सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Saturday, February 1, 2014

फ़र्ज़ का अधिकार

इस पुरुष प्रधान समाज में
सदा सर्वोपरि रही
बेटों की चाह
उपेक्षा, ज़िल्लत, अपमान से
भरी रही
बेटियों की राह
सदियों से संघर्षरत रहीं
हम बेटियाँ
कई अधिकार सहर्ष तुम दे गए
कई कानून ने दिलवाए
बहुत हद तक मिल गया हमें
हमारी बराबरी का अधिकार
जन्म लेने का अधिकार
पढने का,
आगे बढ़ने का अधिकार
जीवन साथी चुनने का अधिकार
यहाँ तक कि
कानून ने दे दिया हमें
तुम्हारी संपत्ति में अधिकार
लेकिन .....
हमारे फर्जों का क्या?
आज भी बेटियाँ बस एक दायित्व हैं
आज भी हैं केवल पराया धन
हर फ़र्ज़ केवल ससुराल की खातिर
माँ-बाप के प्रति कुछ नहीं?
बुढ़ापे का सहारा केवल बेटे,
बेटियाँ क्यूँ नहीं?
क्यूँ बेटी के घर का
पानी भी स्वीकार नहीं?
क्यों बुढ़ापे का सहारा बनने का
बेटियों को अधिकार नहीं?
सामाजिक अधिकार मिल गए बहुत
आज अपनेपन का आशीर्वाद दो
कहती है जो बेटियों को परायी
उस परंपरा को बिसार दो
हो सके तो मुझको, मेरे
फ़र्ज़ का अधिकार दो
मुझको मेरे फ़र्ज़ का अधिकार दो
........................................आलोकिता

9 comments:

anil uphar said...

lajvab

प्रेम सरोवर said...

आपको पोस्ट पर पहली बार आय़ा हूं। इस पोस्ट पर आना सार्थक हुआ। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत रहेगा। धन्यवाद।

Jain Nath said...

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Namrata Kumari said...

Sach hai... sab kuchh mila par farz ka adhikaar nahi.

Rashmi Swaroop said...

Beautiful आलोकिता… :)
सच है… तकलीफ़देह… persistent unacceptable सच..

anamika ghatak said...

lajwab kar diya ....umda

अशोक कुमार सहनी said...

सुन्दर लगा

Rekha. shrivastva said...

सुंदर और सार्थक पोस्ट मन हर्षित हो गया पढ़कर