सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Sunday, July 19, 2009

ठहरा हुआ इंतजार


एक टुकडा जीवन
लगातार घुमती हुई खामोश बेचैनी
संदिग्ध लम्बा अंतराल
अनुगूंज की घिस चुकि आवाजें
मौन पवित्र प्रार्थनाऐ
सम्पूर्ण अतिंम आवेग
प्रेम की परकटी ऊडान
समुद की बंधुआ कसमसाहट
देर तक जागता ऊनींदा संदेश
तिलमिलाती हुई दारूण प्रतीक्षा
रिश्तों की भारी खुरदुराहट
सपनों का अथाह भारीपन
हँसी की भीतरी लडखडाहट
साथ ही
आहट की इंतहा कंपन भी
क्या कुछ नहीं है यहाँ
इस जीवन में
मगर फिर भी क्या
जरूरी है
हर मील के पत्थर के बाद
वही ठहरा हुआ इंतजार।

6 comments:

ओम आर्य said...

padhakar bahut hi achchha laga man par kuchld hua tha jo uatar gaya.....bahut hi sundar

mehek said...

bahut bhwapurn rachana badhai

हिमांशु । Himanshu said...

मंजिलें भी कई रास्ते भी कई और मील के पत्थर भी । प्रतीक्षा की अन्तहीन यात्रा होती है, प्रतीक्षा ठहरती नहीं । हम ठहर जाते हैं, ठहर कर विरम जाते हैं ।

वाणी गीत said...

ठहरा हुआ तो ...जल भी... कीचड़ हो जाता है !!

रचना said...

kavita bahut bhaav purn haen

vandana said...

intzaar hamesha thahrta hi hai.........bahut sundar bhav.