सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Tuesday, April 5, 2011

टुकड़ा टुकड़ा आसमान

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अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?

साधना वैद

13 comments:

अनामिका की सदायें ...... said...

dosh na maa ka hai na beti ka...dosh hamare desh, hamare samaaj, hamare pariwar ki soch ka hai...lekin shuruat nari ko hi karni padegi ye uska adhikar hai.

Er. सत्यम शिवम said...

समाजिक परिवेश में नारी के मर्म को बताती सुंदर रचना....दिल व्यथीत हो जाता है...बेटियाँ तो अपने उज्जवल भविष्य की संरचना है।

rashmi ravija said...

अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?

ओह!! लड़कियों के इस सवाल का जबाब है किसी के पास
बहुत ही संवेदनशील रचना

मीनाक्षी said...

जब तक औरत खुद के लिए टुकड़ा टुकड़ा आसमान नहीं सहेजेगी..जब तक खुद के लिए अमृतकलश की कामना नहीं करेगी...जब तक खुद अपनी तस्वीर में रंग नहीं भरेगी तब तक बेटी का भविष्य सुरक्षित नही होगा...

रश्मि प्रभा... said...

अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
...
ek maa ke bhay ke aage is prashn ka uttar uski hichkiyaan hongi... prashn samaj ke tathakathit varg se hi poochna hoga

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (7-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?

माँ बेचारी क्या करे ? घर परिवार कि सोच के आगे उसको अपनी भावनाओं का गला घोटना पड़ता है ..ऐसे प्रश्नों का उत्तर समाज को देना चाहिए ...पर बेटी भी किससे पूछे वो तो माँ के स्पर्श को ही जान पायी है न ...बहुत संवेदनशील रचना ..

vandana said...

जुड़ने से पहले ही टूट जाते हैं सपने ....संवेदनशील रचना

udaya veer singh said...

khaskar asian region men stri ka jitana apman , upeksha , shoshan dharmik ,samajik ,va vaidhanik rup sehua hai ,bilkul kshamy nahin swikary nahin . apka kavy un paristhitiyo ki vedana ka marmik chitran pratit hota hai . ye bhed aur vishamata kyon hai . sochana hoga . sunde kavy -darshan ke liye dhanyvad .

आशा said...

माँ से अपनी समस्या का निराकरण करने के लिए एक बेटी के प्रश्न बहुत अच्छे लगे
बधाई
आशा

Amrita Tanmay said...

stri hona hi dosh hai..kasar samaj pura kar deta hai...achchhi rachana

ana said...

nice poem

ana said...

nice poem