सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Thursday, November 20, 2008

कर्म करो कुछ ऐसे!

यदि नारी हो
तो क्या?
निर्बल मत बनो,
याचना के लिए
कर मत उठाओ,
कर्म कर उन्हें
सार्थक बनाओ ।
कर्म कभी होता निष्फल नहीं,
कम कभी अधिक भी देता है,
जन्म लेने की यही सार्थक दिशा होगी
ममता का जो सागर
ईश्वर ने दिया है
सिक्त कर प्रेम से
खुशी कुछ चेहरों पर लाओ
कभी इन हाथों से
उठाकर सीने से लगाओ
कभी इन हाथों से
आंसू किसी के सुखाओ
दीप एक आशा का
कर्म कर सबमें जगाओ
ज्योति उनके भी
मन में जलाकर
नई दिशा सबको दिखाओ
सोचो एक दीप जलाकर
प्रकाश कितनों को देता है
स्वयं को मिटा कर
रास्ता दिखा जाता है
हमसे सार्थक वही,
मनुज बनकर हम भी
क्यों न सार्थक हों।

6 comments:

रचना said...

मनुज बनकर हम भी
क्यों न सार्थक हों।


BAHUT SAHII AUR SUNDER

परमजीत बाली said...

सोचो एक दीप जलाकर
प्रकाश कितनों को देता है
स्वयं को मिटा कर
बहुत सुन्दर!

seema gupta said...

निर्बल मत बनो,
याचना के लिए
कर मत उठाओ,
कर्म कर उन्हें
सार्थक बनाओ ।
" yes, very well said, impressive words"

Regards

Akshaya-mann said...

सोचो एक दीप जलाकर
प्रकाश कितनों को देता है
स्वयं को मिटा कर
NICE LINES.............

*KHUSHI* said...

सोचो एक दीप जलाकर
प्रकाश कितनों को देता है
स्वयं को मिटा कर
रास्ता दिखा जाता है

^ naari ka yehi to astitva hai... alag alag roop mai unka yehi dharm hai

bahut hi sudndar rachna

Vijay Kumar Sappatti said...

Aaj pahli baar aapke blog par aaya hoon , pad kar bahut accha laga.

bahut bahut badhai .

main bhi poems likhta hoon , kabhi mere blog par bhi aayiye.
my Blog : http://poemsofvijay.blogspot.com


regards

vijay