सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, April 25, 2008

एक और संवाद

अनैतिकता बोली नैतिकता से
मंडियों , बाजारों और कोठो
पर मेरे शरीर को बेच कर
कमाई तुम खाते थे
अब मै खुद अपने शरीर को
बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
कमाई खुद खाती हूँ
तो रोष तुम दिखाते हो
मनोविज्ञान और नैतिकता
का पाठ मुझे पढाते हो
क्या अपनी कमाई के
साधन घट जाने से
घबराते हों इसीलिये
अनैतिकता को नैतिकता
का आवरण पहनाते हो
ताकि फिर आचरण
अनैतिक कर सको
और नैतिक भी बने रह सको

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

3 comments:

शोभा said...

रचना जी
गज़ब की कविता लिखी है आपने और सत्य को भी बहुत सटीक रूप में उजागर किया है। पढ़कर आनन्द आ गया। बधाई स्वीकारें ।

anitakumar said...

बड़िया लिखा है

रंजू said...

रचना जी बहुत ही जबरदस्त भाव लिए हुए हैं यह कविता ..अच्छा लगा इस को पढ़ना !