सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, July 18, 2008

अपना घर

एक घर मे लेती हैं जनम
मानी जाती हैं
धरोहर किसी दूसरे घर की
जाती हैं दुसरे घर
शिक्षाओ कर्तव्यो मे जकडी हुई
दूसरी का वंश बढ़ाने के लिये ।
पति और बच्चो के बीच
बनती हैं सीढ़ी
एक चढ़ता हैं , दूसरा उतरता हैं
पर सीढ़ी हट नहीं सकती ।
कर्तव्य बोध मे बंधकर
अस्तित्व के लिये छटपटाती हैं ।
जिस घर मे जनम लिया
ना वह अपना
जिस घर मे आयी
न वह अपना ।
कर्तव्य की बेडियाँ
अस्तित्व से टकराती हैं
भड़क उठती हैं ज्वाला
कहीं किसी कलम से
निकलेगे जब चिंगारियों के शब्द
तभी नारी रख पायेगी
अपने घर की नींव
तभी बचा पाएगी
अपना घर , उसका अपना घर ।

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

6 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

शिक्षाओ कर्तव्यो मे जकडी हुई
दूसरी का वंश बढ़ाने के लिये ।
पति और बच्चो के बीच
बनती हैं सीढ़ी
एक चढ़ता हैं , दूसरा उतरता हैं
पर सीढ़ी हट नहीं सकती ।
कर्तव्य बोध मे बंधकर
अस्तित्व के लिये छटपटाती हैं .
bahut sundar abhivyakti .daktar. manju sih ji ko badhai.

परमजीत बाली said...

नारी ह्रदय की संवेदनाओं को बखूबी अभिव्यक्त किया है। अति सुन्दर!

Anonymous said...

bahut accha likha hai

रंजना [रंजू भाटिया] said...

कविता बहुत अच्छी लगी

ilesh said...

Bilkul sahi kaha he aapne...naari ke kehne ke to 2 ghar hote he...jaha vo paida hui vaha se bidai se hi vo ghar uska ab paraya ban jaati he aur jo paraya usne apnaa banaya us ghar ko koi use apna banane nahi deta....kaisi ye duvidha he? ek naari ki jindgi ki?jo sabko apna bana leti he uska hi koi nahi hota.......

रेनू जैन said...

बहुत खूब मंजुलता जी... न जाने नारी अपना स्वयं का घर कब खोज पाएगी........