सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Monday, July 28, 2008

स्वयंसिद्धा

मेरे लिये जरूरी नहीं है
तुम्हारे सुर में सुर मिलायूं
तुम्हारी हां को स्वीकारूं
तुम्हारे तय किये निर्णय मानूं
तुम्हारे कंधे का सहारा लूं
तुम्हारी राह तकूं
क्योंकि
अपने अंदर की स्वयंसिद्धा मैं पहचान गई हूं
तुम्हें भी जान गई हूं
मौका पड़े तो भरी सभा में
देख सकते हो मेरा चीर हरण
इक जरा सी बात पर
दे सकते हो जगलों की भटकन

मनविंदर भिंभर

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

10 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही कहा अब यह हिम्मत हर नारी में जाग जाए ..सुंदर लिखा है आपने

Ila's world, in and out said...

बहुत बढिया.लिखती रहिये ऐसे ही.

Omkar Chaudhary said...

good, lage raho..
es self confidence ki bahut
jaroorat hai..bahut kuchh sudhar
jaiga. thode shabdo mai bahut kuchh
kah dena..ye hi visheshta hai apki.

eslie..lage raho.

omkar, meerut

रश्मि प्रभा said...

bahut hi achhi

vipinkizindagi said...

achcha likha hai aapne

advocate rashmi saurana said...

bhut sahi v bhut badhiya. jari rhe.

hindu divine said...

Nai unchaiyon ki taraf nahi...
Apne vastavic sthan ki or badhte kadam....NARI KE.....Is samaj me..
Shubhkamnaye

noopur said...

स्वागत है। एकदम सही लिखा आपने ।

Hai, Its so inspiring, motivating and wonderful. Keep going. All the best.

Dr. Noopur

राष्ट्रप्रेमी said...

स्वयंसिद्धा
मौका पड़े तो भरी सभा में
देख सकते हो मेरा चीर हरण
इक जरा सी बात पर
दे सकते हो जगलों की भटकन
बहुत अच्छी कविता
किन्तु मनविन्दर जी न तो सभी नारी स्वयं-सिद्धा होती हैं और नहीं सभी पुरुष युधिष्ठर और राम, हां, नारी को आगे बढने के लिये आदर्श प्रस्तुत करने वाली कविता है.

Manvinder said...

rashtar permi ji,
udhishthar or ram hamre beech mai hi hai...koshish je honi chahiye ki esthitiya sudhare....or jis naari ne swam ko pahchaan liya hai....swamsidhha to hai hi