सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, July 10, 2008

इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।

नहीं सौपा मैने अपना शरीर उसे
इसलिये
कि उसने मेरे साथ सात फेरे लिये
कि उसने मुझे सामाजिक सुरक्षा दी
कि उसने मेरे साथ घर बसाया
कि उसने मुझे माँ बनाया
सौपा मैने अपना शरीर उसे
इस लिये
क्योंकि "उस समय" उसे जरुरत थी
मेरे शरीर की , मेरे प्यार , दुलार की
और उसके बदले नहीं माँगा मैने
उससे कुछ भी , ना रुपया , ना पैसे
ना घर , ना बच्चे , ना सामाजिक सुरक्षा
फिर भी मुझे कहा गया की मै दूसरी औरत हूँ !!
घर तोड़ती हूँ ।
प्रश्न है मेरा पहली औरतो से , क्या कभी तुम्हें
अपनी कोई कमी दिखती है ??
क्यो घर से तुम्हारे पति को कहीं और जाना पड़ता है ?
क्यो हमेशा तुम इसे पुरुष की कमजोरी कहती हो ?
क्यो कभी तुम्हें अपनी कोई कमजोरी नहीं दिखती ?
जिस शरीर को सौपने के लिये ,
तुम सात फेरो की शर्ते लगती हो ,
उसे तो मैने योहीं दे दिया बिना शर्त ,
बिना शिक़ायत
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

47 comments:

advocate rashmi saurana said...

Rachanaji, bhut sundar. or bhut gahari bat kahi hai.

मिथिलेश श्रीवास्तव said...

मार्मिक कविता!

swapandarshi said...

आदमी की सुविधा के अनुसार हमारे समाज मे पहली और दूसरी औरते उपलब्ध है, और मालिक को खुश रखने के लिए आपस मे लड़-मरने को भी तैयार है। पहली वाकई हाड-तोड़ परिश्रम करके (बेगारी), उसके पूरे खानदान को पालने के लिए, बच्चे पैदा करने के लिए, उनकी देखभाल के लिए, और जब जी चाहे हवस मिटाने के लिए भी।

पर इस आदमी को इस औरत से कोई वास्ता नही है, सिवाय की वों उसकी ज़रूरत पूरी करती है। बस शिकायत है , अपनी हवस पूरी न होने की। एक दिनभर तरह तरह के कामो से थककर और बच्चों को पालकर जिस औरत के पोर-पोर मे दर्द बसा हो, वों कैसे पति की हवस के लिए भी तरोताजा रहेगी। इस औरत को आप कैसे दोष दे सकती है? मुझे आपकी सोच और संवेदना पर दुख है.

अगर थोड़ी संवेदना होती, और थोडा समर्पण इस आदमी मे भी होता तो अपनी पहली का हाथ ढेर से कामो मे share karataa, और थोडा सा इस औरत का बोझ कम करता, ताकि उनका सेक्स लाईफ भी ठीक चलती। दूसरी को ढूढने नही जाता।

ये हमारे समाज का पिछडा पण ही है, और इसका तराजू इस कदर आदमी के पक्ष मे झुका है, की पुरूष की सुवुधा के लिए औरते और पढी -लिखी औरते भी, तर्क गढ़ने मे पीछे नही है। और मुश्किल से हासिल की गयी थोड़ी बहुत आज़ादी जो औरत के हिस्से मे आयी है, वों भी पुरूष के बेजा इस्तेमाल की चीज़ बन जाती है.

काश हम औरतों के पास भी ये सुविधा होती, की दो-दो मर्द हमारे लिए सुविधा अनुसार खटने को तैयार है, और ज़मानेभर की हमदर्दी भी हमारे साथ हो.....

रंजना said...

बहुत अफ़सोस हुआ आपके विचार जानकर.आपने सबकुछ देह के धरातल पर ही आँका.दाम्पत्य केवल देह की भौतिकी पर ही नही टिका होता यह तो मनोभूमि पर बंधता और पलता है. दांपत्य जीवन में स्त्री पुरूष को और पुरूष स्त्री को देह भर नही बांटता.यह तो एक विश्वास प्रेम समर्पण सहिष्णुता और परस्पर सम्मान सहयोग का रिश्ता है,जो चाहे कोई भी तोडे,अनुचित ही है.....बिना विवाह के भी देह बाँट स्वयं पर गर्व करने वाली बात कितना भी चाहो गले नही उतरती.आपकी बातों को महिमामंडित कर पाना बड़ा ही कठिन है.
स्वप्नदर्शी जी की बात से मैं काफी सहमत हूँ.

रचना said...

आज कल कुछ ऐसी महिलाए भी हैं जो प्रगतिशील हैं , काम काजी हैं और शादी केवल इसलिये करती हैं की समाज मे एक सुरक्षा मिले . २ ऐसी पत्नियों को मे जानती हूँ जो दोनों केवल ३५ वर्ष की हैं और उन दोनों को ही शारीरक सम्बन्ध मे पहला बच्चा होने के बाद से कोई इंटेरेस्ट नहीं हैं . दोनों का ही अपनी पति से पिछले ३ साल से कोई दैहिक सम्बन्ध नहीं हैं . ऐसे मे एक ३८ वर्ष का पुरूष क्या करेगा अगर दूसरी जगह सम्बन्ध ना बनाए तो या उसके दूसरी जगह संबध ना बन जाए तो ? सवाल संवेदना का नहीं हैं और अगर हैं तो दूसरी स्त्री के प्रति क्यों नहीं हैं
स्वप्नदर्शी आप तो विदेश मे रहती हैं वहां पर तो कोई भी पत्नी केवल इसलिये पत्नी नहीं बनी रहती क्योकि उसे सोशल सिक्यूरिटी चाहीये वहां पर काम काजी महिला , भारतीये काम काजी महिला से ज्यादा काम करती हैं पर अपनी सेक्स लाइफ के प्रति सजग होती हैं और अगर उसका पति २ तिमिंग करता है तो उसको छोड़ देती हैं फिर यहाँ सामाजिक प्रतिश्दा के लिये पत्निया क्यो पति का इस्तेमाल करती हैं केवल पुरूष की गलती देखने के अलावा अगर नारी अपनी गलती भी देखे तो समस्या जल्दी सुलझेगी . रंजना इस ब्लॉग पर आप का स्वागत है . आप का ये पहला कमेन्ट हैं आती रहे . सवाल बिना विवाह के भी देह बाँट स्वयं पर गर्व करने वाली बात को महिमामंडित करने या ना करने का नहीं हैं सवाल हैं की पति को अगर शादी के बाद पत्नी अपनी सुविधा के लिये देह सम्बन्ध ना बनाने दे तो क्या वो दूसरी औरत { ये नाम क्यों दिया जाता हैं } जो बिना किस भी आदान प्रदान के इस व्यक्ति के प्रति समर्पित हो जाती हैं कहा और क्यों गलत हैं .

अगर आप सब को ना याद हो तो याद करे कुछ महीने पहले एक IAS महिला के खिलाफ एक IAS पति ने मुकदमा जीता था क्योकि ७ वर्ष से वोह महिला बिना दैहिक सम्बन्ध के साथ उसके साथ रहती थी और तलाक के लिये नहीं राजी थी क्योकि इसमे सामाजिक बदनामी थी ?? कविता मे संवेदना केवल नहीं होती हैं कविता मे एक सच भी होता हैं . वह सच जो सब जानते हैं पर स्वीकारते नहीं हैं

रश्मि प्रभा said...

sach me bahut achhi,
phakra ki baat hai.......

swapandarshi said...

मैं औरत का अपने शरीर पर हक हो, इसकी हिमायत करती हूँ, और इसमे औरत की विवाह के भीतर रहकर असहमति भी शामिल है। और बिना विवाह के शारीरिक सम्बन्ध भी, लिविंग भी, बशर्ते जो दो लोग इन संबंधो मे जुड़े हो, सम्पूर्ण समर्पण के साथ जुड़े हो, खुलेपन के साथ, और बिना हिचक समाज के सामने स्वीकारने वाले भी। इन सभी स्थितियों मे स्त्री-पुरूष का जुडाव सम्मानीय है, और किसी को कुछ कहने का हक नही है।

पर अगर एक मर्द दो नाव मे एक साथ सवार है, तो ये दोनों के प्रति बेमानी है, और कायरता भी। बिना सामाजिक मूल्य चुकाए बिना सारी सुविधा। ये मेरी समझ मे ग़लत है। इसमे देश और विदेश का सवाल भी नही है। हर जगह ग़लत है। एक समय मे किसी भी स्त्री या पुरूष के एक ही से सम्बन्ध मानी है, और यही आज की नैतिकता भी है।

रचना said...

rashni surana , mithilesh aur rashmi prabha aap ko kavita sahii lagee thanks

rewa said...

Main nahi janti hun is poem mei kitni sachchai hai but sachchai hai! I am not a married lady but I have seen such many cases even in south as I am in south now. Baat ye nahi hai ki hamari samvedna kahan kho gayi hai...baat hai aaj ke mahoul mein aisi bhi aurten hein jo do do kya panch mardon ke paas bhi jati hai. Aur ek ke baad dusre, fir tisre fir chouthe...aur ye silsila chalta rahta hai. Aisi bhi aurten hein hamare samaj mein, ise acept karne mein koi burai nahi hai. Iska sabse bada example movie page-3 hai! Aur ham yeh nahi kah sakte hein ki movie mein sachchai nahi hai. I am not saying PR is everything for a marriage life but it is most important thing to make ur relation lovable! Aur biologically, in some age it's required. Agar koi ladki bahut hi young age mein widow ho jati hai aur uski dusri shadi nahi hoti hai to wo kya kare...society ke samne aawaz nahi utha pati hai ki dusri shadi karungi aur chori chupe sexual relation bana hi leti hai! Isliye hame hamari kamjori bhi manna chahiye! Sirf sati savatri aur devi hone ka dava karti hai bus sex ke baare mein openly baat na karke to they r wrong!! 100% wrong bcos jo baat nahi karte hein unke dil mein aur bhi chor hota hai!!! Aur wo purush hi apni wife ko chodkar dusre ke paas jata hai jise apni wife se satisfied nahi hota hai....chahe galti kinhi ki ho! Isliye bibiyan jo apne husband ko her sense mein support nahi karti hein unhe apni galti bhi accept karni chahiye, na ki devi banne ka dhong karna chahiye! I may be wrong but this is what I feel.


rgds.

शोभा said...

रचना जी
मुझे आपकी विचारधारा कुछ जमी नहीं। दूसरी औरत होना गर्व की नहीं शर्म की बात होती है। स्वयं के लिए भी और अन्य स्त्री के लिए भी। पुरूष की कायरता को संरक्षण देना कोई समझदारी नहीं। सात फेरों की शर्त हमारी संस्कृति है उसका उपहास क्यों?

swapandarshi said...

इतना और जोड़ना चाहती हूँ, की जीवन रेल की पटरी भी नही है, और उतार चढाव मे कई तरह के प्रेम संबंधो की गुंजाईश आज के समाज मे है, पर प्रेम सम्बन्ध अगर सिर्फ़ देह तक ही सीमित हो और सिर्फ़ यही विवाह का आधार भी तो ये मेरे गले नही उतरता। देर सबेर देह से ऊपर उठकर भी स्त्री-पुरूष मे साथ की , साझेदारी की इच्छा हो सकती है। कोई भी स्थायी प्रेम सम्बन्ध देह से ज्यादा, एक दूसरे के साथ आड़ेवक़्त खड़े रहने के दमपर, एक दूसरे के लिए सम्मान, केयर, और मानसिक, वैचारिक, भावनात्मक साझेदारी पर भी टिका होता है।

पर अगर ये सब न हो और सिर्फ़ देह की चाह हो, क्योंकि औरत विवाह के बंधन मे है, और उससे इसीलिये ये आपेक्षा है की वों पति की वासना शांत करे तो ये ग़लत है, किसी भी औरत की अस्मिता के साथ खिलवाड़ है। और सिर्फ़ एक मांस के लोथडे मे बदल जाना किसी भी औरत को मंजूर नही होना चाहिए.

रचना said...

@swapandarshi
"पर अगर एक मर्द दो नाव मे एक साथ सवार है, तो ये दोनों के प्रति बेमानी है, और कायरता भी। बिना सामाजिक मूल्य चुकाए बिना सारी सुविधा। ये मेरी समझ मे ग़लत है। इसमे देश और विदेश का सवाल भी नही है। हर जगह ग़लत है। एक समय मे किसी भी स्त्री या पुरूष के एक ही से सम्बन्ध मानी है, और यही आज की नैतिकता भी है।" फिर भारतीये पत्नी क्यों जानते हुए भी ऐसे आदमी के साथ रहती हैं ?? क्यों ये मानती हैं की पुरूष तो गलती करता ही हैं और वापस आ ही जायेगा . जहाँ पत्नी नहीं जानती वहाँ तो उसके ख़िलाफ़ धोखा हुआ पर जाहन सब कुछ जाते हुए भी साथ रहती है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं पढी लिखी हैं पर फिर भी साथ रह रही हैं अपनी सुविधा के लिये

रचना said...

"पुरूष की कायरता को संरक्षण देना कोई समझदारी नहीं। "
shobha फिर भारतीये पत्नी क्यों जानते हुए भी ऐसे आदमी के साथ रहती हैं ?? क्यों ये मानती हैं की पुरूष तो गलती करता ही हैं और वापस आ ही जायेगा . समाज मे नैतिकता सब के बराबर क्यों नहीं

रचना said...

@swapn darshi
mae us sambandh kii baat kar rahee hun jahan purush ki jarurat ko patni jaan kar ignore kartee haen aur uski vajeh sae sambandh kahii aur banta haen

Manvinder said...

रचना जी,
मुद्दा गंभीर है उस पर विचार भी गंभीरता से हो रहा है। कविता में दूसरी औरत का अहसास , उसका सुख, उसका फक्र तो है लेकिन सवाल पहली औरत पर भी उठाया गया है। मेरा कहना है कि अगर कोई पत्नी देह को छूने नहीं दे रही हैं तो उसके पीछे कोई वजह हो सकती है। रही पति की बात तो उसका स्वभाव को जग जाहिर है, किसी अपवाद को छोड़ दे तो वह दूसरी क्या तीसरी के पास भी सहजता से पहुंच जायेगा। फिर तीसरी को भी फक्र हो जाये तो हैरानी न होगी। यार सवाल यह है कि ‘ारीर से जोड़ के किसी को रखना बहुत समय तक संभव नहीं है। बड़ी बात तो यह है कि विवाह जैसी संस्था को अगर कोई संभाल सकता है तो वह है औरत। वह औरत जो पहली भी है और दूसरी भी और तीसरी भी हो सकती है।
Manvinder

मीनाक्षी said...

यदि विवाह पवित्र धर्म में सामाजिक कर्म है तो प्रेम का भाव उन्मुक्त हवा का शीतल झोंका..प्राण वायु सा नस नस में बहने वाला.... यहाँ बस एक बात खटकती है कि प्रेम तो आनन्द की अनुभूति है, किसी को पीड़ा दे ही नहीं सकती लेकिन यहाँ दूसरी औरत अंहकार में डूबी दिखाई देती है......

swapandarshi said...

@रचना
क्या हर हाल मे अगर नारी पुरुश की इच्छा जानती है, तो उसे पूरा करना भी ज़रूरी है? तब भी जब पुरुश जिम्मेदारिया न बांटे, औरत की प्रसव के बाद की शारिरिक हालत को न समझे, और बच्चो को पालने मे जो मेहनत लगती है, उसमे शिरकत न करे?
और भारतीय परिवारो मे तो पति और बच्चो के अलावा, पति के पूरे खानदान का बोझ भी स्त्री पर पडता है.

मै दूसरी औरत को दोष नही देती. पर इतना कहना चाहती हूँ कि पूरा समाज पुरुष को गैर्जिम्मेदार होते हुये दूसरी और पहली दोनो को एक साथ रखने की सुविधा देता है, बिना मूल्य चुकाये. और इसकी भरपायी, पहली और दूसरी अपने -अपने तरीके से करती है.

विवाह से औरत को भी कुछ सुविधा मिलती है, पर फिर भी उसे देना ज्यादा पडता है, मिलता पुरुष को ज्यादा है. मुझे पहली और दूसरी किसी भी औरत से दुश्मनी नही है, न ही तथाकथित नैतिकता के आधार पर मै किसी को गलत और किसी को सही साबित करना चाहती हू.
पर एक समाजिक व्यवस्था जिसमे स्त्री और पुरुश के लिये अलग-अलग मान्दंड है, कि ये पुरुष के पलडे मे है, और पहली या दूसरी औरत या तीसरी भी..., सिर्फ मोहरे भर है. और उन्हें एक दूसरे के खिलाफ नही होना चाहिये.

किसी भी दम्म्पति के जीवन मे जब बच्चे आते है, तो निसन्देह अपनी प्राथ्मिकता को बच्चो के पीछे रखना पडता है, और अपनी देह को और जीवन को भी दाव पर लगाना पडता है. औरत ये करती है, अगर नही करती तो कोई भी शिशू जीवीत न रहता और जन्म नही लेता. किसी भी पति को इसके लिये अपनी पत्नी के प्रति अहसान्मन्द होना चाहिये और यथासम्भव उसका बोझ बाटना चहिये. जह्ना औरत इतना कुछ करती है, क्या पति सिर्फ अपनी शारिरिक जरूरत पर कुछ दिन काबू नही रख् सकता? या पत्नी की मदद न भी करें तो अनावश्यक बोझ उस पर न लादे? अपने नाते-रिस्तेदारो को, दो घडी उससे बात करने के लिये निकाले, और बच्चो को पालने मे साझेदारी करे. अगर ये करें तो उसकी बीबी के पास थोडी और ऊर्जा होगी, और रिश्ता भी एक नये धरातल पर ताजगी से भरेगा.

मेरी शिकायत उस पति से है, और उस सोच से जो पति के व्यव्हार के लिये उसके साथ खडा है? और उस सामाजिक व्यवस्था से भी, जह्ना स्त्री को ही हर मूल्य चुकाना पडता है.

विखंडन said...

नहीं सौपा मैने अपना शरीर उसे
इसलिये
कि उसने मेरे साथ सात फेरे लिये
कि उसने मुझे सामाजिक सुरक्षा दी
कि उसने मेरे साथ घर बसाया
कि उसने मुझे माँ बनाया
सौपा मैने अपना शरीर उसे
इस लिये
क्योंकि "उस समय" उसे जरुरत थी
मेरे शरीर की , मेरे प्यार , दुलार की
और उसके बदले नहीं माँगा मैने
उससे कुछ भी , ना रुपया , ना पैसे
ना घर , ना बच्चे , ना सामाजिक सुरक्षा
_____________

प्रेम है -तो -
शरीर सौंपना क्या होता है भई ??? क्या यहाँ बराबर की चाहत और भागीदारिता नही है ???

बहुत अच्छा लगता यदि आप कहतीं कि मैने भोगना चाहा इसलिए भोगा , पाना चाहा इसलिए पाया , यह मेरी इच्छा थी । अपने दैहिक सम्बन्धों को लेकर मै शर्मसार नहीं हूँ ।
लेकिन अफसोस आपने भी - सौंपा जैसा शब्द इस्तेमाल करके इसे अपने त्याग की महिमा से मंडित करने का प्रयास किया है ।
आपमें साहस होना चाहिये कि आप स्त्री की प्रेम और दैहिक ज़रूरत को बिना शर्त स्वीकार करें ।


लेकिन कहीं इस साहस की कमीं अपने आप को जस्टिफाई करने की इस कविता में दिखाई दे रही है ।
उसे ज़रूरत थी , शरीर की भी , प्यार की भी , दुलार की भी ----स्त्री को ??वो बिना किसी ज़रूरत अपने को उसकी तुष्टि के लिए सौंप बैठी , और उसकी पत्नी को पति के बहकने का आरोप भी दे रही है ?? क्या इसे त्याग और महानता माना जाए ??
प्रेम की स्त्री की कामना को आपने त्याग के जिस आवरण में छिपाने की कोशिश की है , उसे फूहड़ ही कहा जा सकता है ।
यह किसी तरह से स्त्री की मुक्ति की कोशिश नही है । यह सीधा सीधा अपनी सफाई देना है !!यह धूर्तता के अलावा और कुछ नही है ॥

आपसे तो ऐसी कायर सोच की उम्मीद नही थी ।

रचना said...

मेरी शिकायत उस पति से है, और उस सोच से जो पति के व्यव्हार के लिये उसके साथ खडा है? और उस सामाजिक व्यवस्था से भी, जह्ना स्त्री को ही हर मूल्य चुकाना पडता है.
इस्सी बात पर तो सोच जाए कविता का मकसद यही हैं स्वपनदर्शी । यहाँ से ही बदलाव आएगा जब पुरूष को चोदा जाएगा उसकी पत्नी और प्रेमिका के द्वारा ।
@vikhandan ji
आप इस ब्लॉग पर आए शायद आप का पहला कमेन्ट हैं , यह किसी तरह से स्त्री की मुक्ति की कोशिश नही है । यह सीधा सीधा अपनी सफाई देना है !!यह धूर्तता के अलावा और कुछ नही है ॥
बिकुल यह धूर्तता ही हैं की मैने नारी को आइना देखा कर पुरूष को लताडा हैं . जिनकी समझ मे आजायेगा वो नारी मुक्त हो जागी चाहे पत्नी हो या प्रेमिका और वो पुर्ष अकेला हो गा जो दोनों से सम्बन्ध रखता हैं . कविता मे सीधा सीदः आरोप हैं पत्नी पर और अगर वोह सही हैं तो क्यों रहती हैं इसे सामाजिक नियम के साथ क्यों नहीं हिमात करती अपनी को अलग करके अपनी जिन्दगी जीने की अपने आत्मा सम्मान के साथ
आपसे तो ऐसी कायर सोच की उम्मीद नही थी ।
उम्मीद ना खोये मे बिल्कुल वासी हूँ जसी आप नए मुझे समझा हैं बस मेरे शब्दों मेरे छुपे टंच को भी समझे , उस संदेश को भी समझे जो पत्नी के लिये हैं क्यों रहना ऐसे पति के साथ जो कही और जाता हैं और क्यों रहना ऐसे पति के साथ जिसके साथ आप शादी की बेसिक जरुरत को ही पुरा नहीं करती हैं

रंजना [रंजू भाटिया] said...

.मैंने तो यही जाना है कि जो आज कल का समय है उस में दोनों ही बदल रहे हैं चाहे वह स्त्री हो या पुरूष जिसको जैसा दांव लगता है वह अपनी जिंदगी को उसी तरह जीत लेता है ...अजब सा माहौल हो गया है अब ..दिल की बात जो कभी दिल से कही जाती थी अब जिस्मों की जुबान बन कर रह गई है ...और जब सब हद पार हो जाए चाहे नाम हम उसको कुछ भी दे ले की समय की कमी या एक दूजे का ध्यान न रखना ..आदि आदि सब आपने जीने का रास्ता अपने तरीके से तलाश कर लेते हैं और मुझे लगता है कि इस में सबसे बड़ा जवाब तो आप को ख़ुद को ही देना है जो आप कर रहे हैं उसके जवाबदेही भी आप ख़ुद हैं ..यदि किसी को यह उचित लगता है तो यह उसकी सोच है ..और जब सब सही है तो फ़िर किसी नम्बर की जरुरत कहाँ रह जाती है पहली दूसरी ...

Charroo said...

एक पूरी तरह से घटिया कविता.
वेश्या वृत्ति को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने की कोशिश.
ऐसी महिलायें ही तो कभी बंगाल से , तो कभी दिल्ली से भगायी जाती हैं. जैसे : तसलीमा नसरीन

रचना said...

Charroo
taslima nasreen kae baarye maae aap kae khayalt jaan kar afsos hee kar saktee hun . aap kavita ko ghatiya kehtee to itna afsos naa hota jitna aapkey taslima kae baarye jaan kar hua .

Anonymous said...

In biological sense man & women made for each other, And primary concept b/w each other is sexual need. Other's are seconary mater. Otherwise why a man not marry with a man. A women needs also her satisafaction, But when women do this so many social obligations n problems arises. but now time is changing.

मोहिन्दर कुमार said...

रचना जी,

मैं नहीं जानता कि सबने क्या मन में रख कर इस रचना को पढा.. लेकिन मेरे विचार से यह एक सशक्त कविता है. पहली से आपका तात्पर्य पत्नी और दूसरी से शायद बाहरी स्त्री या वैश्या से है... सचमुच यदि पहली में इतना आकर्षण या क्षमता हो तो दूसरी की नौबत ही क्यों आये...

दरो-हरम में चैन जो मिलता... क्यों जाते मैखाने लोग...
वैश्या कहीं बाहर से नहीं आती वो इसी समाज की उपज है उसे हीन समझना समाज की कमजोरी है

रचना said...

मेरी कविता की दूसरी औरत अपने प्रेम समर्पण के लिये पुरूष से कुछ नहीं ले रही . फिर उसकी तुलना वेश्या से करना केवल पाठक की मानसिकता हैं . वेश्या अपनी जीविका कमाती हैं अपने शरीर से , पर यहाँ ये औरत कुछ नहीं ले रही केवल दे रही हैं . वो समर्पिता भी हैं इसलिये गर्विता भी हैं . आज से कुछ साल पहले अविवाहित महिला को बहुत कुछ सुनना पड़ता था पर आज ज्यादा विवाहित महिला सुनती हैं क्योकि वह समय असमय शादी से अप्रसन रहती हैं पर कभी भी अगर दोषारोपण करना हैं तो वह दूसरी स्त्री पर ही करती हैं . आने वाले समय मे हो सकता हैं ये धारा उल्ट जाए . कविता अच्छी हैं या बुरी पता नहीं क्योकि सच कभी अच्छा या बुरा नहीं होता सिर्फ़ कड़वा होता हैं

swapandarshi said...

Dear rachna, I am very happy that you have attacked this issue and therefore I took otherside, so that a diverse opinion can come and enrich all of us, with different point of view.

tha poem is good, no doubt and thought provoking.

However, delete the comments of people like charoo?
who contribute negatively, this is my request

रचना said...

sn
i was my self thinking of deleting the irrelevent comment and took the first oppprtunity to do so afer your comment
your participation in discussion is valuable and i hope to get more onthis from you on naari blog as a post
with luv

Anonymous said...

कविता अच्‍छी है रचना जी। बधाई। लोगों की बात पर न जाओ क्‍योंकि उन्‍हें कुछ तो कहना ही है। जब पति बाहर जाकर मुंह मार रहा होता है तो सारी पत्यनयां सति सावितरी बन जाती हैं। जबकि मौका मिले तो वे भी ऐसा करने से हटे नही। सारा झगड़ा होता है पति के नाम पर मिले लाइसेंस का। दूसरी औरत सबको बुरी लगती है लेकिन पहली औरत के कैरेक्‍टर पर सवाल कभी नहीं उठता। मैने देखा है अक्‍सर इस तरह के रिलेशन को जहां पति कुछ समय के लिए दूसरी औरत से प्‍यार की कसम खाता है, पहली औरत का प्‍यार जाग उठता है और फिर वो सबकुछ दांव पर लगाकर अपने पति को वापस पाना चाहती है। बाद में पति गंगा नहाकर वापस आ जाता है और पति पत्‍नी सुख से रहने लगते हैं। वे शादि समारोह में मिस्‍टर एंड मिसेज सो एंड सो के नाम से जाते हैं। वास्‍तव में दया के पातर हैं ऐसे पति पत्‍नी जो दूसरी औरत के रहम पर अपने संबंध को जिंदा रखते हैं।

rewa said...

@Anonymousji,

Maine sbahi cmnts padhe aur jo baat aapne kam shabdon mein kah gayi/gaye hein wo accept karna aajki dikhawati nariyan jaldi accept nahi karengi....but sachchai yahi hai! her koi apne kamjori ko chupane ke liye dusre per dosharopan karne mein apni bahduri smajhte hein!! But aapka cmnt sach kah rahi hai...sometimes we need to see from other angle too!

rgds

rewa said...

Miss Charroo,

Aap jise ghatiya aur veshyavriti kahte hein use duniya pujti hai! Jab veshyaen aapko itni hi ghatiya lagti hai to puchiiye un panditon se akhir kyun wolog veshyaon ke ghar yani kothe se mitti mangwate hein Durgapuja ki murti banane ka shubharambh karne ke liye? Aapne to veshyaon ko ghatiya kah diya parantu unke paas jane walon ko duniya kyun pujti hai...yani so called educated people wahan kyun jate hein?? Mam dusron ke thoughts ko ghatiya kahne se pahle apna brain wash kijiye, tabhi aapka tailent rang layega! Rahi baat Tasleema Nasreen ki, jinka aapne example badi hi asaani se dekar chali gayi uske baare mein kabhi baithkar chintan kijiye. Gyanwan unhe pujenge aur murkh unki avhelna karenge! Aap Tasleema ko kharab nahi kah rahi hein, balki apne aap ko yahan per mahan batane ke chakkar mein dusron ko ghatiya aur Tasleema per dosharopit kar rahi hein! Thoda apne upper bhi dhyan dijiye aur dusron ka example dene se pahle khud ke ander jhakiye! Aur her cheez ko do angle se dekhne ke vajay char angle se bhi dekhna pade the wo bhi kijiye parantu, mind ko thoda open aur dil ko thoda majboot kijiye. I hope you wouldn't deny it and understand your inner voice which is yet to come!

You are most welcome dear but try to see things in positive way rather than seeing negative way!

Mind manthan jarruri hai, so start doing!

सतीश सक्सेना said...

रचना जी ! मानवीय भूख हम सबमें है मगर समाज, जिसमे परिवार भी शामिल है, को कैसे बताएं! एक दूसरे के सामने जाने से पहले, दर्पण के सामने, बहुत समय लगता है, नग्नता को छुपाने में ! कपड़े पहनने के बाद हम समाज सुधार पर बहुत वक्त देते हैं !
मानवीय भूख हम सबमे,
मगर स्वीकार क्यों कर हो
हमारी नग्नता सबको दिखे
स्वीकार क्यों कर हो

अनूप शुक्ल said...

रचनाजी की सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती है वह यह है कि आप जिस बात को सही समझती हैं उसे पूरी ईमानदारी से रखने का प्रयास करती हैं। यह
आपकी ताकत है। कविता और टिप्पणियां दोनों रोचक हैं।

रचना said...

आप ने समय निकला इस कविता को पढ़ने के लिये इसके लिये थैंक्स अनूप

रचना said...

सतीश आप को कविता ने अपने विचार यहाँ रखने के लिये मजबूर किया यही कविता की सफलता हैं पढ़ने के लिये थैंक्स

रचना said...

rewa and dear swapndarshi
both of you have made this discussion very thought provoking i will not thank you now because more people are reading it so please continuye to keep answering

pallavi trivedi said...

kavita aapki nissandeh achchi hai...aap jo mahsoos karti hain wo aapne likha hai aur har ek ke apne vichaar hote hain aur sabhi ke vicharon ko poori respect karna chaahiye.

doosri aurat ki baat aapne uthayi...ye aaj ka jwalant mudda hai jis par baat hona chahiye lekin mujhe lagta hai koi bhi insaan chaahe wah stree ho ya purush rishte se baahar agar nikalta hai to iska matlab hai wah us rishte se khush nahi hai ya fir jo cheez wah apne partner mein chaah raha hai wah use kaheen aur mil rahi hai. chaahe wah shaaririk ho ya maansik.

aaj ke wakt mein jindgi ki philosafy bhi badal rahi hai...soch yah hai ki ek zindgi milti hai use apni khushi se jeena chaahiye. doosri aurat hi nahi doosre aadmi bhi hote hain aur galat kisi ko nahi thahraya ja sakta hai kyoki sabhi apni jagah sahi hain aur galat bhi.depend karta hai ki paristhitiyaan kya hain.

राष्ट्रप्रेमी said...

रचनाजी, निःस्न्देह आपकी कविता दमदार है, कमेन्टों से स्पष्ट भी हो गयी है, प्रेम व समर्पण मिले और शादी मजबूरी न बने तो न नर को और न नारी को दूसरे या दूसरी की जरूरत रहेगी. सुन्दर कविता के लिये आभार!

आलोक सिंह "साहिल" said...

रचना जी क्या कहूं...आपने इतना कुछ और इतने साहस के साथ बयां कर दिया कि कुछ कहने की गुंजाइश ही नहीं रह जाती....बहुत कड़वी बात कही आपने...लाजिमी भी है...
दूसरी औरत के रूप में फख्र होना...
हैट्स ऑफ!!!!

आलोक साहिल

फ़िरदौस ख़ान said...

मार्मिक कविता...

श्याम कोरी 'उदय' said...

...बेहद प्रभावशाली रचना,बधाई!!!!!

Amitraghat said...

"शारीरिक सुख ही सब कुछ थोड़े ही न होता है यौन संसर्ग तो एक हद तक केवल तनाव ही दूर करता है, केवल कुछ देर का सुख प्रदान करता है लेकिन उसके बाद फिर क्या...? विवाह क्या देह के लिये करते हैं?
स्वामी योगानन्द (आटोबायोग्राफी ओफ योगी ) के माता-पिता सिर्फ संतानोत्पत्ति के लिये वर्ष में केवल एक बार सोते थे लेकिन फिर भी उनमें में अगाध प्रेम था...रचना आपकी कविता अधूरी सी लगती है.."

mukti said...

बहुत अच्छी लगी ये कविता. दूसरी औरत के दर्द और स्वाभिमान को एक साथ बयान करती. एक-आध शंकाएँ थीं जो आपकी और स्वप्नदर्शी जी का बहस से दूर हो गयीं.
हाँ, स्वप्नदर्शी जी की बात से सहमत हूँ. एक मुद्दे पर स्वस्थ बहस चल रही है, तर्क अपनी जगह पर हैं, पर अब्यूज़िव भाषा का इस्तेमाल ग़लत है, इसलिये आप ऐसे कमेंट हटा दीजिये.

Sonal Rastogi said...

रचना
कविता निसंदेह प्रभावशाली है ,पर मुझे मर्म कुछ समझ नहीं आया , नारी स्वयं के भोग्या होने पर गर्व कर रही है....आज अगर वह दूसरी है कल पहली भी हो सकती है तब अगर कोई दोसरी उसके पति के जीवन में आती है इस स्थिति में तो उसे दूसरी औरत का सम्मान करना चाहिए ...
अगर पति पत्नी के जीवन में कुछ कमी है तो उसे मिलकर सुलझाया जाता है ..... पहली अगर कुछ मांगती है तो उसे बहुत कुछ चुकाया होता है,
एकतरफा लगी ये रचना
जो महसूस किया वो लिख दिया ......
आप इसे मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकती है http://sonal-rastogi.blogspot.com/2010/03/blog-post_12.html

shilpa mehta said...

न गर्व की बात है - न शर्म की ही बात है | यह उन दोनों ( पुरुष और तथाकथित "दूसरी" औरत के) के मानसिक सम्बन्ध पर निर्भर है |

मैं पति , पत्नी , और उस "दूसरी " औरत - तीनों ही की इज्ज़त करती हूँ - यदि उनकी अंतरात्मा उस स्थिति को स्वीकार कर रही हो - तो यह उनके लिए सही है | इसे जन्रलाइज़ नहीं किया जा सकता |

कविता रावत said...


शोभा जी की टीप से पुर्णतः सहमत ...

Kajal Kumar said...

दूसरा एेंगल ...

प्रतुल वशिष्ठ said...

कविता के विचारोत्तेजक होने से चर्चा काफी रोचक लगी।

कहते हैं अज्ञेय जी की जब पहली शादी भी नहीं हुई थी तब उन्होंने एक कविता लिखी, नाम था 'द्वितीया ' ........उसे भी पढ़ा जा सकता है। इसमें वे खुद को निर्दोष साबित करते हुए कहते हैं : "मेरा क्या है दोष कि मैंने तुमको, बाद किसी के जाना।" यदि अपाहिज अंग खोकर किसी बैसाखी पर विश्वास जमाता है और धैर्य धारण करता है तो अनुचित नहीं लगता। किन्तु कोई पूरे हाथ पैर वाला व्यक्ति चलने के लिए व्हील चेयर या बैसाखी का उपयोग करे तो हास्यास्पद प्रतीत होता है।

कविता पढ़ें :

मेरे सारे शब्द प्यार के किसी दूर विगता के जूठे :
तुम्हें मनाने हाय कहाँ से ले आऊँ मैं भाव अनूठे?
तुम देती हो अनुकम्पा से मैं कृतज्ञ हो ले लेता हूँ-
तुम रूठीं-मैं मन मसोस कर कहता, भाग्य हमारे रूठे!
मैं तुम को सम्बोधन कर मीठी-मीठी बातें करता हूँ,
किन्तु हृदय के भीतर किस की तीखी चोट सदा सहता हूँ?
बातें सच्ची हैं, यद्यपि वे नहीं तुम्हारी हो सकती हैं-
तुम से झूठ कहूँ कैसे जब उस के प्रति सच्चा रहता हूँ?
मेरा क्या है दोष कि जिस को मैं ने जी भर प्यार किया था,
प्रात-किरण ज्यों नव-कलिका में जिस को उर में धार लिया था,
मुझ आतुर को छोड़ अकेली जाने किस पथ चली गयी वह-
एक आग के फेरे कर के जिस पर सब कुछ वार दिया था?
मेरा क्या है दोष कि मैं ने तुम को बाद किसी के जाना?
अपना जब छिन गया, पराये धन का तब गौरव पहचाना?
प्रथम बार का मिलन चिरन्तन सोचो, कैसे हो सकता है-
जब इस जग के चौराहे पर लगा हुआ है आना-जाना?
होगी यह कामुकता जो मैं तुम को साथ यहाँ ले आया-
किसी गता के आसन पर जो बरबस मैं ने तुम्हें बिठाया,
किन्तु देखता हूँ, मेरे उर में अब भी वह रिक्त बना है,
निर्बल हो कर भी मैं उस की स्मृति से अलग कहाँ हो पाया?
तुम न मुझे कोसो, लज्जा से मस्तक मेरा झुका हुआ है,
उर में वह अपराध व्यक्त है ओठों पर जो रुका हुआ है-
आज तुम्हारे सम्मुख जो उपहार रूप रखने आया हूँ
वह मेरा मन-फूल दूसरी वेदी पर चढ़ चुका हुआ है!
फिर भी मैं कैसे आया हूँ क्योंकर यह तुम को समझाऊँ-
स्वयं किसी का हो कर कैसे मैं तुम को अपना कह पाऊँ?
पर मन्दिर की माँग यही है वेदी रहे न क्षण-भर सूनी
वह यह कब इंगित करता है किस की प्रतिमा वहाँ बिठाऊँ?
नहीं अंग खो कर लकड़ी पर हृदय अपाहिज का थमता है।
किन्तु उसी पर धीरे-धीरे पुन: धैर्य उस का जमता है।
उर उस को धारे है, फिर भी तेरे लिए खुला जाता है-
उतना आतुर प्यार न हो पर उतनी ही कोमल ममता है!
शायद यह भी धोखा ही हो, तब तुम सच मानोगी इतना :
एक तुम्हीं को दे देता हूँ उस से बच जाता है जितना।
और छोड़ कर मुझ को वह निर्मम इतनी अब है संन्यासिनि-
उस को भोग लगा कर भी तो बच जाता है जाने कितना!
प्यार अनादि स्वयं है, यद्यपि हम में अभी-अभी आया है,
बीच हमारे जाने कितने मिलन-विग्रहों की छाया है-
मति जो उस के साथ गयी, पर यह विचार कर रह जाता हूँ-
वह भी थी विडम्बना विधि की यह भी विधना की माया है!
उस अत्यन्तगता की स्मृति को फिर दो सूखे फूल चढ़ा कर
उस दीपक की अनझिप ज्वाला आदर से थोड़ा उकसा कर
मैं मानो उस की अनुमति से फिर उस की याद हरी करता हूँ-
उस से कही हुई बातें फिर-फिर तेरे आगे दुहरा कर!