सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, July 9, 2008

दुर्गा का आह्वान........

तुमने सोचा होगा,
मैं उन मूर्ख स्त्रियों में हूँ,
जिन्हें अपनी तारीफ सुनना
अच्छा लगता है।
तुम्हे क्या लगा?
मेरा कोई अस्तित्व नहीं है?
आम बुध्धिजीवियों की तरह तुम्हे लगा
एक पुरूष की छत्रछाया नहीं
तो मुझे पाया जा सकता है!
हँसी आती है,
अरे स्त्री तो पुरूष की प्रेरणा बनती आई है,
उसीकी लोरी पर उसे नींद आई है,
अर्धांगिनी बन उसीने
पुरूष को पूर्णता दी है!
..........................
सड़क पर एक स्त्री को लाने के मद में
यह पुरूष तो अधूरा होता है!
एक स्त्री-
माँ,बहन,बेटी भी होती है.........
और इन रूपों में
वह अद्वितीय होती है!
ऐसी अनुपमा को
कठपुतली बनाने की ख्वाहिश लिए
यह पुरूष,
अनजाने ही दुर्गा का आह्वान कर
स्त्री में उसकी प्राण - प्रतिष्ठा करता है.............!!!

8 comments:

ख्वाब है अफसाने हक़ीक़त के said...

एक स्त्री-
माँ,बहन,बेटी भी होती है.........
और इन रूपों में
वह अद्वितीय होती है!
ऐसी अनुपमा को
कठपुतली बनाने की ख्वाहिश लिए
यह पुरूष,
अनजाने ही दुर्गा का आह्वान कर
स्त्री में उसकी प्राण - प्रतिष्ठा करता है.............!!!

Inn panktiyo mein stri ki vaastvikta dikhayi padti hai !

Aap badhaai ki paatr hain !

Deepak Gogia

Anonymous said...

अपनी तारीफ़ सुनने की चाह रखने वाली स्त्रियाँ क्या मूर्ख होतीं हैं????

संत शर्मा said...

Kavita bahut khubsurat likhi hai aapne, lakin mere hisab se Kavita Stri ya Purush ke ekpakshiya nazarie se nahi likhi jani chahiye waliq uchit hota hai yadi dono ke madhya aakar ek vicharak ke nazarie se likhi jaye. Har purush galat hi hoga aur har stri sahi hi hogi yese dharna bana lena "Purvagrah se pidit" hona hi samjha jata hai. Ek Purush - Pita, Bhai, Beta hota hai, aur in rupo me kuch nahi baas awitiya hi hota hai. Sirf Stri hi Purush ki purak nahi hoti, Purush bhi Stri ka purak hota hai.

Ek chota sa sheer suna hoga aapne ki :

Hum hi hum hai, to keya hum hai
Tum hi tum ho, to keya tum ho

MAI SHAYAR TO NAHI said...

वाह..!! बहुत खूब. एक नारी के दिल की पीडा को आपने अपने शब्दों के तस्वीर में उतरा है.. अच्छा लगा पढ़ कर..

vinodbissa said...

दुर्गा का आव्हान ..... बहुत प्रभावशाली रचना है ....... स्त्री कि प्रतिमा को आपने बखूबी पेश किया है ........ रश्मि जी शुभकामनाएं.....

राजीव रंजन प्रसाद said...

प्रभावित और नि:शब्द करती है आपकी रचना..बधाई स्वीकारें..


***राजीव रंजन प्रसाद

शोभा said...

रश्मि जी
बहुत सुन्दर लिखा है-
एक स्त्री-
माँ,बहन,बेटी भी होती है.........
और इन रूपों में
वह अद्वितीय होती है!
ऐसी अनुपमा को
कठपुतली बनाने की ख्वाहिश लिए
यह पुरूष,
अनजाने ही दुर्गा का आह्वान कर
स्त्री में उसकी प्राण - प्रतिष्ठा करता है.............!!!
बधाई स्वीकारें।

शोभा said...

रश्मि जी
बहुत सुन्दर लिखा है-
एक स्त्री-
माँ,बहन,बेटी भी होती है.........
और इन रूपों में
वह अद्वितीय होती है!
ऐसी अनुपमा को
कठपुतली बनाने की ख्वाहिश लिए
यह पुरूष,
अनजाने ही दुर्गा का आह्वान कर
स्त्री में उसकी प्राण - प्रतिष्ठा करता है.............!!!
बधाई स्वीकारें।