सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, July 22, 2009

स्वयम्बर से वनवास तक सीता ने बहुत सहा था

राखी सावंत ने रचा स्वयम्बर
बनने चली वो सीता
उम्मीद थी उसको
मिलेगे राम
पर शायद ये भूल गयी
राम मिलेगे
तो एक कहीं धोबी भी होगा
और फिर एक वनवास भी होगा

क्यूँ उन प्रथाओं को बारबार
दोहराते हैं जिनको
मिटाने मे लोगो ने युग लगा दिये

स्वयम्बर क्यूँ हो फिर
अग्निपरीक्षा क्यूँ हो फिर
और वनवास भी क्यूँ हो फिर

मत दोहराओ इतिहास
मत बनाओ नारी को फिर
रुढिवादी सोच का दास

सीता से राखी तक सफर तो ठीक था
कहीं कुछ आगे तो बढ़ा था
पर राखी से सीता तक का सफर
एक तरीका होगा
फिर नारी के अस्तित्व को मिटने का

स्वयम्बर से वनवास तक
सीता ने बहुत सहा था
क्या राखी तुम भी सहना चाहोगी

नहीं तो फिर क्यूँ रचा
ये स्वयम्बर
क्यूँ पुरानी परिपाटी
फिर दोहरायी



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

7 comments:

mehek said...

iska jawab shayad khud rakhi bhi nahi de paaye,bas kuch din ka tamjham hai.

vandana said...

achcha prashn uthaya hai.

MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर said...

आपने सुन्दर कविता का आगाज किया।

वैसे इस पर एक विचार आज मुम्बई टाईगर पर भी है समय मिली तो समीक्षा करे

आभार
मुम्बई टाईगर
हे प्रभू यह तेरापन्थ

रचना said...

मुंबई टाइगर
मित्र आपके ब्लॉग पर मे पहले ही कमेन्ट दे आयी
आप यहाँ आये थैंक्स

वाणी गीत said...

राखी और सीता में नारी होने के अलावा कोई बात कॉमन नहीं है ...जो भी धनुष तोड़ लेता सीता को उसके साथ जाना ही होता...यहाँ राखी के पास अवसर और संभावनाएं ज्यादा है ..!!

हिमांशु । Himanshu said...

प्रभावी ढंग से उठायी है आपने यह बात ।
वाणी जी की बात से सहमत हूँ ।
वैसे देखा नहीं है यह स्वयंवर आज तक ।

रश्मि प्रभा... said...

बहुत ही गूढ़ तथ्य