सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Monday, July 14, 2008

क्यो टूटते है रिश्ते

होता है हर रिश्ता एक तरफ़ा
एक दे देता है एक लेता है
जब देने वाले के पास
कुछ नही बचता
तो लेने वाला
चला जाता है
रिश्ता ही लेकर
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7 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही कहा आपने

परमजीत बाली said...

सही ।

रश्मि प्रभा said...

jab swaarth ho to aisa hi hota hai.........

Manvinder said...

rishata do logo ke beech hota hai, nibhane se hota hai, rishta leker nahi ja sakte kahi b, jaane ke samay uska dard hi jaata hai sath.
Manvinder

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती

ललितमोहन त्रिवेदी said...

रिश्तों को चन्द पंक्तियों में अभिव्यक्त कर गागर में सागर भरा है !बहुत सुंदर और सशक्त रचना !

रेनू जैन said...

रिश्तों के विषय में बिल्कुल सही कहा आपने..........

लेने वाला तो अपनी ओर से रिश्ता ले जाता है.... तभी तो 'देने वाले' के हिस्से में दर्द रह जाता है....