सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Monday, January 19, 2015

तुमने कहा था...


तुमने कहा था मां
बहुत बोलती हो तुम
चपर चपर
बहस करती हो.
हर बात पे
उठाती हो सवाल
पूछती हो क्यों.
टिक पाओगी ?
ससुराल में ??

तब से मां
बस तब से
चुप रहना सीख लिया मैने
प्रश्न चिह्न की जगह
विराम लगाना सीख लिया
हर उठते हुए सवाल पर.

नहीं बोली थी मैं कुछ भी
जब बहुत कम करके
आंका गया था
तुम्हारे गाढ़े खून-पसीने से एकत्र
दहेज की वस्तुओं का मोल

नहीं बोली थी मैं
तब भी कुछ भी
जब उलाहने में
ज़िक्र लाया गया मायके का
और उठी थी उंगलियां
तुम्हारी दी हुई सीख पर

पी गई थी मैं मां,
अंदर ही अंदर
तेरे और अपने
अपमान का घूंट
पर चुप रही थी मैं मां,
मैने तुम से
कुछ भी तो नहीं कहा था.

मुझे टिकना था
रहना था वहां
जहां भेजा था तूने
डोली में बिठा कर मुझे.

मैं तब भी नहीं बोली थी मां
जब हर सुख-दुख में
मेरा साथ देने की
सौगन्ध उठाने वाला
तुम्हारा दामाद
फूट फूट के रोया था
दूसरी बेटी के जन्म पर
और जी भर के कोसा था
उसने मुझे और
उस नन्ही सी जान को

पी गई थी मैं
आंसुओं के साथ साथ
खून के घूंट भी
पर चुप रही थी मैं
कुछ भी तो नहीं बोली थी

मुझे साबित करना था
कि तुम्हारी बेटी
टिक सकती है,
रह सकती है
हर तरह की परिस्थिति में.

नहीं उंगली उठवानी थी मुझे
नहीं खड़े करने थे सवाल
तुम्हारे दिये गए संस्कारों पर.

और बोझ नहीं बनना था
मुझे फिर से
जिसे बड़ी मुश्किल से उतार
सुकून का सांस
ले पाए थे तुम सब.

पर मां
अब मैं चुप नहीं रहूंगी.
अब मैं बोलूंगी.
नहीं मारूंगी मैं हरगिज़
अपने ही अंश को
नहीं सहूंगी मैं कदापि
भ्रूण-हत्या के दंश को.

और हां !
तुम्हारे पढ़ाए पाठ के साथ-साथ
मैं अपनी बेटियों को
एक और पाठ भी पढ़ाऊंगी.

चुप रहने के साथ-साथ
मैं उन्हें बोलना सिखाऊंगी..

हां मां ,
उन्हें अन्याय के विरुद्ध
बोलना सिखाऊंगी.

                  डॉ.पूनम गुप्त

Monday, September 22, 2014

विचार

ना जाने क्यूँ
आजकल कुछ लिख नहीं पाती

विचार
दिमाग की दीवारो से टकरा कर
वापिस लौट आते है

आवाज़ें
वादियों की तरह
मन में गूंज के रह जाती है

ऐसा क्या परिवर्तन हुआ है
जो मेरे अंतर्मन को
अपनी भाषा बोलने नहीं दे रहा
हर रात अपने ही विचारो के साथ
मैं एक संघर्ष करती हुँ

उन्हें पन्ने पे उतारने का संगर्ष
उन्हें विचारो से व्यक्तित्व बनाने का संघर्ष
उन्हें मृत से जीवित बनाने का संघर्ष
उन्हें विचारो से शब्द बनाने का संघर्ष

पर सत्य ये भी है की
यदि पन्नो पे न छप सके फिर भी
ये विचार कमज़ोर नहीं होते
व्यक्ति मर जाता है
परन्तु उसके विचार जीवित रहते है
शब्दों को परिभाषित
होने के लिए विचारों की आवश्यक्ता है
विचारों को नहीं
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Thursday, July 10, 2014

ढोंगी

 

इस समाज के कुछ लोग 
मानते हैं उसे भगवान्
या फिर कोई अवतार 
और वह गढ़ता है कुछ कहानियाँ 
जिससे बना रहे यह भ्रम लोगों का 

नहीं जानते लोग इस समाज के 
कि जब वह बांच रहा होता है ज्ञान 
महिला उत्पीड़न के विरुद्ध किसी सभा में 
उसकी पत्नी कर रही होती है नाकामयाब कोशिश 
अपने बदन के खरोंचो को छुपाने की 
डाल रही होती है आँखों में गुलाब जल 
कि कम हो रोने के बाद आँखों का सूजन 
और वह बनी रहे सफल अभिनेत्री साल दर साल 


भले ही चिल्लाता हो वह अपने बच्चे की जिद पर
और नहीं संभाल पाता हो उसकी बचकानी आदतें 
या कर देता हो उसकी कुछ मांगे पूरी 
गैर जिम्मेदाराना तरीके से, छुड़ाने को पीछा 
पर कहाँ मानेंगे ये सब उस बस्ती के लोग 
जहाँ वह पिलाता है हर पोलियो रविवार को 
गरीब छोटे बच्चों को दो बूँद जिंदगी के 
धूप में रहकर खड़ा समाज सेवा के नाम


करती है अचरज उसके घर की कामवाली 
कि साहेब धमका आते हैं हर बार उसके पति को 
जब भी वह उठाता है हाथ उसपर 
और देती है दुआएं मालकिन को सुहागिन बने रहने की 
सहम जाते हैं पुलिसकर्मी भी देखकर 
उसके खादी के कुरते को 
और लगाते हैं जयकारा साहेब के इस महान कृत्य पर 


घर के सामने पार्क में खेलते सभी बच्चे हैं उसके दोस्त 
और गली के हर कुत्ते ने खाया है उसके हाथ से खाना 
मुहल्ले के सभी बुजुर्गों को झुक कर करता है प्रणाम 
मदद के लिए सबसे पहले लोग उसे करते हैं याद 


डाल आई है आज उसकी पत्नी 
तलाक की एक तरफा अर्जी अदालत में 
और सोच रही है कौन सी सूचना उसे मिलेगी पहले 
एक झूठे रिश्ते से उसके निजात पाने की 
या सार्वजनिक सेवा व सामुदायिक नेतृत्व का मैग्सेसे पुरस्कार 
उस ढोंगी के नाम होने की !!!


सुलोचना वर्मा
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विदाई

 
दिवाली के बाद 
जब आयी सहालग की बारी 
हो गई डोली विदा घर से 
और चले गए बाराती 

खड़ा रहा पिता 
दुआरे पर बहुत देर 
मन सा भारी कुछ लिए


देखती रही माँ एकटक 
गुलाबी कुलिया चुकिया 
जो भरा था अब भी 
खाली-खाली से घर में 


----सुलोचना वर्मा----

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Saturday, June 14, 2014

नारी!! तुम ही....

तुम अनन्या तुम लावण्या
तुम नारी सुलभ लज्जा से आभरणा
तुम सहधर्मिनी तुम अर्पिता
तुम पूर्ण नारीश्वर गर्विता




उत्तरदायित्वों की तुम निर्वाहिनी
तुम ही पुरुष की चिरसंगिनी
तुम सौन्दर्य बोध से परिपूर्णा
तुम से ही धरित्री आभरणा




तुम ही स्वप्न की कोमल कामिनी
तुमसे सजी है दिवा औ'यामिनी
शिशु हितार्थ पूर्ण जगत हो तुम
गृहस्थ की परिपूर्णता हो तुम




तुमसे ये धरा है चञ्चला
जननी रूप मे तुम निर्मला
कभी कठोर पाषाण हृदय से रंजित
कभी करूणामयी हृदय विगलित



कभी तुम अतसि-रूपसी सौन्दर्या
कभी हुंकारित रण-वीरांगना
हे नारी!! तुम ही सृष्टिकर्ता
तुमसे ही सम्भव पुरुष-प्रकृति वार्ता




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Tuesday, April 22, 2014

घर से भागी हुई लड़की

घर से भागी हुई लड़की
चल पड़ती है भीड़ में
लिए अंतस में कई प्रश्न 
डाल देती है संदेह की चादर
अपनापन जताते हर शख्स पर
पाना होता है उसे अजनबी शहर में
छोटा ही सही, अपना भी एक कोना
रह रहकर करना होता है व्यवस्थित
उसे अपना चिरमार्जित परिधान
मनचलों की लोलुप नज़रों से बचने के लिए
दबे पाँव उतरती है लॉज की सीढियां
कि तभी उसकी आँखें देखती है
असमंजस में पड़ा चैत्र का ललित आकाश
जो उसे याद दिलाता है उसके पिता की
करती है कल्पना उनकी पेशानी पर पड़े बल की
और रह रहकर डगमगाते मेघों के संयम  को
सौदामनी की तेज फटकार
उकेरती है उसकी माँ की तस्वीर
विह्वल हो उठता है उसका अंतःकरण
उसके मौन को निर्बाध बेधती है प्रेयस की पदचाप
और फिर कई स्वप्न लेने लगते हैं आकार
पलकों पर तैरते ख्वाब के कैनवास पर
जिसमें वह रंग भरती है अपनी पसंद के
यादें, अनुभव, उमंग  और आशायें
प्रत्याशा की धवल किरण
और एक अत्यंत सुन्दर जीवन
जिसमें वह पहनेगी मेखला
और हाथ भर लाल लहठी
जहाँ आलता में रंगे पाँव
आ रहे हों नज़र
कैसे तौले वह खुद को वहाँ
सामाजिक मापदंडों पर  .......

(c)सुलोचना वर्मा


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Saturday, February 1, 2014

फ़र्ज़ का अधिकार

इस पुरुष प्रधान समाज में
सदा सर्वोपरि रही
बेटों की चाह
उपेक्षा, ज़िल्लत, अपमान से
भरी रही
बेटियों की राह
सदियों से संघर्षरत रहीं
हम बेटियाँ
कई अधिकार सहर्ष तुम दे गए
कई कानून ने दिलवाए
बहुत हद तक मिल गया हमें
हमारी बराबरी का अधिकार
जन्म लेने का अधिकार
पढने का,
आगे बढ़ने का अधिकार
जीवन साथी चुनने का अधिकार
यहाँ तक कि
कानून ने दे दिया हमें
तुम्हारी संपत्ति में अधिकार
लेकिन .....
हमारे फर्जों का क्या?
आज भी बेटियाँ बस एक दायित्व हैं
आज भी हैं केवल पराया धन
हर फ़र्ज़ केवल ससुराल की खातिर
माँ-बाप के प्रति कुछ नहीं?
बुढ़ापे का सहारा केवल बेटे,
बेटियाँ क्यूँ नहीं?
क्यूँ बेटी के घर का
पानी भी स्वीकार नहीं?
क्यों बुढ़ापे का सहारा बनने का
बेटियों को अधिकार नहीं?
सामाजिक अधिकार मिल गए बहुत
आज अपनेपन का आशीर्वाद दो
कहती है जो बेटियों को परायी
उस परंपरा को बिसार दो
हो सके तो मुझको, मेरे
फ़र्ज़ का अधिकार दो
मुझको मेरे फ़र्ज़ का अधिकार दो
........................................आलोकिता

Thursday, January 9, 2014

बेगैरत सा यह समाज . . . . .

हर रोज यहाँ संस्कारों को ताक पर रख कर,
बलात् हीं इंसानियत की हदों को तोड़ा जाता है|

नारी-शरीर को बनाकर कामुकता का खिलौना,
स्त्री-अस्मिता को यहाँ हर रोज़ हीं रौंदा जाता है|

कर अनदेखा विकृत-पुरुष-मानसिकता को यह समाज,
लड़कियों के तंग लिबास में कारण ढूंढता नज़र आता है|

मानवाधिकार के तहत नाबालिग बलात्कारी को मासूम बता,
हर इलज़ाम सीने की उभार और छोटी स्कर्ट पर लगाया जाता है|

दादा के हाथों जहाँ रौंदी जाती है छः मास की कोमल पोती,
तीन वर्ष की नादान बेटी को बाप वासना का शिकार बनाता है|

सामूहिक बलात्कार से जहाँ पाँच साल की बच्ची है गुजरती,
अविकसित से उसके यौनांगों को बेदर्दी से चीर दिया जाता है|

शर्म-लिहाज और परदे की नसीहत मिलती है बहन-बेटियों को,
और माँ-बहन-बेटी की योनियों को गाली का लक्ष्य बनाया जाता है|

स्वयं मर्यादा की लकीरों से अनजान, लक्ष्मण रेखा खींचता जाता है|
बेगैरत सा यह समाज हम लड़कियों को हीं हमारी हदें बताता है|



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Thursday, October 10, 2013

दुर्गा पूजा

 शक्ति के उपासक हैं ये लोग
यहाँ स्कंदमाता की पूजा होती है
गणेश कार्तिक को भोग लगता है
और अशोक सुंदरी फुट फुट रोती है

चंदन नही, रक्त भरे हाथों से
देवी का शृंगार करते हैं
गर्भ की कन्याओं का जो
वंश के नाम संहार करते हैं

अचरज होता है क्यूँ शक्ति के नाम पर
नौ दिनो का उपवास होता है
कहाँ मिलेंगी कंजके लोगों को
जहाँ गर्भ उनका अंतिम निवास होता है


कभी मन्त्र से, कभी जाप से
नर तुमको छल रहा है
मत आओ इस धरती पर देवी 
यहाँ तो चिरस्थायि
भद्रकाल चल रहा है


सुलोचना वर्मा


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Saturday, September 21, 2013

दशहरा

क्यूँ पुतले को फूँककर
खुशी मनाई जाए
क्यूँ एक रावण के अंत का
जश्न मनाया जाए

कितने ही रावण विचर रहे
यहाँ, वहाँ, और उस तरफ
क्यूँ ना उन्हे मुखौटों से पहले
बाहर लाया जाए

इस साल दशहरे में नयी 
रस्म निभाई जाए

राम जैसे कई धनुर्धरो की
सभा बुलाई जाए
हर रावण को पंक्तिबद्ध कर
सज़ा सुनाई जाए
अंत पाप का करने को उनमे
आग लगाई जाए

हर घर में नई आशा का
दीप जलाया जाए
अपहरण को इस धरती से 
फिर भुलाया जाए
किसी वैदेही को कहीं अब
ना रुलाया जाए
गर्भ की देवियों को भी
बस खिलखिलाया जाए
सुलोचना वर्मा

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Saturday, August 17, 2013

माँ

 माँ, ये नाम है एक अंतहीन विस्तार का
जीवन का, और जीवन के अवतार का
चेहरे की झुर्रियों से टपकती
गरिमा का नाम है माँ
ज़िंदगी की हर तारीख में
पंचांग सी है माँ
कभी सोचा है माँ के उच्चारण में
चंद्रबिन्दु क्यूं लगा है
माँ  की गोद में सर रखकर
वो शीतलता मिलती है
जो किसी वातानुकूलित कमरे में
सर्वथा अनुपस्थित होगी
माँ के उच्चारण में आ-कार भी है
परंतु माँ का आकार शाश्वत है
ममता भी माँ है , अनुसाशण भी माँ है
माँ वो शब्द है जिसका सिर्फ़ अनुवाद ही
शब्दकोष बता सकता है, एहसास नही
माँ एक पेड़ है जो फल भी देती है
और शीतल छाया भी
एक ऐसा पात्र जिसकी महिमा
छंद में नही समा पाती
दोहे छोटे पर जाते हैं
कविता अधूरी सी लगती है
माँ केवल नाम नही
सृजन की जननी है
हर नयी रचना के मूल में
मौजूद है एक माँ
जब भी जीवन अवतरित होता है
तो अवतरित होती है एक माँ

—सुलोचना वर्मा—
 http://sulochanaverma.blogspot.in/
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Monday, June 10, 2013

आज की सीता



वो आज की सीता है
अपना वर पाने को
अब भी स्वय्म्वर रचाती है
वन में ही नही
रण में भी साथ निभाती है
अपनी सीमाएँ खुद तय करती है
लाँघेघी जो लक्ष्मण की रेखा है
परख है उसे ऋषि और रावण की
पर दुर्घटना को किसने देखा है
रावण का पुष्पक सीता को ले उड़ा
लोगो का जमघट मूक रहा खड़ा
लक्ष्मण को अपने कुल की है पड़ी
रावण लड़ने की ज़िद पे है अड़ा
राम ने किया है प्रतिकार कड़ा
कुलवधू का अपहरण अपमान है बड़ा
येन केन प्रकारेन युद्ध है लड़ा
फूट गया रावण के पाप का घड़ा
वैदेही अवध लौट आई है
जगत ने अपनी रीत निभाई है
आरोप लगा है जानकी पर
अग्निपरीक्षा की बारी आई है
तय किया है सती ने अब
नही देगी वो अग्नि परीक्षा
विश्वास है उसे खुद पर
क्यों माने किसी और की इच्छा
सहनशील है वो, अभिमानी है
किसी के कटाक्ष से विचलित
न होने की ठानी है
राम की अवज्ञा नही कर सकती
रघुकुल की बहूरानी है
दुष्कर क्षण है आया
क्या करे राम की जाया
भावनाओं का उत्प्लावन
नैनों में भर आया
परित्याग का आदेश
पुरुषोत्तम ने सुनाया
परित्यक्तता का बोध
हृदय में समाया
भूल किया उसने जो
वन में भी साथ निभाया
राजमहल का सुख
व्यर्थ में बिसराया
हृदय विरह व्यथा से व्याकुल है
मन निज पर शोकाकुल है
उसका त्याग और अर्पण ही
सारे कष्टों का मूल है
किकर्तव्यविमूढ पर संयमी
नही कहेगी जो उस पर बीता है
अश्रु को हिम बनाएगी
विडंबना ये है कि वो आज की सीता है

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Saturday, June 8, 2013

सुलोचना वर्मा की दो कविताएं

विधवा
तुम्हारे अवशान को
कुछ ही वक़्त बीता है
तुम जा बसे हो
उस नीले नभ के पार
इंद्रधनुषी रंगो मे नहाकर
मुझे फिर से आकर्षित
करने को तैयार
उस रोज़ चौखट पर मेरा हाथ था
हर तरफ चूड़ियो के टूटने का शोर था
झुंझला उठती थी मैं जब तुम
बार बार उन्हे खनकाया करते थे
आज उनके टूटने का बेहद ही शोक था
तालाब का पानी सुर्ख था ना की
रक्तिम क्षितिज की परच्छाई थी
माथे की लाली को धोने
विधवा वहाँ नहाई थी
समाज के ठेकेदारो का
बड़ा दबदबा है
सफेद कफ़न मे मुझे लपेटा
कहा तू "विधवा" है
वो वैधव्य कहते है
मैं वियोग कहती हूँ
वियोग - अर्थात विशेष योग
मिलूँगी शीघ्र ही
उस रक्तिम क्षितिज के परे
मिलन को तत्पर
सतरंगी चूड़िया डाली है हाथो मे
पहन रही हूँ रोज़
तुम्हारे पसंदीदा
महरूनी रंग के कपड़े
कही सजती है दुल्हन भी
श्वेत बे-रंग वस्त्रो मे

स्त्री - रुबरु
लड़की, नारी, स्त्री
इन नामो से जानी जाती है
कई उपाधियाँ भी है
बेटी, पत्नी, माँ
अनेक रूपो मे नज़र आती है
पहले घर की रौशनी कहा
तो आँखो के नीचे काला स्याह क्यों?
निर्भया, दामिनी, वीरा भी कहा
पर तब जब कुछ लोगो ने अपनी
पाशविकता का प्रमाण भी दिया
कुछ ने तो परी कहा
परियो से पंख भी दे डाले
जब उनके उड़ने की बारी आई
वही पंख किसी ने काट डाले
ऐसे समाज से आज भी
करती वो निर्वाह क्यों?
लड़की का पिता अपना
सबसे मूल्यवान धन दान कर
कर जोड़े खड़ा है
उधर लड़के की माँ को
लड़के की माँ होने का
झूठा नाज़ बड़ा है
झूठा इसलिए की
उसकी संतान के लिंग निधारण मे
उसका कोई योगदान नही है
तो क्या लड़की के पिता का
कोई स्वाभिमान नही है?
पिता का आँगन छोड़कर
नया संसार बसाया है
माँ के आँचल की छाँव कहाँ
"माँ जैसी" ने भी रुलाया है
रुलाने का कारण?
आज उके बेटे ने
किसी दूसरी औरत को
प्यार से बुलाया है
आज वो इक माँ है
उस पीड़ा की गवाह है
जो उसकी माँ ने कभी
झूठी मुस्कान से दबाया था
बेटी के पैदा होने पर
कब किसने गीत गया था
पति के चले जाने के बाद
माथे की लाली मिटा दी लोगो ने
वो लाली जो उसके मुख का गौरव था
उसे कुलटा, मनहूस कहा
क्या सिर्फ़ पति ही
उसके जीवन का एकमात्र सौरभ था
शीघ्र ही वो दिवस भी आएगा
जब हरयाणा और राजस्थान की तरह
सारे विश्व से विलुप्त हो जाएगी ये "प्रजाति"
फिर राजा यज्ञ करवाएँगे
पुत्री रत्न पाने हेतु
राजकुमारियाँ सोने के पलनो मे पलेंगी
स्वयंवर रचाएँगी,
अपने सपनो के राजकुमार से
फिर द्रौपदी के पाँच पति होने पर
कोई सवाल ना कर सकेगा
उसके चरित्र पर कोई
टिप्पणी नही होगी
नारी को तब कोई भी
"वस्तु" नही कहेगा
संवेदनशील इस चाह को
"तथास्तु" ही कहेगा

Saturday, March 23, 2013

नारी

रौंदोगे कब तक
 नारी का तुम  सम्मान ?
कब तक समझोगे
 तुम उसको एक सामान।

रखोगे तुम कब तक 
उससे एक ही नाता?
कब समझोगे उसे
 बहन बेटी या माता।

क्यों भूल जाते हो
जननी है वह तुम्हारी
और सहचरी ,
जीवन में भरती उजियारी।

नारी है शक्ति
 न समझो  उसे क्षीण तुम।
दुर्गा है, मानो मत 
उसको दींन-हीन तुम।

उसे कुचलने का 
कभी जब सोचोगे,
अपने हाथों अपनी 
जड़ तुम नोचोगे।

हाँ!अपने हाथों अपनी 

जड़ तुम नोचोगे।


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Sunday, December 23, 2012

उसे मौत दो




वो एक नही जो बे-आबरू हुई
क्या हम सबकी रूह बेज़ार नहीं
वो जो लुटी सर-ए-बाज़ार आज
क्या वो इज्ज़त की हक़दार नहीं
कितने ही दुर्शाशन खड़े
पर कोई रखवाला गोपाल नहीं
कहा छुप्पे तुम आज क्रिशन
क्यों किया ध्रोपधि पे आज उपकार नहीं
लुटते, मरते सब देख रहे
कर रहे सियासत इस पर भी
ये कैसा हो गया देश मेरा
यहाँ कोई भी शर्म सार नही
उसकी सिर्फ आबरू नहीं लुटी
उसकी रूह को चीरा है
उसकी आँखों में दहशत है
उसकी आहो में पीड़ा है
वो शर्मनाक हरक़त वाले
उन्हें इस पाप का अंजाम दो
उसे मौत दो, उसे मौत दो 
वो दरिन्दे वो जानवर
किसी माफ़ी के हक़दार नही
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Swati 

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Tuesday, October 30, 2012

प्रश्न



देख के आज नवरात्री का जशन
आत्मा मेरी कर रही प्रश्न
ये कैसा कन्या पूजन है
ये कैसा देवी का आदर
जब खुद अपने हाथो से हम
कर रहे नन्ही कन्यायो का संहार
क्या उन्हें नहीं जीने का अधिकार
देवी की जय करने वालो
तुम कैसे अब चुप बैठे हो
मरते लुट ते देवी के रूपों को कैसे देखे हो
है धिक्कार ऐसी मानवता पे
जिसे अपनी बेटी पे गर्व नही
कोई हक नही इन खूनियो को
के वो माँ का सत्कार करे
इन खून से रंगे हाथो से
माँ भगवती का न सिंगार करे
जो ऐसे कर्म से शर्म सार नहीं
उन्हें देवी पूजन का अधिकार नही !!
उन्हें देवी पूजन का अधिकार नही !!
अँधा धुंध होती कन्या भ्रूण हत्या जैसी शर्म नाक कृत्य हर रोज़ हमारे देश में हो रहे है  और हम देवी पूजन कर आशीर्वाद मांग रहे है !!  ये कैसी विडंबना है !!
Swati
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Thursday, April 19, 2012

औरत और सब्जी --- अपमान रिश्तो का

अब भी कोहनिया जलती हैं
अब भी नमक कम ज्यादा होता हैं
पर
अब बच्चो का थाली फेकना
और
पति का चिल्लाना  
बस वहीँ होता हैं
जहां एक माँ और पत्नी नहीं
एक औरत खाना बनाती हैं

हमारे घर में ऐसी क़ोई
औरत खाना नहीं बनाती
माँ , बेटी , पत्नी और बहू बनाती हैं
जो औरत नहीं हैं
उनको औरत ना कहे

और कहीं औरत देखे
तो घंटी बजा दे ताकि
औरत को इन्सान
वो परिवार समझने लगे

अपमान आप रिश्तो का करते हैं 
जब माँ , बहन , बेटी , पत्नी , बहु को 
महज औरत कह देते हैं 
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Wednesday, March 28, 2012

क्या कोई नाम भी दिया जा सकता हैं इस कविता को ???

दस्तक ब्लॉग पर एक कविता देखी 

कविता का शीर्षक नहीं हैं शायद ऐसी कविताओं का शीर्षक होता ही ना हो , कविता ईशा की हैं
क्या क्या नहीं कह रही हैं . मुझे बहुत कुछ सुनाई दिया आप को भी दिया हो तो कमेन्ट मे बताये . ईशा भी जानना चाहती होगी .
क्या कोई नाम भी दिया जा सकता हैं इस कविता को ???



नारी - नाम है सम्मान का, या
         समाज ने कोई  ढोंग रचा है.


बेटी - नाम है दुलार का, या
         समाज के लिए सजा है.


पत्नी - किसी पुरुष की सगी है, या
           यह रिश्ता भी एक ठगी है.


माँ -  ममता की परिभाषा है, या
        होना इसका भी एक निराशा है.


नारी - नाम है स्वाभिमान का, या
          इसका हर रिश्ता है अपमान का.
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Friday, March 23, 2012

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?

जी आपके स्नेह से अभिभूत हूँ किन्ही कारणों से मैंने सभी साझा ब्लोग्स छोड़ दिए हैं और सबसे खुद को अलग कर लिया है ये मेरे निजी कारण हैं ........अब नारी ब्लॉग पर भी मैं नहीं हूँ इसलिए वहाँ पोस्ट तो नहीं कर सकती हाँ आपको भेज सकती हूँ आप यदि चाहें तो मेरे नाम के साथ वहाँ इसे लगा सकती हैं .........उम्मीद है आप बुरा नहीं मानेंगी .

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?


यहाँ ज़िन्दा कौन है

ना आशा ना विमला

ना लता ना हया

देखा है कभी

चलती फिरती लाशों का शहर

इस शहर के दरो दीवार तो होते हैं

मगर कोई छत नहीं होती

तो घर कैसे और कहाँ बने

सिर्फ लाशों की

खरीद फरोख्त होती है

जहाँ लाशों से ही

सम्भोग होता है

और खुद को वो

मर्द समझता है जो शायद

सबसे बड़ा नामर्द होता है

ज़िन्दा ना शरीर होता है

ना आत्मा और ना ज़मीर

रोज़ अपनी लाश को

खुद कंधे पर ढोकर

बिस्तर की सलवटें

बनाई जाती हैं

मगर लाशें कब बोली हैं

चिता में जलना ही

उनकी नियति होती है

कुछ लाशें उम्र भर होम होती हैं

मगर राख़ नहीं

देखा है कभी

लाशों को लाशों पर रोते

यहाँ तो लाशों को

मुखाग्नि भी नहीं दी जाती

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?



सादर आभार

वन्दना गुप्ता

सर्वाधिकार सुरक्षित!

Monday, February 20, 2012

आवाज टंकार बन चुकी हैं

कल
औरत
एक आवाज थी
दबा दी जाती थी

आज
औरत
एक टंकार हैं

अब लोग दबा रहे हैं
अपने कान
ताकि
टंकार सुनाई ना दे

कल की औरत की आवाज
आज की औरत की
टंकार बन चुकी हैं



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Saturday, January 21, 2012

स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया

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आज एक ख्याल ने जन्म लिया
स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया
ना जाने ज़माना किन सोचो में भटक गया
और स्त्री देह तक ही सिमट गया
या फिर बराबरी के झांसे में फँस गया
मगर किसी ने ना असली अर्थ जाना
स्त्री मुक्ति के वास्तविक अर्थ को ना पहचाना
देह के स्तर पर तो कोई भेद नहीं
लैंगिग स्तर पर कैसे फर्क करें
जरूरतें दोनों की समान पायी गयीं
फिर कैसे उनमे भेद करें
दैहिक आवश्यकता ना पैमाना हुआ 
ये तो सिर्फ पुरुष पर थोपने का 
एक बहाना हुआ 
जहाँ दोनों की जरूरत समान हो
फिर  कैसे कह दें 
स्त्री मुक्ति का वो ही एक कारण  है
ये तो ना स्त्री मुक्ति का पर्याय हुआ
बराबरी करने वाली को स्त्री मुक्ति का दर्शन दिया
मगर ये भी ना सोच को सही दर्शाता है
"बराबरी करना" के भी अलग सन्दर्भ दीखते हैं
मगर मूलभूत अर्थ ना कोई समझता है
बदलो स्त्री मुक्ति के सन्दर्भों को
जानो उसमे छुपे उसके अर्थों को
तभी पूर्ण मुक्ति तुम पाओगी
सही अर्थ में तभी स्त्री तुम कहलाओगी 
सिर्फ स्वतंत्रता या स्वच्छंदता ही 
स्त्री मुक्ति का अवलंबन नहीं
ये तो मात्र स्त्री मुक्ति की एक इकाई है 
जिसके भी भिन्न अर्थ हमने लगाये हैं
उठो जागो और समझो 
ओ स्त्री ..........स्वाभिमानी बन कर जीना सीखो
अपनी सोच को अब तुम बदलो
स्वयं को इतना सक्षम कर लो
जो भी कहो वो इतना विश्वस्त हो
जिस पर ना कोई आक्षेप हो 
और हर दृष्टि में तुम्हारे लिए आदर हो 
तुम्हारी उत्कृष्ट सोच तुम्हारी पहचान का  परिचायक हो 
जिस दिन सोच में स्त्री में समानता आएगी
वो ही पूर्ण रूप में स्त्री मुक्ति कहलाएगी
जब स्वयं के निर्णय को सक्षम पायेगी
और बिना किसी दबाव के अपने निर्णय पर
अटल रह पायेगी
तभी उसकी मुक्ति वास्तव में मुक्ति कहलाएगी
बराबरी का अर्थ सिर्फ शारीरिक या आर्थिक ही नहीं होता
बराबरी का संपूर्ण अर्थ तो सोच से है निर्मित होता

Friday, December 9, 2011

स्वयंवर

स्वयंवर
 जो हुआ था अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका का
सीता और द्रोपदी का
क्या वास्तव में स्वयंवर था क्या?
अगर था,
तो क्या थी स्वयंवर  की परिभाषा?

स्वेछित  वर चुनने का अधिकार
अथवा
कन्या का नीलामी युक्त प्रदर्शन!
जिसमे इच्छुक उमीदवार
धनबल की अपेक्षा
 लगाते थे अपना बाहू-बल
दिखाते थे अपना पराक्रम और कौशल
और जीत ले जाते थे कन्या को
भले ही उसकी सहमति हो या न हो.

तभी तो उठा लाया था  भीष्म
उन तीन बहनों को
अपने बीमार,नपुंसक भाइयों के लिए
और अर्जुन ने बाँट ली थी याज्ञसेनी
 अपने भाइयों में बराबर


वास्तव में ही अगर
स्वयंवर का अधिकार
नारी को  मिला होता
तो अम्बा की 
आत्म(हत्या) का बोझ
इतिहास न ढोता.
महाविध्वंस्कारी,महाभारत का
 महायुद्ध न होता
और हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास
 कुछ और ही होता .
हाँ! कुछ और ही होता .


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Saturday, October 1, 2011

योद्धा

जब भी दिखा हैं मुझे क़ोई योद्धा
नारी के हक़ की लड़ाई लड़ता
उसके आस पास दिखा हैं
एक मजमा उसको समझाता

क़ोई उसको माँ कहता हैं
क़ोई कहता हैं दीदी
क़ोई कहता हैं स्तुत्य
क़ोई कहता हैं सुंदर

और
फिर इन संबोधनों में
वो योधा कहां खो जाता हैं
पता ही नहीं चलता हैं

और
रह जाती हैं बस एक नारी
कविता , कहानी लिखती
दूसरो का ख्याल रखती
तंज और नारियों को
नारीवादी होने का देती

ना जाने कितने योद्धा
कर्मभूमि में कर्म अपने
बदल लेते हैं

और
मजमे के साथ
मजमा बन जीते हैं





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Saturday, September 17, 2011

'मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं'



ये दुनिया है लगती अभिमानी और मतलबी सी
लेकिन उसी में रहते मुझे प्यार करने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

मेरी अकल है घुटनों से ज़्यादा नहीं जिनके लिये
इन्हीं के साथ रहते मुझे पलकों पर बिठाने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

हर नज़र से जहाँ खतरे का अहसास होता है
इन्हीं के बीच रहते मेरे रखवाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

दिलकशी है जिनके लिये सजाने की एक चीज़ महज़
इन्हीं के बीच कहीं जिस्म से पहले रूह देखने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं


दिल पाता है अपमान और ठोकरें ही जहाँ
यहीं रहते मुझे हर हाल में अपनाने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

इन्हीं मेरे बहुत अपनों में मिल गये
मेरी बहनों को सताने वाले हैं
पर मेरी तो ज़ुबाँ पर पड़ गये ताले हैं

इसी दुनिया में रहते हुए, बोलते इसी के खिलाफ़ 
मेरी ज़ुबां पर पड़ते छाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं 




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Thursday, September 15, 2011

बेटी हूँ

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सुन लो हे श्रेष्ठ जनों 
एक विनती लेकर आई हूँ 
बेटी हूँ इस समाज की 
बेटी सी हीं जिद्द करने आई हूँ 
बंधी हुई संस्कारों में थी 
संकोचों ने मुझे घेरा था 
तोड़ के संकोचों को आज 
तुम्हे जगाने आई हूँ 
बेटी हूँ 
और अपना हक जताने आई हूँ 
नवरात्रि में देवी के पूजन होंगे 
हमेशा की तरह 
फिर से कुवांरी कन्याओं के 
पद वंदन होंगे 
सदियों से प्रथा चली आई 
तुम भी यही करते आये हो 
पर क्या कभी भी 
मुझसे पूछा ?
बेटी तू क्या चाहती है ?
चाहत नहीं 
शैलपुत्री, चंद्रघंटा बनूँ 
ब्रम्ह्चारिणी या दुर्गा हीं कहलाऊं 
चाहत नहीं कि देवी सी पूजी जाऊं 
कुछ हवन पूजन, कुछ जगराते 
और फिर .....
उसी हवन के आग से 
दहेज़ की भट्टी में जल जाऊं 
उन्ही फल मेवों कि तरह 
किसी के भोग विलास  को अर्पित हो जाऊं
चार दिनों की चांदनी सी चमकूँ
और फिर विसर्जीत  कर दी जाऊं
नहीं चाहती
पूजा घर के इक कोने में  सजा दी जाऊं 
असल जिन्दगी कि राहों पर 
मुझको कदम रखने दो 
क्षमताएं हैं मुझमें 
मुझे भी आगे बढ़ने दो 
मत बनाओ इतना सहनशील की 
हर जुल्म चूप करके सह जाऊं 
मत भरो ऐसे संस्कार की 
अहिल्या सी जड़ हो जाऊं 
देवी को पूजो बेशक तुम 
मुझको बेटी रहने दो 
तुम्हारी थाली का 
नेह  निवाला कहीं बेहतर है
आडम्बर के उन फल मेवों से 
कहीं श्रेयष्कर है 
तुम्हारा प्यार, आशीर्वाद 
झूठ मुठ के उस पद वंदन से  
..................................................आलोकिता 

Friday, August 5, 2011

प्रवीण शाह की कविता -- लडकियां

आज के अतिथि कवि हैं प्रवीण शाह और कविता हैं लडकियां पढिये और अपने विचार दीजिये कविता पर भी और लड़कियों की स्थिति पर भी


लड़कियाँ
मैं देखता ही रह जाता हूँ उन्हें
हमेशा ही विस्मित करती हैं मुझे
जब भी देखता हूँ मैं उनको
मिलती हैं हरदम चहचहाती हुई
बिना किसी भी खास बात के
खुलकर हंसती-मुस्कुराती भी

लड़कियाँ
कभी नहीं दिखती वो बेतरतीब
घर से बाहर निकलती हैं सजी-संवरी
हमेशा पहने होती है रंगीन वस्त्र
समेटी चलती हैं खुशियों को हरदम
लगता है छिपा लेती हैं बड़ी खूबी से
हर असुंदरता हर काले पन को

लड़कियाँ
झेलती हैं दुनिया भर के दबाव
अकेले नहीं निकलना बाहर
कॉलोनी में चलो सर नीचा किये
ज्यादा हंसी मजाक शोभा नहीं देता
यह कपड़े शरीफों के लायक नहीं
खबरदार किसी बाहरी से बात की तो

लड़कियाँ
हमेशा ही मानी जाती हैं दोयम
अपने कम लायक भाइयों के सामने
जाने अनजाने कोई न कोई
दिलाता रहता है यह अहसास
तुम इस घर में पल रही जरूर हो
पर हो किसी दूसरे की अमानत ही

लड़कियाँ
ज्यादातर तो नहीं देती दखल कहीं भी
फिर भी होती हैं कुछ दूसरी मिट्टी की
नहीं मानती जो खुद को दोयम
बोलती है खुल कर हर अन्याय पर
लगा देतें हैं लोग लेबल माथे पर उनके
बेहया, कुलटा, घर-उजाड़ू आदि आदि

लड़कियाँ
कहता है हमारा यह समाज
रहना चाहिये हमेशा उन्हें संरक्षा में ही
उनके बचपन में पिता-भाई की
जवानी में यह काम करेगा पति
और बुढ़ापे में बेटों पर होगा दायित्व
कभी नहीं रह पाती हैं वो आजाद

लड़कियाँ
देती हैं अपना पूरा जीवन गुजार
पिता भाईयों पति और बेटों की
उपलब्धियों को ही अपना मान
शायद ही कभी होती है उनके पास
जमीन मकान या कोई संस्थान
जिसे कह सकती हों केवल अपना

लड़कियाँ
उनसे उम्मीद की जाती है हमेशा
दबी जबान में ही बातें करने की
नहीं कर सकती गुस्सा, लगा सकती ठहाके
एक ही भाव उचित माना जाता है उनका
हर छोटे दुख, विपदा तकलीफ पर
किसी पु्रूष के कंधे पर आंसू बहाना

लड़कियाँ
नहीं मानता हमारा यह समाज अभी भी
कि है उन्हें यह अधिकार विरोध जताने का
लड़की होने के, घर से बाहर निकलने के
होटल जाकर खाने के, पसंदीदा कपड़े पहनने के
दिल की बात कहने के, पुरूष का प्रतियोगी होने के
कारण होते दैहिक छेड़छाड़ व अनाचार का

लड़कियाँ
बहुत ही मुश्किल है लड़की होना
आखिर तुम पैदा ही क्यों हुई लड़की
क्या जरूरत थी तुम्हें आवाज उठाने की
तुम भी तो चुप रह ही सकती हो
संस्कृतिवादियों की हाँ में हाँ मिलाती
शर्म-हया से आभूषित औरों की तरह


बस एक ही नुकसान होता तुमको
यह कविता कभी नहीं लिखी जाती...
तुम पर...
मेरे द्वारा...
कभी भी...


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Thursday, July 7, 2011

चिड़ियों के साथ -1

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यह कविता 6 भागों में लिखी गई है प्रस्तुत है पहला भाग--

घर का एकाकी आँगन
और अकेली बैठी मैं
बिखरे हैं
सवाल ही सवाल
जिनमें उलझा
मेरा मन और तन !
अचानक छोटी-सी गौरैया
फुदकती हुई आई
न तो वह सकुचाई
और न शर्माई,
आकर बैठ गई
पास रखे एलबम पर
शायद दे रही थी सहारा
उदास मन को !
मैंने एलबम उठाई
और पलटने लगी
धुँधले अतीत को
खोलती रही
पन्ना-दर-पन्ना
डूबती रही
पुरानी यादों में!
मुझे याद आईं
अपनी दादी
जिनका व्यक्तित्व था
सीधा-सादा
पर अनुशासन था कठोर
उनके हाथों में रहती थी
हमारी मन-पतंग की डोर
जिनके राज्य में
लड़कियों को नहीं थी
पढ़ने-लिखने की
या फिर
खेलने की आज़ादी
जब भी
पढ़ते-लिखते देखतीं
पास आतीं
और समझातीं
'अपने इन अनमोल क्षणों को
मत करो व्यर्थ
क्योंकि
ज़्यादा पढ़ने-लिखने का
बेटी के जीवन में
नहीं है कोई अर्थ,
और फिर पढ़-लिखकर
विलायत तो जाएगी नहीं
घर में ही बैठकर
बस रोटियाँ पकाएगी’
लेकिन मैं चुपके-चुपके
छिप-छिपकर पढ़ती रही
आगे बढ़ती रही
और एक दिन चली गई
विदेश-यात्रा पर
दादी आज नहीं हैं
पर सुन रही होंगी
मेरी बातें
वो अपनी पैनी दृष्टि से
देख रही होंगी
मेरी सौगातें !
चिड़िया उड़ी
और
बैठ गई मुँडेर पर
देने लगी दाना
अपने नन्हे-नन्हे बच्चों को!

डॉ.मीना अग्रवाल