सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, April 19, 2012

औरत और सब्जी --- अपमान रिश्तो का

अब भी कोहनिया जलती हैं
अब भी नमक कम ज्यादा होता हैं
पर
अब बच्चो का थाली फेकना
और
पति का चिल्लाना  
बस वहीँ होता हैं
जहां एक माँ और पत्नी नहीं
एक औरत खाना बनाती हैं

हमारे घर में ऐसी क़ोई
औरत खाना नहीं बनाती
माँ , बेटी , पत्नी और बहू बनाती हैं
जो औरत नहीं हैं
उनको औरत ना कहे

और कहीं औरत देखे
तो घंटी बजा दे ताकि
औरत को इन्सान
वो परिवार समझने लगे

अपमान आप रिश्तो का करते हैं 
जब माँ , बहन , बेटी , पत्नी , बहु को 
महज औरत कह देते हैं 
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!

27 comments:

अरुण चन्द्र रॉय said...

कविता से उपजी कविता... अधिक प्रभावशाली...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपका श्रम सराहनीय है!

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

DR. ANWER JAMAL said...

सुन्दर.

राजीव तनेजा said...

मेरे ख्याल से बच्चे वही करते हैं जैसा घर में होते देखते हैं..अगर घर में पत्नी का आदर नहीं होगा तो बच्चे भी पहले अपनी माँ का ही आदर नहीं करेंगे और बड़े होने पर अपनी अपनी पत्नियों के साथ वही सलूक करेंगे जैसा बचपन से अपने घर में होते देखते आए हैं.. और घर की बेटियां भी अपनी माँ की दशा को देखते हुए इस बात को सहज भाव से अपनी सहमति दे देती हैं कि पराए घर जा कर उन्हें भी यही सब सहना है

इस सब को रोकने की शुरुआत खुद हमें ही करनी होगी अपनी माँ बेटी बहू के प्रति अपने रवैये को बदल कर... सार्थक कविता...

कुमार राधारमण said...

माँ,बहन,बेटी,पत्नी या कि बहू मातृ-शक्ति के रूप है जिसकी उपस्थिति को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है-बात चाहे खाना बनाने की ही क्यों न हो। वे हैं,तो संजीदगी है,सभ्यता है,सौम्यता है,समरसता है। जब-जब हमने उन्हें मामूली समर्थन या प्रोत्साहन भी दिया है-वे हमारी उम्मीदों से कहीं आगे गई हैं। उनसे ही हमारा जीवन है और यह दुनिया भी जीने लायक़। बदले में जो दिया हमने,सोच कर भी शर्मिंदगी होती है।

कुमार राधारमण said...
This comment has been removed by the author.
Vijay Kumar Sappatti said...

मैं राजिव जी के कमेन्ट से १००% सहमत हूँ जी

वन्दना said...

एक बेहद सशक्त व सार्थक कविता स्त्री की दशा को दर्शाती हुई।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

मैंने जिस औरत को देखा है
किचन में बनाती हुई सब्जी
दिन भर के अवसाद
मसालों की तरह
कढाई में भून देती है वो
अपने पति के आगमन
और बच्चों की किलकारियों के लिए.
सारी परेशानियों को
उड़ा देती है भाप की तरह
सीटी बजाते हुए कुकर सी.
गाज़र सी लाल, पालक सी हरी
मटर की तरह दांतों को दिखाती मुस्काती,
परोसती है जब
खाने की मेज़ पर
स्वाद और सेहत से भरी सब्जी नहीं
सब्ज़ परिवार के बागबान की तरह!!

ZEAL said...

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एक बेबाक सच को बयान करती उत्कृष्ट कविता।

९५% पुरुष , माँ हो या पत्नी, उसे मात्र एक मशीनी औरत ही समझते हैं। टिप्पणियों में स्त्री का सम्मान करना एक बात है और दिल में स्त्री का सम्मान करना दूसरी बात। जो अपनी माँ और पत्नी का सम्मान करते हैं वे दुसरे पुरुषों की पत्नियों का भी सम्मान करते हैं , लेकिन अफ़सोस जब मौक़ा आता है तो ये तुच्छ मानसिकता का परिचय दे ही डालते हैं।

पुरुष सिर्फ छलता है , शब्दों के मकडजाल में फंसाकर स्त्री के सम्मान और अस्मिता को लूटता है। उसकी भावुकता और संवेदनशीलता के साथ खिलवाड़ करता है।

स्त्रियों को ईश्वर ने बहुत विराट व्यक्तित्व दिया है , अतः स्त्रियों को चाहिए की वे पुरुष को सब कुछ दें , सिवाय अपने दिल के। भूल से भी इन पर विश्वास ना करें ।

स्त्रियों को चाहिए की वे पुरुष को उसकी अज्ञानता के लिए क्षमा करती रहे । ( क्षमा बड़ों को ही शोभा देती है)

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कविता रावत said...

bahut badiya sarthak rachna...
aabhar!

Dr.NISHA MAHARANA said...

अपमान आप रिश्तो का करते हैं....sahi bat...

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

amrendra "amar" said...

bahut hi utkrist rachna.badhai

indianrj said...

ज़रा सोचिये, अगर वो स्त्री कमाती भी हो फिर भी घर में उसे ATM , नौकरानी, बच्चों के स्कूल homework में मदद करने वाली और तमाम शादी ब्याह में लेन-देन की ज़िम्मेदारी थोपकर दो शब्द ये भी न कहे जाते हों कि तुम कितना कुछ करती हो, तो जानते हैं, कभी-२ उस स्त्री को घर का इतना काम करके ये सोचना पड़ता है, आखिर प्राण-पखेरू उड़ने के लिए खुद को और कितना थकाने की ज़रुरत होगी.

शिवनाथ कुमार said...

माँ, बहन, बेटी हो या बहु सबको सम्मान दिया जाना चाहिए ...
सुंदर भाव, सुंदर कृति .....

आशा जोगळेकर said...

माँ बहन बेटी, बहू यो औरत सबका सम्मान हो ।
नारी के सम्मान की कविता ।

Karuna Saxena said...

बहुत ही प्रशंसनीय प्रस्तुति..
सार्थक कविता....

Samar said...

उस दिन का इन्तेजार है जब इतने सादा बिम्बों में इतना ज्यादा दर्द न हो. उस दिन का भी जब जादू तो औरत के हाथ में है कहते हुए सारे लोग दुनिया के तमाम नामचीन 'शेफ' के मर्द होने की बात भूल जाते हैं.

Samar said...

उस दिन का इन्तेजार है जब इतने सादा बिम्बों में इतना ज्यादा दर्द न हो. उस दिन का भी जब जादू तो औरत के हाथ में है कहते हुए सारे लोग दुनिया के तमाम नामचीन 'शेफ' के मर्द होने की बात भूल जाते हैं.

DrZakir Ali Rajnish said...

Jeevan ka katu satya...
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कितनी बदल रही है हिन्दी!

आनन्द विक्रम त्रिपाठी said...

नारी सृष्टि की असली रचयिता है ,नारी के बारे में अब इससे ज्यादा कुछ कहने की मेरी हिम्मत नहीं है |

आशा जोगळेकर said...

नारी का अपमान करने वाले स्वयं अपना ही अपमान करते हैं और अपने को नीचे गिराते हैं ।

Always Unlucky said...

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From India

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

सुंदर रचना
क्या कहने

शोभा said...

sach likha hai