सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Saturday, June 21, 2008

एक घुटन भरी डायरी -- असफल औरत

एक घुटन भरी डायरी
यानि एक असफल औरत
एक सफल पुत्री
एक सफल पत्नी
एक सफल माँ
और एक असफल इंसान
मानसिक रूप से टूटी
सामाजिक रूप से सुरक्षित
गलती हमेशा अपनी नहीं
किसी और की खोजती
सब सुविधा से घिरी
फिर भी असंतुष्ट
सदियों से केवल साहित्य रचती
एक घुटन भरी डायरी लिखती
एक असफल औरत जो
इनसान ना बन सकी
राह अपनी ना चल सकी
क्योकी चाहती थी
राह के कंकर कोई चुन देता
सिर पर छाँव कोई कर देता
और सफल इंसान वो कहलाती
घुटन से आजादी वो पाती

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

8 comments:

रंजू ranju said...

क्योकी चाहती थी
राह के कंकर कोई चुन देता
सिर पर छाँव कोई कर देता
और सफल इंसान वो कहलाती
घुटन से आजादी वो पाती

बेहद खूबसूरती से आपने एक एक लफ्ज़ में सच में ढाल दिया ..मुझे यह बेहद पसदं आई

mehek said...

क्योकी चाहती थी
राह के कंकर कोई चुन देता
सिर पर छाँव कोई कर देता
और सफल इंसान वो कहलाती
घुटन से आजादी वो पाती

bahut hi badhiya rachanaji,ghutan bhari diary likh kar hi sahi usne apne vichar likhe,phir amal bhi kiya aur aazadi ki aur kadam bhi rakhe.

swapandarshi said...

ये सच क एक पहलू हो सकता है, पर सच नही.
इतने एकांगी तरीके से सच को न देखे. व्यक्तिगत स्वतंत्र्ता और प्रयास का अपना महत्त्व है, पर हर देश काल मे उसकी भी एक सीमा है.

और औरत को हमेशा "इस एक और उस एक मे से क्यो चुनाव करना है" ? इस पर भी सोचे?

एक सम्पूर्ण मनुश्य की तरह क्यो नही औरत एक अच्छा सम्म्मान जनक ग्रिहस्थ जीवन, और एक सम्मान जनक समाजिक जीवन और स्वतंत्रता क्यो एक साथ नही चुन सकती? उसके आगे कोन सी अड्चन है? इस पर भी सोचे? पुरुश के लिये सब कुछ एक साथ स्वीकार्य है, पर क्यो स्त्री से एक को चुनने की अपेक्षा है?
अपनी राह के कंकड हर किसी को खुद चुनने पड्ते है, सिर्फ उन्ही को नही जो महिलाये मेरी या आपकी तरह कमाती है. शायद दूसरे पक्ष को चट्टाने हटानी पडती हो, जो आत्म निर्भर न हो.
बडे फ्रेम मे देखने की कोशिश करें. सिर्फ एक उच्च मध्य वर्ग की औरते है, जो बिना कुछ करें बहुत कुछ पा जाती है. बाकी बहुत ढेर सी पढी-लिखी और अनपढ औरते बहुत दुनिया का आधे से अधिक बोझ उठाती है.

रचना said...

पुरुष अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ता हैं और इसलिये वोह सब पाता हैं जो वो चाहता हैं , महिला अपनी लड़ाई नहीं लड़ती , जो अपनी लड़ाई लड़ती हैं वोह और कुछ पाए न पाये कम से कम ये सुख जरुर पाती हैं कि " i did my best " . सवाल केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक ही सिमित नहीं हैं सवाल हैं औरत कि सोच का । आज भी कमाने वाली औरते जो रोज ऑफिस / कॉलेज मे जाती हैं अपने सोच मे परतंत्र हैं क्योकि आज भी वोह पुरुष के बिना अपने को असहाय महसूस करती हैं । क्योकि औरत हमेशा ओने को कमजोर दीखाने मे खुश होती हैं और आज भी आप संभ्रांत से संभ्रांत परिवारों मे जाए तो male ego को बढावा औरत देती हैं अपने को कमजोर दिखा कर ताकि पुरुष के साए मे उसकी जिंदगी मेह्फूस रह सके । पुरुष को क्या मिला और क्यों कि जगह स्वपनदर्शी जी औरत अगर अपनी ग़लती देखे तो जल्दी प्रोग्रेस करेगी । एक औरत अगर मानसिक रूप से स्वंतंत्र होती हैं तो समझिये एक परिवार स्वतंत्र हो जाता हैं । और एक परिवार स्वतंत्र होता हैं तो समाज स्वतंत्र होता हैं । ६० साल से हाय हाय कर रही सो कॉल्ड प्रोग्रेसिव औरते सब सुख भोग कर भी अगर घुट रही हैं तो अफ़सोस ही कर सकती हूँ उनकी मानसिकता पर और खुश होती हूँ लाल मुनि देवी , कांग्रेस कंवर को देख कर । समय भाग रहा हैं अगर कोई चलना ही नहीं चाहता तो कम से कम उनको बार बार ये एहसास न कराये कि मत दौडो क्योकि केवल तुम्हारे दौड़ने से उन औरतो का क्या होगा जो चल भी नहीं रही । महादेवी वर्मा आज से कितनी साल पहले अकेली रही बिना पिता , पाती या पुत्र के संरक्षण के , प्रेरणा लेनी हो तो उनसे ले , लता मंगेशकर से ले और ये दोनों अगर अपनी व्यक्तिगत सोच को भूल कर बडे फलक कि बड़ी सोच पर रहती तो दिनेश नंदनी डालमिया कि तरह किसी कि चौथी पत्नी बन कर मरने से पहले अपनी जीवनी मे अपनी घुटन को लिखती । बाकी आप अपनी सोच के लिये स्वतंत्र हैं और मै अपनी कमेन्ट देने के लिये धन्यवाद

रश्मि प्रभा said...

aurat-ek ghutan bhari dairy,....
bilkul sahi,
bahut hi spasht rachna

shivani said...

रचना जी ,आपकी लिखी कविता पढ़ी !कविता बहुत खूबसूरती से लिखी है ,प्रेरणा दायक है मुझे पसंद आई !धन्यवाद !

माया ಮಾಯಾ மாயா માયાমাযা said...

एक घुटन भरी डायरी लिखती
एक असफल औरत जो
इनसान ना बन सकी
राह अपनी ना चल सकी
चन्द अल्फाजो मे आपने एक नारी की अन्तर्दशा का बहुत सुन्दर वर्णन करे दिया है,एक घुटन जो उसे जन्म से लेकर जीवन के अंत तक उसकी दिलो दिमाग मे छाई रहती है क्योकि वो एक नारी है ,उसे सही गलत का निर्णय लेने का अधिकार नहीं है,माँ बाप के घर मे भाइयो की तुलना मे ससुराल मे अन्य सदस्यों को प्राथमिकता देने के बाद ही नारी का विचार राय को महत्व दिया जाता है,अब तक की हमारी नारी को बराबर का अधिकार देने कोशिश सिर्फ कानूनी किताबो मे सिमट गई है ,और वह घुटन तन्हाई आज भी हर नारी को कोच्ती रहती है,

mamta said...

एक सशक्त अभिव्यक्ति।