सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Friday, March 23, 2012

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?

जी आपके स्नेह से अभिभूत हूँ किन्ही कारणों से मैंने सभी साझा ब्लोग्स छोड़ दिए हैं और सबसे खुद को अलग कर लिया है ये मेरे निजी कारण हैं ........अब नारी ब्लॉग पर भी मैं नहीं हूँ इसलिए वहाँ पोस्ट तो नहीं कर सकती हाँ आपको भेज सकती हूँ आप यदि चाहें तो मेरे नाम के साथ वहाँ इसे लगा सकती हैं .........उम्मीद है आप बुरा नहीं मानेंगी .

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?


यहाँ ज़िन्दा कौन है

ना आशा ना विमला

ना लता ना हया

देखा है कभी

चलती फिरती लाशों का शहर

इस शहर के दरो दीवार तो होते हैं

मगर कोई छत नहीं होती

तो घर कैसे और कहाँ बने

सिर्फ लाशों की

खरीद फरोख्त होती है

जहाँ लाशों से ही

सम्भोग होता है

और खुद को वो

मर्द समझता है जो शायद

सबसे बड़ा नामर्द होता है

ज़िन्दा ना शरीर होता है

ना आत्मा और ना ज़मीर

रोज़ अपनी लाश को

खुद कंधे पर ढोकर

बिस्तर की सलवटें

बनाई जाती हैं

मगर लाशें कब बोली हैं

चिता में जलना ही

उनकी नियति होती है

कुछ लाशें उम्र भर होम होती हैं

मगर राख़ नहीं

देखा है कभी

लाशों को लाशों पर रोते

यहाँ तो लाशों को

मुखाग्नि भी नहीं दी जाती

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?



सादर आभार

वन्दना गुप्ता

सर्वाधिकार सुरक्षित!

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
आपको नव सम्वत्सर-2069 की हार्दिक शुभकामनाएँ!

udaya veer singh said...

क्या बात है ... खुबसूरत सृजन / शुभकामनायें नव वर्ष व रचना-रचनाकार को /

आशा जोगळेकर said...

इतनी मायूसी !!!!!

Anita said...

मर्मस्पर्शी रचना !
इसको अच्छी कहें... या दिल दुखाने वाली... समझ नहीं आता...~ बहुतों के दर्द को आपने अपनी रचना में समेट लिया..
~सादर!!!