सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Sunday, August 1, 2010

गांधारी की पीड़ा


क्यूँ नहीं कोई समझा मेरी पीड़ा
जब मैने आँख पर पट्टी बाँध कर
किया था विवाह एक अंधे से ।
पति प्रेम कह कर मेरे विद्रोह को
समाज ने इतिहास मे दर्ज किया ।
और सच कहूँ आज भी इस बात का
मुझे मलाल हैं कि ,
मेरी आँखों की पट्टी का इतिहास गवाह हैं
पर
ये सब भूल गए कि मैने
विद्रोह का पहला बिगुल बजाया था
बेमेल विवाह के विरोध मे ।
मेरी थी वो पहली आवाज
जिसको दबाया गया
और इतिहास मे , मुझे जो मै नहीं थी
वो मुझे दिखाया गया ।




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6 comments:

कविता रावत said...

ये सब भूल गए कि मैने
विद्रोह का पहला बिगुल बजाया था
बेमेल विवाह के विरोध मे ।
मेरी थी वो पहली आवाज
जिसको दबाया गया
और इतिहास मे , मुझे जो मै नहीं थी
वो मुझे दिखाया गया ।
....Naari ka ek maun vidroh vastav mein jo us jamane mein Ghandari ne kiya tha, use vismirt karna ithaskaro par prshnchinh hai..
Naari man kee es trasadi ko aapne bahut achhi tarah prastut kiya hai.. aabhar

वन्दना said...

नारी के मौन विद्रोह की उत्तम अभिव्यक्ति।
कल (2/8/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

nilesh mathur said...

कमाल कि अभिव्यक्ति, बहुत सुन्दर!

Virendra Singh Chauhan said...

padhker achha lagaa. Pahli baar aapke blog par aaya hun . Aaker achha lagaa.

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत सही लिखा है, वह एक मौन विद्रोह ही तो था, वह कभी भी अपने पति की लालसा या पुत्र की राजनीति के समर्थक नहीं रही. उनके द्वारा बजाये गए बिगुल के ध्वनि को सही शब्दों में ढाला है.

neelima garg said...

good n different analysis....