सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Saturday, June 14, 2008

अगर राहे नई नहीं बनेगी

हम सब चले
एक बंधी बंधाई लीक पर
इसलिये हम सब चाहते हैं
कि सब चले बंधी बंधी लीक पर
जो नहीं चलते हैं उनको देख कर
लगता तो हमे यही हैं
क्यो हम भी नहीं चले
पर फिर भी
टीका टिपण्णी हम जरुर करते हैं
लीक पर ना चलने वालो पर
ताकि अपने मन के शोभ को
कुछ कम कर सके
अपनी कमियों पर परदा डाल सके
पर मन मे हमे पता हैं
वह ग़लत नहीं हैं
जो राहे नई बनाते हैं
क्योकि अगर राहे
नई नहीं बनेगी
तो सारी दुनिया को
चलते ही रहना होगा
उन सडको पर जो टूट चुकी है
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

5 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

वह ग़लत नहीं हैं
जो राहे नई बनाते हैं
क्योकि अगर राहे नई नहीं बनेगी
तो सारी दुनिया को चलते ही रहना होगा
उन सडको पर जो टूट चुकी है

अलग राह बनाना को संबंल चाहिये
नेता तमाम है
सृजेता दुर्लभ..

***राजीव रंजन प्रसाद

बाल किशन said...

उम्दा भाव.
सुंदर शब्द चित्रण.
अच्छी कविता के लिए बधाई.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

ठीक बात कही आपने रचना जी.. कविता के माध्यम से

mehek said...

क्योकि अगर राहे
नई नहीं बनेगी
तो सारी दुनिया को
चलते ही रहना होगा
उन सडको पर जो टूट चुकी है
bahut hi sahi baat kahi aapne,nayi raahein hongi to nayi disha ki aur kadam bhi badhenge,bahut hi sundar baat.

राष्ट्रप्रेमी said...

उत्तम, बहुत उत्तम!
सभी में नयी राहें बनाने की सामर्थ्य नहीं होती, सदैव नही राहें ही ठीक हों यह भी गारन्टी के साथ नहीं कहा जा सकता. अतः नवीन मार्गों की खोज जोखिम का काम है, सभी जोखिम नही ले सकते तभी तो कहा गया है-
लीक पर वे चलें जिनके कदम थके और हारे हैं,
हमें तो.................