सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, May 18, 2010

मन बाबरे

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आज मन ने
मेरी बात मानी है
आज समझा है वह,
नहीं गँवाएगा समय
व्यर्थ की बातें सोचने में,
जीवन में ऐसा तो
चलता ही रहता है
मतभेद, विवाद,
अतिवाद, या फिर....
यही तो है जीवन !
अब मुझे विगत बातों को
कभी नहीं सोचना
कुछ करना है ऐसा
जो समाज में
बने मिसाल,
बने नई पहचान !
इसलिए मन बावरे
तू आज मेरी बात को
ध्यान से सुन
और गुन
मत हो परेशान
बनाकर रख
अपना सम्मान !
यह तू जान ले
कि जो डरता है
दूसरों की ताकत से
वही डराता भी है दूसरों को !
इसलिए तू डर मत
निर्भय होकर
आगे बढ़
ऊँचाइयाँ चढ़
अनुभव की झालर में
नव जीवन गढ़ !

डॉ. मीना अग्रवाल

4 comments:

Sonal Rastogi said...

दूसरों की ताकत से
वही डराता भी है दूसरों को !

निर्भय होकर जीना ही जीवन है

nilesh mathur said...

बहुत ही सुन्दर रचना है !

Sadhana Vaid said...

बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना ! आपको अनेकानेक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

Vishnukant Mishra said...

mainey dekha hai
satyam shivam aur sundar ko samapit
koi mn kabhi kahi kisi se bhi nahi
darta hai..
kyoki sidhanton ko samarpit
wah wahi karta hai
jo uskey mn aur sidhanton ko bhata hai ..

bahut achhi rachna.