सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Saturday, May 24, 2008

बड़ी होती बेटी माँ की परछाई है

बड़ी होती बेटी माँ की परछाई है
उसकी हर बात में अपनी ही छवि नज़र आई है
उसकी हर अदा लगती अपनी ही निराली है
लगता है मेरे बचपन की घड़ी फ़िर लौट आई है

बड़ी होती बेटी माँ की परछाई है ...

जब लिपट जाती है मुझसे एक लता सी
लगता है जैसे मेरा सहारा वही बन आई है
गोद में सिमटी हुई गुडिया यह मेरी
आँचल में जैसे कुनकुनी धूप उतर आई है

बड़ी होती बेटी माँ की परछाई है.......

महकता है उसके होने से मेरे दिल का हर कोना
उसकी हर मुस्कान से घर महक जाता है
जब भी छलके हैं मेरे आँसू दर्द बन के
वो मेरी ज़िंदगी में रोशनी बन के मुस्कराई है

बड़ी होती बेटी माँ की परछाई है....

तुझे देखती हूँ तो लगता है कि जैसे
मेरे अधूरे सपने को तू पूरा करने आई है
हर तेरी कामयाबी में अपनी ही झलक नज़र आई है
बड़ी होती बेटी माँ की परछाई है ...............
उसकी हर बात में अपनी ही छवि नज़र मुझे आई है !!

4 comments:

शोभा said...

रंजू जी
आप सही कह रही हैं। बेटी में अक्सर अपनी ही छवि नज़र आती है। और बहुत अच्छा भी लगता है देखकर। सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकारें।

mehek said...

bilkul sahi baat,maa ki parchayi beti hi to hai,bahut hi sundar.

satish said...

रंजना जी !
आप मां हैं , आपने मां - बेटी का जीवंत शब्द चित्रण किया है, आपकी यह रचना पढकर मैं पुरूष होकर भी मार्त्वह्रदय का अहसास महसूस कर पा रहा हूँ ! अधूरे सपने पूरे करने की इच्छा .......बेहतरीन भावनात्मक रचना है .
सतीश

नीरज गोस्वामी said...

बहुत सुंदर....बहुत भावुक कर दिया आपने. बेहद भावपूर्ण रचना...वाह...बधाई.
नीरज