सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, June 13, 2008

हरसिंगार

हरसिंगार

लरजते अमलतास ने
खिलते हरसिंगार से
ना जाने क्या कह दिया
बिखर गया है ज़मीन पर
उसका एक-एक फूल
जैसे किसी गोरी का
मुखड़ा सफ़ेद हो के
गुलाबी-सा हो गया !!

3 comments:

mehek said...

wah ranju ji lajawab,jaise gori ka chera safed aur phir guabi atisundar

DR.ANURAG said...

kai baar sochta hun ki is amrita preetam ki deevani se poochu...ki ....ye amaltass ke phool jo fusfusa kar kah gaye ...aap in par amal kyu nahi karti?

बाल किशन said...

वाह!
अद्भुत!
अति सुंदर!
चमत्कृत!