सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, June 26, 2008

जैसे गंगा नहा कर मै आयी हूँ

बहुत दिन बाद आज फिर महसूस किया
कि जैसे गंगा नहा कर मै आयी हूँ
जब भी कहीं कुछ मरता है
गंगा नहाना बहुत जरुरी होता है
अस्थिया भी विसर्जित गंगा मे ही होती है
पाप भी गंगा मे ही धुलते है
पाप ही नहीं पुण्य करके भी गंगा नहाते है
भटके हुओं को घर पंहुचा कर भी गंगा नहाते है
कायर रिश्तों की लाश को कब तक मै ढोती
दूसरो के पापो को कब तक मै सहजती
कर दिया है मैने विसर्जन
अनकहे के इंतज़ार का
बहुत दिन बाद आज फिर महसूस किया
कि जैसे गंगा नहा कर मै आयी
हूँ

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4 comments:

mehek said...

dusron ke paap ko kar diya visarjit aur ganga nahane ka sukh pane ka khayal bahut hi sundar khayal,badhai

advocate rashmi saurana said...

Rachanaji bhut sundar kavita. likhati rhe.

रश्मि प्रभा said...

jitni bhi taareef karun kam hai........

रंजू ranju said...

कर दिया है मैने विसर्जन
अनकहे के इंतज़ार का
बहुत दिन बाद आज फिर महसूस किया
कि जैसे गंगा नहा कर मै आयी हूँ

बहुत खूब ...गहरे भाव लिए बहुत ही सरल लफ्जों में कह दिया आपने ...