सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, May 13, 2008

क्यों मुक्त हो जाने से तुम डरते हो
पर बन्धन के नाम से बिदकते हो,
बान्धूँ या छोड़ूँ तुम्हें, ओ मीत मेरे
क्यों इस निर्णय से सिहरते हो ?

तुमने रच डाला है शब्दों का जाल
अब उसमें ही तुम आ फंसते हो,
जब फंस जाते हो तो तड़पते हो
कसूँ या छोड़ूँ तुम्हें तुम्हारे ही हाल ?

चाहत मेरी कोई ऐसी तो न थी कि
करना पड़ता तुम्हें सबकुछ ही वार,
कुछ शब्दों को ही था माँगा मैंने
फिर चलती क्यों यूँ दिल पर धार ?

ना चाहा था कुछ लेना देना
तेरे जग में ना माँगा मैंने स्थान,
फिर क्यों लगता कि चोर हूँ मैं
ले भागी तेरे हृदय को अपना मान ?


घुघूती बासूती

2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

1 comment:

रंजू ranju said...

चाहत मेरी कोई ऐसी तो न थी कि
करना पड़ता तुम्हें सबकुछ ही वार,
कुछ शब्दों को ही था माँगा मैंने
फिर चलती क्यों यूँ दिल पर धार ?

बहुत ही अच्छी लगी थी आपकी यह कविता मुझे इस लिए वहाँ से यहाँ ले आई
भाव बहुत अच्छे हैं इसके