सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, July 18, 2008

पूर्णमासी का चांद






देखो
अब तुम ये मत कहना
मैं चांद को न देखूं
बरसती चांदनी को निहारना छोड़ दूं
मुझे मत रोको
करने दो मुझे भी मन की
आज का चांद मैं देखूंगी
पूर्णमासी का चांद
बरसती चांदनी मैं निहारूंगी
तुमको गर ये सुहाता है
तो आओ मेरे संग बैठो
लेकिन मुझे मत रोको
करने दो मुझे भी मन की
मुझे मत रोको


मनविंदर भिम्बर


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!




5 comments:

Mired Mirage said...

बढ़िया।
घुघूती बासूती

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुंदर ..चाँद पर तो सभी का हक है

मीनाक्षी said...

बहुत प्यारी रचना...

ilesh said...

short and sweet ati sundar....

रश्मि प्रभा said...

bahut sundar