सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Sunday, December 7, 2008

तस्वीर का दूसरा रुख

जब ही कोई औरत कपडे उत्तार कर
तस्वीर अपनी खिचाती हैं
सबको नग्नता उसमे नहीं
उसके काम मे नज़र आती हैं
पर उसकी नग्न तस्वीर
ना जाने क्यों ? ऊँचे दामो मे
मन बहलाव के लिये खरीदी जाती हैं ।
अभी ना जाने और कब तक
मन के कसैले पन को
भूलने के लिये लोग तेरी तस्वीर
अपने घरो , कमरों , दीवारों पर टांगेगे
किसी भी उम्र के हो वो
पर औरत की तस्वीर
यानी एक मन बहलाव का साधन
कभी किताबो मे , कभी पोस्टर मे
और कभी ब्लॉग पर घूमती हैं
तस्वीरे औरतो की

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

2 comments:

mehek said...

ye bhi ek dardnaak satya hai.

विजयलक्ष्मी सिंह said...

बहुत अच्छी कविता।