सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, May 15, 2008

इस जग में पहचान बनाने दो !










खिलने दो, खुशबू पहचानो

महकी बगिया कहती है सबसे

न तोड़ो, खिल जाने दो

इस जग में पहचान बनाने दो।

खिलती कलियों की मुस्कान को जानो

आकाश को छूते उनके सपनों को मानो

खिलने दो खुशबू पहचानो

महकी बगिया कहती है सबसे।

कण्टक-कुल से भरे कठिन रस्ते हैं इनके

फिर भी कुछ करने की चाह भरी है इनमें

न तोड़ो खिल जाने दो

इस जग में पहचान बनाने दो।

जीवनदान मिले तो जड़ भी चेतनमन पाए

जगती का कण-कण शक्तिपुंज बन जाए

खिलने दो खुशबू पहचानो

महकी बगिया कहती है सबसे।

न तोड़ो खिल जाने दो

इस जग में पहचान बनाने दो

महकी बगिया कहती है सबसे

खिलने दो, खुशबू पहचानो।

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

3 comments:

Udan Tashtari said...

वाह!!

रंजू ranju said...

बहुत ही सुंदर सच में इन नन्ही कलियों की मुस्कराहट से जग को झिलमिलाने दे सुंदर भाव हैं

Rachna Singh said...

वाह!!

बहुत ही सुंदर