सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, July 8, 2008

रिश्ता अपना अपने से

पिता से बना जब रिश्ता बेटी तुम कहलाई
भाई से बना जब रिश्ता भगिनी तुम कहलाई
पति से बना जब रिश्ता पत्नी तुम कहलाई
बेटे से बना जब रिश्ता माँ तुम कहलाई
अपने से बना जब रिश्ता सम्पूर्ण नारी तुम कहलाई


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4 comments:

Manvinder said...

ek pure jeewan ko darsha rahi hai apki panktiya. bahut sunder
Manvinder

रश्मि प्रभा said...

sau pratishat sahi baat kahi
prashansniye.......

शोभा said...

बहुत सुन्दर लिखा है रचना जी। नारी की पूर्णता इसी में है कि अपने को पहचाने और अपनी अलग पहचान बनाए।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

नारी अस्तित्व को दर्शाती एक पूर्ण कविता है यह