सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, August 21, 2008

प्रगाढ़ संबंधो की पीड़ा

कभी सुख कभी दुःख
कभी आंसू कभी हसीं
वह लेते रहे
वह देती रही
सम्बन्ध प्रगाढ़ रहे
साथ पर ना वह रहे
प्रगाढ़ संबंधो मे
ना बाँट सकने कि
पीड़ा को
वह महसूसती रही
वह खामोश देखते रहे



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4 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही है

Anwar Qureshi said...

पीड़ा को सही दर्शया है आप ने ..कभी फुर्सत मिले तो हमे भी पढियेगा ..धन्यवाद ..

neelima garg said...

relations are difficult to maintain....

Manvinder said...

sambhandho ko sahi pesh kiya hai aapne