सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, June 10, 2008

खो रहे है रिश्ते

एक समय था
जब माँ के घर से जो आता था
मौसी मामा नानी नाना
कहलाता था
पूरा पडोस मायेका होता था
पिता के दोस्त चाचा ताऊ होते थे
जिनके कंधे पर चढ़ता था बचपन
आस पड़ोस मे लडकिया नहीं
बुआ , मौसी , मामी , चाची रहती थी
जिनकी गोदीयों मे सुरक्षित
रहता था बचपन
हमे तो मिले है संस्कार बहुत
क्या हम दे रहे है अगली पीढ़ी को
एक डर एक सहमा हुआ बचपन
क्यो खो रहे है रिश्ते
ज़िन्दगी की भीढ़ मे

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

4 comments:

ज़रिये आलोक said...

वाह, कुछ ही लाइनों में सारे सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों की मधुरता का बयान कर डाला। वाह।

Anonymous said...

bahut sahi kaha,aaj rishton se jyada ehmiyat yantrana ko hai,tv,dvd,internet,samay kaha hai kaam se aane ke baad batiyane ka,nagar am lucky still paas pados ke rishtey aunty uncles mausi ,chacha bane rahe hai,agli pidhi ko bhi hame hi ye saugat dini hogi,ek sundar bhavpurn kavita ke liye badhai.

रंजू भाटिया said...

आज के वक्त की सही तस्वीर है इस में ..सही में सब रिश्ते अब मायने खो रहे हैं ..वक्त ही नही है अब किसी के पास .

neelima garg said...

very nice..