सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, July 23, 2008

वैदेही ने जो किया वह तुम ना करना

वैदेही ने जो किया
वह तुम ना करना
कोई भी अगर लाछन
तुम्हारे चरित्र पर लगाए
तो अब अग्नि परीक्षा
तुम ना देना
पति घर निकला भी दे
तब भी घर
तुम ना छोड़ना
ताकि फिर कोई लव कुश
घर से बाहर ना पैदा हो
और फिर कोई वैदेही
धरती मे ना समाये
और हाँ फिर किसी राम
को यज्ञ किसी सीता की
मूर्ति के साथ ना करना पडे
रामायण एक और रची जाये
या ना रची जाए
राजा अपना धरम निभाए
या ना निभाए
तुम अपना धर्म निभाना
आने वाली सीताओं के लिये
मार्ग प्रशस्त करती जाना

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4 comments:

Manvinder said...

पति घर निकला भी दे
तब भी घर
तुम ना छोड़ना
ताकि फिर कोई लव कुश
घर से बाहर ना पैदा हो
और फिर कोई वैदेही
धरती मे ना समाये
और हाँ फिर किसी राम
को यज्ञ किसी सीता की
मूर्ति के साथ ना करना पडे
रामायण एक और रची जाये
je aaj b jaari hai. or pata nahi kab tak jaari rahega.....
kab tak seeta ki pariksha deni hogi....koi nahi jaanta...
at sunder parstuti
Manvinder

रश्मि प्रभा said...

ramayan ki bhi kaisi rachna......zarurat nahin,bahut sahi kaha

pearl neelima said...

very true...one has to fight for her rights...

रेनू जैन said...

बहुत सही .... काश कि हर नारी ये समझ पाये... और उससे भी अहम है कि ऐसा कर पाये.... क्योंकि चाह कर भी न कर पाना ही तो नारी-विडम्बना है.........