सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, February 2, 2011

हाँ , तुम नारी हो , तो ??

क्यो तुम लड़ती रहीं
क्यो तुम जूझती रहीं
क्यो तुम चाहती रही
बदलना मानसिकता औरो की

क्या फरक हैं फिर तुममे और उनमे
मत जुझो , मत लडो
मत और समय अपना बरबाद करो
मत बदलो किसी की मानसिकता
हो सके तो बदलो अपनी मानसिकता

जियो उस स्वतंत्रता को जो
ईश्वरिये देन हैं ,
जो नहीं कोई और तुम्हे देगा

नारी हो नारी ही बन कर रहो


प्यासी हो तो पानी पीयो
भूखी हो तो खाना खाओ
पर मत लडो , मत जुझो
और नारी होने के एहसास से सम्पूर्णता पाओ


अधूरी तुम नहीं हो , क्योंकी तुम जिनसे लड़ती हो
उनके अस्तिव की तुम ही तो जननी हो


तुम ख़ुद आक्षेप और अवेहलना करती हो
अपनी इच्छाओं की ,
कब तक अपनी कमियों का दोष
दूसरो पर डालोगी
समय जो बीत जाता है लौट कर नहीं आता है

3 comments:

शिखा कौशिक said...

right message with right vision...

anshumala said...

wah bahut achchi kawita pahali bar aap ki kawita padhi hai

प्रदीप कुमार said...

bahut hi achha..