सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, July 1, 2008

नारी....

नारी - श्रद्धा,
नारी - देवी,
नारी -कर्तव्य
नारी -सौंदर्य,
नारी - कसौटी की पात्र,
नारी - शोध का विषय,
नारी - एक प्रश्न,
नारी - एक रहस्य................................
पर एक माँ ,ना है शोध का विषय,
ना प्रश्न, ना कोई रहस्य ..............
ममता की प्रतिमूर्ति!
फिर क्यूँ कसौटी.........?
औरत होने का दंड?
मैं मानती हूँ ,स्त्री - पुरूष में समानता नहीं,
पर स्त्री पुरूष की दासी नहीं
स्कूल में आई कोई छात्रा नहीं,
स्त्री को सुरक्षा भरा घेरा चाहिए,
पुरूष सुरक्षा देने से करता है इनकार........
क्यूँ?

17 comments:

Anonymous said...

aap ki rachna achi hain lekin yeh aaj ki sonch aur dhrusti bhi batati hain, hum shakshar hone ke baad bhi kai kadam peeche hain kiyun ke nari ko jo samman milna chahiye woh nahi milta, suraksha nahi milti,

Nari ke kai roop dekh kar bhi najane kiyun log unhe aasay chod jate hain, kabhi yehi nari unki MAA, Behan, Beti, aur ardhangini hoti hain.

mehek said...

bahut sundar

रश्मि प्रभा said...

shukriyaa,aapne sahi kaha......
isse itna to spasht hai ki shikshaa vyaapak arth me honi chahiye,wah shiksha kis kaam ki,jisne jeevan ka sahi arth nahin bataya.!

रचना said...

ek saarthak prashn per rashmi samay haen ki ham सुरक्षा dena seekhae maangan nahin . apni kaabliyaat baadhatey jaaye , arthik nirbhar ho tab hee ham aagey jaa payae . naari kaa astitav kewal chaar diwari mae naa nkaed hokar aagaey bhi yaae , maa bahin patni beti naari kae rup ho saktey par naari nahin . apni pehchaan banayo surakhsha kae liyae kisi kaa sahara mat mango apney saharey jindgii jina seekho , apni importance pehlae khud samjho tab hee koi samjhega

kavita bahut sunder ban gaee haen jaese aap ki hamesha hotee haen bravo

Anonymous said...

didi vaakai naari... lajawaab hai....
aapko pata hai, nari ki shakti se sabhi bahut achchi tarah parichit hain... lekin apni dabangta jari rakhne ke liye.. purush naari ko apne se kamtar hi aankta hai....!!!!!!!

vijay said...

didi vaakai naari... lajawaab hai....
aapko pata hai, nari ki shakti se sabhi bahut achchi tarah parichit hain... lekin apni dabangta jari rakhne ke liye.. purush naari ko apne se kamtar hi aankta hai....!!!!!!!

रंजू ranju said...

सुरक्षा तो हर स्त्री को अपनी ख़ुद ही करनी होगी ..अच्छी है कविता

सतीश said...

Nice one.

advocate rashmi saurana said...

Rashmi ji apne bhut accha likha hai. ati uttam. jari rhe.
aaj hi mene bhi nari par ak kavita likhi hai.

siddharth said...

स्त्री पुरुष की दासी?
यह मानता कौन है?
बहू को दहेज के लिए जला कर मारता कौन है?
बेटे की जिद के आगे बेटी की ख़्वाहिशें दबाता कौन है?
कोंख में ही उस अभागन को मिटाने में अस्पताल के चक्कर लगाता कौन है?
बेटी को ससुराल में गाय बनकर रहने के गुण सिखाता कौन है?
समाज की ऊँच-नीच के डर से देहरी पर पहरा बिठाता कौन है?
बेटा अगर किसी नारी के प्रति अपराध करे तो उसे छिपाता कौन है?
बेटी की ऊँची उड़ान पर आपत्तियाँ उठाता कौन है?
समाज में व्यभिचार, और देह व्यापार का चलन बढ़ाता कौन है?
......जरा निष्पक्ष भाव से सोचिए
क्या यह सब कुछ सिर्फ़ और सिर्फ़ कोई पुरुष करता है?
या कोई सास, कोई ननद, कोई माँ,
या कोई उन्मुक्त यौवना, कोई गणिका
इस कर्म-काण्ड में बराबर की साझी है
क्या आपने किसी स्त्री को इन भूमिकाओं में नहीं देखा?
जरूर देखा होगा
तो फिर एक जायज समस्या को
नाजायज तर्कों में न उलझाएं
आज की स्त्री असुरक्षित है
लेकिन सिर्फ पुरुषों से नहीं

यह हमारी साझी समस्या है
वह स्त्री किसी पुरुष की भी
माँ है, बेटी है, बहन है, पत्नी है,
जीवनसंगिनी है, प्रेयसी है, जीवन की डोर है
एक भावनात्मक रिश्ता यहाँ भी है

आइए इस साझी समस्या पर
सिर जोड़कर सोचें
तभी रास्ता निकलेगा
और जरूर निकलेगा

Preeti said...

achha likha hai maasi...lekin mera manna hai ki nari ko apni suraksha khud kerni chahiye...naki kisi dusre pe nirbhar hona chahiye...jab hum kisi field me kisi se peechhe nahi hain to apni security ke liye bhi khud hi alert hona chahiye...isn't it?

EHSAAS said...

di aapkee kavita nari man ki pida ka marmik chitran karti hai.....aur aapkee shilee to hai hi kamal..

...Ehsaas!

संत शर्मा said...

कविता प्रभावशाली और प्रासंगिक है | आपका प्रश्न सर्वथा उचित है | हलाकि मैं व्यक्तिगत तौर पर ऊपर लिखे गए सिद्धार्थ जी के विचारो से सहमत हू | आपके द्वारा उठाई गयी समस्या को दो पक्षों (स्त्री और पुरुष) में बाट कर न देख कर, एक सामाजिक समस्या के तौर पर देखने की जरुरत है |
आज की समस्या की वजह बहुत तक :
१) नैतिक मूल्यों में आई गिरावट है |
२) आपसी विश्वास में आई कमी है |
३) आपसी तालमेल और सुझबुझ का आभाव है |
४) मूल्यविहीन शिक्षा का प्रचार प्रसार है |
५) पश्चायत रहन सहन के प्रति बढती अन्धाशाक्ती है |

और आजकी बहुतेरी समस्यायों की वजह आज की चरमराती सामाजिक अवस्था है |
अतः इन समस्यायों का निदान स्त्री पुरुष के आपसी तालमेल और सुझबुझ से ही संभव है |

मीनाक्षी said...

सुरक्षा का घेरा हमें अपने लिए खुद बनाना है... यही नहीं... अपने बच्चों को भी इसी ताकत से परिचित कराना है कि हमारे अन्दर ही शक्ति छिपी है...

राष्ट्रप्रेमी said...

पर एक माँ ,ना है शोध का विषय,
ना प्रश्न, ना कोई रहस्य ..............
ममता की प्रतिमूर्ति!
फिर क्यूँ कसौटी.........?
औरत होने का दंड?
मैं मानती हूँ ,स्त्री - पुरूष में समानता नहीं,
पर स्त्री पुरूष की दासी नहीं
स्कूल में आई कोई छात्रा नहीं,
स्त्री को सुरक्षा भरा घेरा चाहिए,
पुरूष सुरक्षा देने से करता है इनकार........
क्यूँ?
bahut achchhi kavita. suraksh ek vyapak prashn hai keval nari hi nahi nar bhi suraksha nahi kar sakata, suraksha milakar sampoorn samaj ko karani hogi samaj ke manako ko aswikar karake n tau nar surakshit rah sakata hai aur n nari akele suraksha karane ka daba sirf aham hai. aao sath-sath milakar apani v samaj ki suraksha kare.

Harsh Anchalia said...

nari ki isat karna hamara dhar kartavya hain

Harsh Anchalia said...

nari ki isat karna hamara dhar kartavya hain