लेकर कुछ न कुछ सीने लगती है ,
शायद वो भोगे हुए सुख को, आने वाले दुःख से जोडकर ,
समय की एक नई रजाई बुनती है.

*अलका मधुसूदन पटेल*

ravi sharma said...

बहुत अच्छी रचनाएँ हैं. हिंदी कविता का मेरा प्रयास भी देखें. terimeriuskibaat.blogspot.com

मीनाक्षी said...

स्त्री के जीवन चरित्र को सुन्दर कविता के रूप मे उतारा गया है.

रेखा श्रीवास्तव said...

नारी को इतनी गहरे से अगर सभी देखने लगें , तो फिर वह कहाँ रह जायेगी - उपेक्षिता, शोषिता , उसको भी आसमान चाहिए उड़ने के लिए फिर उसकी उडान तो देखिये. कभी कम नहीं है. नारी के इस रूप को अभिव्यक्त करने के लिए आप बधाई के पात्र है.