सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, June 3, 2008

क्या कभी ???

क्या कभी शीशे के उस पार झाँक कर देखा है तुमने
क्या कभी ख़ुद के अंदर जलते हुए ख़्वाबों को देखा है तुमने

क्या कभी हँसते हुए की आँखो में आँसू देखे है तुमने
क्या कभी पानी से जलते हुए शूलो को देखा है तुमने

क्या कभी बादलो में छुपे हुए अरमानो को देखा है तुमने
क्या कभी सोते बच्चे की बंद मुट्ठी को देखा है तुमने

क्या कभी कानो में तुमको सदा सुनाई दी है किसी दिल की
क्या कभी महफिलों में तन्हा पड़े हुए फूलो को देखा है तुमने

क्या कभी हाँ ,अब बोलो क्या कभी इस दिल की आँखो से मुझको देखा है तुमने???

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

7 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

अब बोलो क्या कभी इस दिल की आँखो से मुझको देखा है तुमने???

वाह!!!

***राजीव रंजन प्रसाद

mehek said...

gar dil ki ankhon se dekhe wo aapko,pure jazbbat hi leher se daud jayenge gale milne unse,behad ksundar,sawalon ki barsaat hai.

DR.ANURAG ARYA said...

ek bar fir ek khoobsurat ahsaas ko lafzo ka jaama pahna diya aapne...

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया, सुन्दर रचना.

बाल किशन said...

अच्छी रचना के लिए badhai.
खूबसूरत ख्याल.
umda.

रचना said...

ab sab ney taareef kar dee toh maense socha gharewaale log bhi kar hee dae varna aap kahegee ghar kae log maeri importance nahin samjhtey . ab itna achcha likhetee haen to tareef karney kae liya shabd hee nahin hotey

शोभा said...

रंजू जी
मैने बहुत बार देखा है। पर हर बार शीषे के बाहर की दुनिया कुरूप ही लगी है। शीषे के भीतर की दुनिया अधिक क्यों लुभाती है नहीं जानती। आपकी सोच नई लगी-
क्या कभी शीशे के उस पार झाँक कर देखा है तुमने
क्या कभी ख़ुद के अंदर जलते हुए ख़्वाबों को देखा है तुमने
बधाई स्वीकारें।