सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, December 16, 2010

स्त्री का उदघोष

कोमल नहीं हैं कर मेरे;
न कोमल कलाई है;
दिल नहीं है मोम का
प्रस्तर की कड़ाई है.
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नहीं हैं झील सी ऑंखें;
हैं इनमे खून का दरिया;
मै हूँ मजबूत इरादों की
नहीं मै नाजुक -सी गुडिया.
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उठेगा वार तेरा जो मुझे
दबाने के लिए;
उसे मै तोड़ डालूंगी
भले पहने हूँ चूड़िया.
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मुझे जो सोचकर अबला
करोगे बात शोषण की;
मिटा दूंगी तेरी हस्ती
है मुझमे आग शोलों की.
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3 comments:

रचना said...

good keep it up

shalini kaushik said...

this is the right way to face man dominated society .well done

प्रदीप कुमार said...

बहुत ही अच्छी कविता है।
कृप्या मेरी भी कविताएँ पढ़ी जाय।
www.pkrocksall.blogspot.com