सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Sunday, April 20, 2008

मेरी आत्मजा


मेरी आत्मजा
मेरा प्रिय अंग
आज देती हूँ तुम्हें
सीखें चन्द

नारी समाज की रीढ़
सृष्टि का श्रृंगार है
उसकी कमजोरी
सृष्टा की हार है

अन्याय को सहना
स्वयं अन्याय है
किन्तु परिवार में
त्याग अपरिहार्य है

तू धीर-गम्भीर और
कल्याणी बनना
किसी को दुःख दे
ऐसे सपने मत बुनना

वासना की दृष्टि को
शोलों से जलाना
कभी निर्बलता से
नीर ना बहाना

हृदय से कोमल
सबका दुःख हरना
अन्यायी आ जाए तो
शक्ति रूप धरना
लड़की हो इसलिए
सदा सुख बरसाना
किन्तु बिटिया--
- बस लड़की ही
मत रह जाना-
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

8 comments:

रचना said...

किन्तु बिटिया--
- बस लड़की ही
मत रह जाना-

bahut sunder likha hae shobha

mehek said...

हृदय से कोमल
सबका दुःख हरना
अन्यायी आ जाए तो
शक्ति रूप धरना
लड़की हो इसलिए
सदा सुख बरसाना
किन्तु बिटिया--
- बस लड़की ही
मत रह जाना-
sach shobha ji bahut dil ke gehrai tak utar gayi aapki kavita,nari ki komal man bhi aur shakti ka ehsaas bhi,bahut bahut sundar.

रंजू said...

हृदय से कोमल
सबका दुःख हरना
अन्यायी आ जाए तो
शक्ति रूप धरना

आपकी यह कविता मुझे बहुत पसंद आई है शोभा जी यह एक प्रेरणा देती लग रही है

संत शर्मा said...

नारी समाज की रीढ़
सृष्टि का श्रृंगार है
उसकी कमजोरी
सृष्टा की हार है

अन्याय को सहना
स्वयं अन्याय है
किन्तु परिवार में
त्याग अपरिहार्य है

Bahoot unche aur achche vichar. Ek behtar rachna.

संत शर्मा said...
This comment has been removed by the author.
मोहिन्दर कुमार said...

शोभा जी,

बहुत सुन्दर रचना है... स्त्रीयां बहुगुण सम्मपन होती हैं...लज्जा, सहनशीलता जहां नारी के सहज गुण है... वहीं उसकी आपार शक्ति रूप से सब परिचित हैं... लिखती रहें

रश्मि प्रभा said...

bas ladki hi mat rah jaana,
bahut baaten is ek seekh me chupi hai,
bahut sahi arth diye hain-
gr8

मीनाक्षी said...

हृदय से कोमल
सबका दुःख हरना
अन्यायी आ जाए तो
शक्ति रूप धरना ------

स्त्री स्नेह और साहस का रूप है. सन्देश देती हुई प्रभावशाली रचना.