सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, June 29, 2011

सृष्टि में एक नारी,





धरती पर जीवन रचने की भावना जब आई 
तब प्रभु ने औजार छोड़कर तूलिका उठाई.
सेवक ने तब प्रभु से पूछा ऐसे क्या रचोगे,
औजारों का काम आप इससे कैसे करोगे?
बोले प्रभु मुझको है बनानी सृष्टि में एक नारी,
कोमलता के भाव बना न सकती कोई आरी.
पत्थर पर जब मैं हथोडी से वार कई करूंगा,
ऐसे दिल में प्यार के सुन्दर भाव कैसे भरूँगा?
क्षमा करुणा भाव हैं ऐसे उसमे तभी ये आयेंगे,
जब रंगों के संग सिमट कर उसके मन बस जायेंगे.
इसीलिए अपने हाथों में तूलिका को थामा,
पहनाने दे अब मेरी योजना को अमली जामा. 
            शालिनी कौशिक 

6 comments:

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर...

शिखा कौशिक said...

man ko chhoo gayi aapki kavita .aabhar

मीनाक्षी said...

सरल सहज भाव से कितने कोमल भाव दिखा दिए..भावभीनी रचना..

Mukesh Kumar Mishra said...

बहुत सुन्दर रचना.........
कोमल भावों को बहुत कोमलता से पिरोया है........

Vishnukant Mishra said...

ati sundar kavita.
srasti ki anupm rachna hai nari,mamta prem shrdha ki nidhi hai nari,isko kahey bechara jo bhi, un sb pr bhari hai nari.

ana said...

ek alhada soch liye hue kavita....utkrisht rachana