सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, July 8, 2008

मुश्किल है........


सिद्धांत, आदर्श, भक्तियुक्त पाखंडी उपदेश

नरभक्षी शेर,-गली के लिजलिजे कुत्ते,

मुश्किल है

मन के मनको में सिर्फ़ प्यार भरना!

हर पग पर घृणा,आंखों के अंगारे

आख़िर कितने आंसू बहायेंगे?

ममता की प्रतिमूर्ति स्त्री-एक माँ

जब अपने बच्चे को आँचल की लोरी नहीं सुना पाती

तो फिर ममता की देवी नहीं रह जाती

कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हारी गालियों से

लोरी छिनकर तुमने ही उसे काली का रूप दिया है

और इस रूप में वह संहार ही करेगी!

सिर्फ़ संहार!

फिर रचना का सिद्धांत क्या?

आदर्श क्या?

भक्तियुक्त उपदेश क्या?

मुश्किल है मन के मनको में सिर्फ़ प्यार भरना!............

10 comments:

ख्वाब है अफसाने हक़ीक़त के said...

कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हारी गालियों से


लोरी छिनकर तुमने ही उसे काली का रूप दिया है


और इस रूप में वह संहार ही करेगी!

Bahut khoob Kaha, Rashmi Didi.

Deepak Gogia

रंजू भाटिया said...

मुश्किल है मन के मनको में सिर्फ़ प्यार भरना!............सुंदर रचना

masoomshayer said...

कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हारी गालियों से

लोरी छिनकर तुमने ही उसे काली का रूप दिया है

और इस रूप में वह संहार ही करेगी!

सिर्फ़ संहार!

फिर रचना का सिद्धांत क्या?

आदर्श क्या?

भक्तियुक्त उपदेश क्या?


bahut achha hai aur gahara hai
Anil

Rachna Singh said...

excellent rashmi what a way to express the reality . and thisis the reality . people dont like realities they feel that by closing the eyes we can always be on the safer side but its important to express with such intensity . we are happy that you are part of this group

mehek said...

भक्तियुक्त उपदेश क्या?


मुश्किल है मन के मनको में सिर्फ़ प्यार भरना!............
sahi,satik vaar,aur ek achhi abhivyakti,ek sundar si rachana ke lie bahut badhai.

avinash said...

bahut hi sahi likha hai
ati uttam tarike se bhawnaao ko ukera hai aapne

शोभा said...

रश्मि जी
और इस रूप में वह संहार ही करेगी!


सिर्फ़ संहार!


फिर रचना का सिद्धांत क्या?


आदर्श क्या?


भक्तियुक्त उपदेश क्या?


मुश्किल है मन के मनको में सिर्फ़ प्यार भरना!............
बिल्कुल सही लिखा है आपने। बात सच्ची और दिल को छूने वाली है। बधाई स्वीकारें।

Manvinder said...

कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हारी गालियों से

लोरी छिनकर तुमने ही उसे काली का रूप दिया है
bahut sunder. kya baat kag di hai aapne
Manvinder

संत शर्मा said...

sahi kaha, waqui "मुश्किल है मन के मनको में सिर्फ़ प्यार भरना" lakin nafrat bharne se samashyaye aur jatil hi hoti jati hai.

vinodbissa said...

bahut shandar rachanaa hai ........