सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, June 12, 2008

असली रूप

कौन सा हैं असली रूप
दर्पण के सामने
खडे हो कर
देखा हैं कई बार ।
स्नानगृह का रूप ,
शयनकक्ष का रूप.
सभामंच का रूप ,
कार्यालय का रूप ,
सड़क का रूप ,
अस्पताल का रूप ,
मन्दिर का रूप ,
एक ही चेहरा
दिखता हैं दर्पण में
पर रूप
हर बार बदल जाता हैं ।
भीतर का निराकार
बाहर का साकार
चेहरे के हर कोण में
परिवर्तन बनकर
दिखता हैं दर्पण में

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

4 comments:

बाल किशन said...

बहुत ही सुंदर और सशक्त अभिव्यक्ति.
बेहतरीन लेखन.

mehek said...

bahut sundar,sach har baar ek alag roop.

रंजू ranju said...

भीतर का निराकार
बाहर का साकार
चेहरे के हर कोण में
परिवर्तन बनकर
दिखता हैं दर्पण में

बहुत ही सच्चा लिखा है आपने

vandana said...

bahut khoob likha hai.zindagi ki haqeeqat hai yeh.darpan hamare asli roop ka aaina hota hai jo wastav mein man ka darpan hota hai na ki sharir ka.hamare ar anchuye pahlu ka darpan.