सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, July 11, 2008

सावन

रुकी रुकी सी बारिशों के बोझ से दबी दबी
झुके झुके से बादलों से -

धरती की प्यास बुझी
घटाओं ने झूमकर मुझसे कुछ कहा तो है
बुँदे मुझे छू गई -तेरा ख्याल आ गया
खुशबू वाला पानी तुझसे भी कुछ कहता होगा
बादल ने बारिश के हाथोंतुझको भी कुछ भेजा होगा
घटाओं ने बरसकर ,तुझसे कुछ कहा है क्या -
सावन की रिमझिम मेंतेरा ख्याल आ गया
--नीलिमा गर्ग

5 comments:

advocate rashmi saurana said...

bhut sundar. jari rhe.

मीनाक्षी said...

प्रकृति का प्रेम मानव मन को मोह लेता है और अनायास ही कविता का सुन्दर रूप ले लेता चला जाता है.

रश्मि प्रभा said...

waah,is saundarya me mann dub gaya

रचना said...

sab sae nivedan haen ki is blog par please naari vishyo sae sambhandit kavitaaye daaley taaki is blog par kavita kae maadhyam sae un par charcha ho .

rajiv said...

मन को छू गई सावन की रिमझिम ............!