सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, July 29, 2008

हम किराये पर लेते हें विदेशी कोख

हम बहुत तरक्की कर रहें हें
पहले बेटियों को मारते थे
बहुओ को जलाते थे
अब तो हम
कन्या भ्रुण हत्या करते है
दूर नहीं है वो समय
जब हम फक्र से कहेगे
पुत्र पैदा करने के लिये
हम किराये पर लेते हें
विदेशी कोख

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11 comments:

राष्ट्रप्रेमी said...

रचनाजी, शायद हमारी नीतियां व महिलाओं के लिये घटता सम्मान हमें इसी और ले जा रहे है, आपने कटु सत्य लिखा है.

नीरज गोस्वामी said...

हम किराये पर लेते हें
विदेशी कोख
किराये पर लेनी तो शुरू भी हो गयी है...
नीरज

बाल किशन said...

जो पीड़ा छिपी है आपकी इस रचना में वो आपने शब्दों में बाखूबी बयां की है.
सच्ची कविता.
बधाई.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

यह दर्द ब्यान करती है उस हालत का जो शायद अब सच बनता जा रहा है

Amma said...

har shabd me virodh ki tej aag hai.......

रश्मि प्रभा said...

sachaai ko sashakt dhang se bayaan karti hain aap.......

Manvinder said...

rachana ji, bahut kadwa sach kah diya hai apne....
achha or sachha likha hai

रचना said...

समाज के ठेकेदार जो नारी स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ हैं , जो नारी पुरूष की समानता के ख़िलाफ़ हैं , जो नारी और पुरूष को पूरक मानते हैं और फिर भी ये सब करते हैं , जो सदियों से परिवार की बलिवेदी पर नारी को कुर्बान कर रहे हैं , जो परिवार बचाना चाहते क्योकि मानते हैं की परिवार भारत की संस्कृति का हिस्सा हैं ख़ुद नारी को ख़तम करते जा रहे हैं . परिवार बचाना हैं तो नारी को सक्षम करे , आर्थिक रूप से . उसे हर वो अधिकार दे जो संविधान ने बराबरी का उसे दिया हैं आप सब को कविता मे पीड़ा , आक्रोश और सच्ची दीखी लगा शब्दों ने अपना काम किया .

मीनाक्षी said...

आपके शब्दों की उर्जा समाज के सर्द होते दिल में हरकत पैदा कर सकती है...!

राष्ट्रप्रेमी said...

रचनाजी अधिकार मांगने से नहीं मिलते, सक्षमता मांगी नहीं जाती, सुविधा भोगी व संरक्षण के जाल से निकल कर आभूषणों के मोह को त्याग कर परिश्रम से प्राप्त करना होगा. परिवार व समाज नारी के दुश्मन नहीं हैं. परिवार व समाज नारी की ही उत्पत्ति है, इनमें परिवर्तन भी वही कर सकती है.

sab kuch hanny- hanny said...

bahut khub yahi to aaj ka samay ki bidambana hai