सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, April 22, 2008

वाह !! कितनी ज्वलंत हैं आज , "कल" की "भोली" नारी

नारी घूँघट मे दबी ढकी
लजाती सकुचाती
सिमिटी सकुचाई
शांत , मौन
तब कुछ ना बोली
जब दान हो कर
पिता से दहेज़ लेकर
चली पीया के संग
नारी धन कमाती
स्वाबलंबी , नौकरी करती
पति के संग आती जाती
सुरक्षित महसूसती
तब कुछ ना बोली
नारी ममता को अनुभाती
सामाजिक गरिमा पाती
तब कुछ ना बोली
और जब सब पा लिया
तो आवाहन किया
समय हैं
अब आत्म मंथन का
समाज मे फैली कुरीति
कन्यादान क्यों ? पर सोचने का
समाज मे पत्नी पर हो रहे
अत्याचार के खिलाफ
आवाज उठाने का
अपने अधिकारों के प्रति
सचेत होने का
आवाहन करती , शोध करती
भाषण देती
वाह !! कितनी
ज्वलंत हैं आज ,
"कल" की " भोली" नारी

क्योकी अब समय हैं
औरो को समझाने का ,
नियमावली दूसरो के लिये
नई बनाने का
अपनी कूटनीती को
आवरण विवशता
का पहनाने का


ये कविता उन नारियों के ऊपर हैं जो समय पर सब सुख उठाती हैं पर फिर भी हमेशा दुखी दिखती हैं और बाकी सब महिलाओ को जागरूक होने के कहती हैं । इसी दोहरी जिन्दगी जीती महिलाओ के कारण ही स्त्री जागरूकता पुरुषो मे मजाक का विषय होती हैं । क्या अच्छा हो अगर दूसरो को सिखाने की जगह हम सब अपने अंदर जागरूकता पैदा करे , सही समय पर अपनी लड़ाई ख़ुद लडे और जो नियम हम दूसरो के लिये बनाये पहले उनपर ख़ुद चले । बदलाव अपने मे लाये ।

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित
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4 comments:

शोभा said...

रचना जी
आप एकदम सही कह रही हूँ। नारी मुक्ति कोई मनोरंजन का विषय नहीं है । नारी को मुक्ति स्वयं नारी ही दिला सकती है। अपने आत्म विश्वास से अपना अस्तित्व बनाना है।

मीनाक्षी said...

सत्यवचन...अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने पर ही नारी को जीवन की नई दिशा मिल सकती है.

रश्मि प्रभा said...

sahi kaha,
aur spasht shabdon me kaha.......

रंजू said...

बहुत ही सुंदर और स्पष्ट कविता लिखी है आपने रचना आज कल यही सबसे पहले जरुरी है कि ख़ुद में वह हिम्मत लायी जाए .
राह अभी कुछ मुश्किल जरुर है ..पर मंजिल के निशान दिखने लगे हैं अब धीरे धीरे