सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, August 7, 2008

मुझे मत जलाओ

बाल किशन जी की ये कविता हम अतिथि कवि की कलम से के तहत पोस्ट कर रहे हैं ।
हिन्दी ब्लॉगर बाल किशन जी यदा कदा नारी आधरित विषयों पर लिखते रहे हैं । इस कविता को यहाँ पोस्ट करके हम शायद बस इतना कर रहे के की उनके कलम से निकली "अपनी बात को " एक बार फिर दोहरा रहे हैं ।
आप जरुर पढे और अपना कमेन्ट भी दे । किसी ने सही ही कहा हैं कविता साहित्यकार की जागीर नहीं है , कविता आत्मा से आती हैं और आत्मा को भिगो जाती हैं । साहित्यकार के पास सुंदर शब्दों का भण्डार होता हैं जो मन के भावो को "मीटर" मे बंधता हैं । शब्दों को बांधने पर क्या मन को बंधा जा सकता हैं , पता नहीं पर कविता बहुत कुछ कह रही हैं सो सुने बालकिशन जी के शब्दों की आवाज ।

मुझे मत जलाओ!

एक दिन कि बात है शान्ति की खोज में भटकता
मैं भूतों डेरे से गुजर रहा था
सहसा मैंने सुनी एक अबला की चित्कार
करुण स्वर में पुकार रही थी वो बारम्बार
मुझे मत जलाओ! मुझे मत जलाओ! मुझे मत जलाओ!

मैं दौड़ कर पंहुचा उस पार
कुछ समझा कुछ समझ नही पाया
करुण से भी करुण स्वर में
सुनी मैंने करुना की पुकार
मुझे मत जलाओ! मुझे मत जलाओ! मुझे मत जलाओ!

देखा उधर तो देखता ही रहगया एक बार
एक चिता थी जल रही
दूसरी को वे कर रहे थे जबरदस्ती तैयार
मैंने क्रोध से पूछा
ये तो मर गया पर ये किसलिए तैयार
एक बोला- यह उसकी पत्नी है
इसलिए इसे जलने का अधिकार
और ये जलने को तैयार
कुछ देर बाद ये जल जायेगी
फ़िर अमर....... कहलाएगी.

दूसरा बोला- जी कर भी क्या करेगी
कभी चुडैल, कभी डायन तो
कभी कुलभक्षानी के पहनेगी अलंकार
इसलिए जलना ही इसकी मुक्ति का आधार
और ये जलने को तैयार

तीसरा बोला- जलना तो इसकी किस्मत है
कभी दहेज़ के लिए जलेगी,
कभी सतीत्व की गरिमा पाकर
करेगी इस संसार पर उपकार
इसलिए ये जलने को तैयार.

क्रोध हवा हुआ भय मन में समाया
आत्मा काँप उठी बदन थरथराया
कुछ सोच ना सका, कुछ कह ना सका ,कुछ कर ना सका
एक कीडे की भांति रेंगता घर लौट आया.

अब तो शायद हर रोज सुनता हूँ ये चित्कार, ये पुकार
और सिर्फ़ सोचता भर हूँ कि
कंही कुछ खो सा गया है।
कंही कुछ खो सा गया है।
कंही कुछ खो सा गया है.

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

9 comments:

अनुजा said...

अच्छी कविता है। पसंद आई।

बाल किशन said...

बहुत बहुत आभार इसे यंहा प्रस्तुत करने के लिए.

Shiv Kumar Mishra said...

दो दिन पहले ही पढ़ी थी बालकिशन जी की यह कविता.
आज पुनः पढ़ने मिली.
झकझोर दिया इस कविता ने. कई सवाल भी खड़े करती है समाज के लिए.
हम सब को इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बाल किशन जी आपकी लिखी यह कविता दिल को छू जाती है ..

प्रभाकर पाण्डेय said...

हृदयस्पर्शी, मार्मिक और विचारणीय रचना।

मीनाक्षी said...

मर्मस्पर्शी कविता...कवि के प्रश्न " मैंने क्रोध से पूछा- ये तो मर गया पर ये किसलिए तैयार" ने मन मे हलचल पैदा कर दी..जवाब से मन तिलमिला गया...

रंजना said...

bahut hi sundar marmshparshi rachna ........

Rekha Srivastava said...

एक बेबाक सच, जो एक भोगा हुआ यथार्थ है, नारी के जीवन का शायद समाज कि नजरों में यही एक शास्त्रार्थ है.

Rekha Srivastava said...

शिव कुमार जी, इन सवालों के जवाब हम कहाँ तलाशेंगे, इस समाज में - क्या हम समाज का अंग नहीं है फिर क्यों समाज हम जैसे को धता बता कर इन्हें जलाता ही जा रहा है.