सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Sunday, July 20, 2008

स्वयं को खोजने का हक नहीं है मुझे?

पैदा हुई तो बेटी हो गई
बड़ी हुई तो बहन हो गई
ब्हायी गई तो पत्नी हो गई
घर की लक्ष्मी हो गई
फिर सौभाग्यवती हो गई
क्यों कि मैंने ओढ़ ली जिम्मेवारियों की चुनरी
इन सब में मैं कहां थी?
इसका जवाब खोजना चाहा तो
न बेटी-बहन रही न पत्नी रही
न सौभाग्यवती रही
न घर की लक्ष्मी रही
स्वयं को खोजने का हक नहीं है मुझे?

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

4 comments:

shalu said...

sahi kah rahi hai aap naari ko swyam ko khojne kaa halk hamare samaj ne nahi diya hai jo nari khud ko khojne kaa prayas kartee hai uski khoj mei jag nikal padta hai very good

रचना said...

sunder kavita
kami apne ander haen to nivaran bahar kaese milega
pehlae apney ko pehchano phir kisi rishtey mae apney ko bandho
taaki jee sako apni zindgi
varna to auro kii tarah kehtaey hee rehnaa hogaa
itni kat gayee , aagey bhi kat jaayegee

रंजना [रंजू भाटिया] said...

इन सब रूपों के साथ साथ खोजना और ख़ुद की पहचान बनाना अपने हाथ में है ..जब तक हम ही ख़ुद को कमजोर बनाते रहेंगे दूसरो पर दोष देखना सही नही है ..

रश्मि प्रभा said...

baat sahi likha,par yakeenan apne wajud ka haq hai......
par chalnewale sach ko sahi saanche me dhaala....