सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, June 27, 2008

बस ऐसे ही , बस यूं ही

कितनी शामे बीती
कितनी राते आयी
पर
वह सुबह नहीं आयी
जब बीती शाम
और
बीती रात की
याद ना आयी
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समझोते की चारपाई तुमने बिछाई वो सोई
तुम भी अधूरे उठे वो भी अधूरी उठी
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खुद ने कहा , खुद ने सुना
दस्ताने मुहब्बत यूं ही
महसूस किया
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जिन्दगी की धूप छाँव मे धूप ने इतना तपाया
कि छाँव की आदत ही नहीं रही मुझको ।
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पल्ले मे बंधता है अधिकार,
मुठ्ठी मे बंधता है प्यार
मुठ्ठी भर प्यार ही देता है
फिर जिन्दगी संवार

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मंदिर मे राधा को पूजते है जो
जिन्दगी मे राधा को दुत्कारते है वो
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धूप मे छाँव मे संग मे साथ मे
मन मे तन मे आस हैं प्यास है
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कभी कभी जिन्दगी मे कुछ ऐसे रिश्ते भी होते हैं
जो हमारे नहीं होते पर हम याद उन्हे ही करते हैं
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हर कवियत्री को गर एक इमरोज मिलता
तो हर कविता मे अमृता होती

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10 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

वह सुबह नहीं आयी
जब बीती शाम
और
बीती रात की
याद ना आयी
बहुत खूब बधाई के काबिल हो आप

mehek said...

खुद ने कहा , खुद ने सुना
दस्ताने मुहब्बत यूं ही
महसूस किया
---------------------------
जिन्दगी की धूप छाँव मे धूप ने इतना तपाया
कि छाँव की आदत ही नहीं रही मुझको ।
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wah bahut hi sundar

रश्मि प्रभा said...

rachna,tum to bahut gahre ehsaas mann ke kone-kone me utaarti ho........ is gahraayi ko main gahraai se mahsus karti hun........

शायदा said...

सुंदर और भावपूर्ण कविता है।

महेन said...

कुछ अच्छी, कुछ बहुत अच्छी।
शुभम।

रंजू ranju said...

जिन्दगी की धूप छाँव मे धूप ने इतना तपाया
कि छाँव की आदत ही नहीं रही मुझको ।

बहुत खूब ..रचना जिंदगी का सच है इन लिखी हुई पंक्तियों में

रंजू ranju said...

हर कवियत्री को गर एक इमरोज मिलता
तो हर कविता मे अमृता होती

:) sahi kaha

डा० अमर कुमार said...

क्या बात है ?
झिंझोड़ कर रख दिया, भाई !

डा० अमर कुमार said...

बहुत ही नाज़ुक ख़्यालात, अतिसुदंर !

मीनाक्षी said...

एक एक शब्द प्रभाव छोड़ जाता है लेकिन यह लाइन दिल मे गहरे तक उतर गई जो सच बात भी है....
मुट्ठीभर प्यार ही देता है ... फिर ज़िन्दगी सँवार..