सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, May 21, 2008

माँ तुम……


माँ तुम……
बहुत याद आ रही हो
एक बात बताऊँ………
आजकल…..
तुम मुझमें समाती जा रही हो


आइने में अक्सर
तुम्हारा अक्स उभर आता है
और कानों में अतीत की
हर एक बात दोहराता है

तुम मुझमें हो या मैं तुममें
समझ नहीं पाती हूँ
पर स्वयं को आज
तुम्हारे स्थान पर खड़ा पाती हूँ

तुम्हारी जिस-जिस बात पर
घन्टों हँसा करती थी
कभी नाराज़ होती थी
झगड़ा भी किया करती थी

वही सब……
अब स्वयं करने लगी हूँ
अन्तर केवल इतना है कि
तब वक्ता थी और आज
श्रोता बन गई हूँ

हर पल हमारी राह देखती
तुम्हारी आँखें ……..
आज मेरी आँखों मे बदल गई हैं
तुम्हारे दर्द को
आज समझ पाती हूँ
जब तुम्हारी ही तरह
स्वयं को उपेक्षित सा पाती हूँ


मन करता है मेरा…
फिर से अतीत को लौटाऊँ
तुम्हारे पास आकर
तुमको खूब लाड़ लड़ाऊँ
आज तुम बेटी
और मैं माँ बन जाऊँ


तुम्हारी हर पीड़ा, हर टीस पर
मरहम मैं बन जाउँ
तुम कितनी अच्छी हो

कितनी प्यारी हो
ये सारी दुनिया को बताऊँ
ये सारी दुनिया को बताऊँ© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

9 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

वाह शोभा जी, संवेदित कर दिया आपने..

***राजीव रंजन प्रसाद

रचना said...

kya baat haen , har shabd man ko chutaa haen aur apna saa lagta haen

nadeem said...

शोभा जी वाह! मगर आपने रुआंसा कर दिया.

रंजू ranju said...

यह पहले भी पढी है हर बार यह उतनी ही खूबसूरत लगी है ..और भावुक कर जाती है

मेरा कोई नाम नही मैं विचारधारा हूँ,एक क्रांति हूँ.. एक विद्रोह हूँ -विद्रोहिनी said...

achchhi kavita hai..bahut bhawnatmak.

Divine India said...

जगत को दिया गया महान वरदन "माँ"… सारा प्यार, जिज्ञासा, ममता, करुणा का द्वार… संपूर्ण है यह अभिव्यक्ति और शाश्वत है इसकी गीता…।

बहुत ही उम्दा रचना है…।

mehek said...

तुम्हारी जिस-जिस बात पर
घन्टों हँसा करती थी
कभी नाराज़ होती थी
झगड़ा भी किया करती थी

वही सब……
अब स्वयं करने लगी हूँ
अन्तर केवल इतना है कि
तब वक्ता थी और आज
श्रोता बन गई हूँ

shobhaji,dil ko chu gayi ye kavita,har insaan ke mann ki baat,sundar.bahut badhai

pearl neelima said...

wow , great feelings for mother....

Radhika Budhkar said...

बहुत बहुत बहुत अच्छी कविता,एकदम दिल को छु लेने वाली,आपको हार्दिक बधाई