सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता
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Saturday, November 13, 2010

सच हूँ मैं

सच हूँ मैं
एक शाश्वत
कोई बेजान साया नहीं हूँ .
संपदा किसी की
या कोई सरमाया नहीं हूँ.

धडकता है एक दिल
 मेरे भी सीने में
पाना चाहती हूँ मै भी वह ख़ुशी,
जो मिलती है उन्मुक्त जीने में

तुम समझते हो मुझे अपनी जागीर
तो यह तुम्हारी ही भूल है.
नही जान पाए मेरे खाबों की ताबीर
 तो यह तुम्हारी ही भूल है.

मेरे खाबों में,
जीवन की बुनियादों में
भले ही रंग भरना न भरना.
पर फिर मुझे साया
 या अपना सरमाया
समझने की गलती न करना.

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Monday, August 9, 2010

ज़रूर आएगा

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित


अंदर-अंदर टूटन
अंतर में घुटन
और मुख पर मुस्कान,
खुशियाँ लुटाना
आदत-सी बन गई है!
इसी आशा में,
इसी प्रत्याशा में
कि शायद
वो एक दिन आएगा
ज़रूर आएगा,
जो नारी को
उसके अस्तित्व की
पहचान कराएगा,
आदर दिलाएगा
उसके अंतर की पीड़ा से
समाज तिलमिलाएगा!
और समाज के
सहृदय जन
एक दिन महसूस करेंगे
उसकी छटपटाहट को,
देंगे नारी को
उसकी पहचान,
देंगे उसे सम्मान
और जीने का अधिकार,
क्योंकि नारी
टूटकर भी
सदैव रही है संपूर्ण!
पक्का भरोसा है उसे
कि एक दिन आएगा,
ज़रूर आएगा
जब खोया हुआ अतीत
होगा उजागर!
इंतज़ार है उसे
उस दिन का
जो उसे न्याय दिलाएगा
देखते हैं,
कब आएगा
वह भाग्यशाली एक दिन!

डॉ.मीना अग्रवाल