ये पोस्ट कविता वाचक्नवीजी की मेहनत हैं । आप भी पढे और अपने विचार दे
बचपन में खेलते खेलते या खाते-खाते, या कई बार सोते में ही (मुख्य तो यही क्रम होता है, उस उम्र में) एक आवाज, बल्कि आवाज़ भी क्या चीत्कार सुनाई पड़ा करती थी, यह चीत्कार इतनी भयंकर व इतनी तीखी होने के साथ साथ इतनी दीर्घकालिक होती कि कई बार उस चीखने वाले/वाली से ही घृणा से भर जाता मन।उस चीख /चीत्कार की खोज में दौड़ते एक दिन पाया कि .... की बस्ती के कुछ लोग एक सूअर/ सूअरी को पकड़ने के लिए धड़े व दल में उस मोहल्ले से इस मोहल्ले तक की घेरेबंदी वाली दौड़ लगा रहे हैं और हमें घृणित प्रतीत होने वाला वह प्राणी भाग भाग कर बेहाल दुरावस्था में है| हर बार अंत में वह पकडा जाता /जाती। अंत उसका यही होता कि उस बिरादरी के लोगों के यहाँ होने जा रहे आयोजन के लिए उसे जिंदा जला कर भूना जाता। वह पूरी प्रक्रिया तो जान ने का कभी दुस्साहस नहीं हो पाया किंतु उसके चारों पैर बाँध कर उसे अग्नि के हवाले किए जाते तक देखा। भीषण दृश्य होता था। हवा में दुर्गन्ध व चीत्कारें। कई कई रात डर व पीड़ा में कांपते गुजरते। बचपन बीता, घर छूटा और वह चीत्कार व दृश्य भी।
गत दिनों एक ऐसे यथार्थ से आँखें फटी रह गईं कि वह बचपन का दृश्य उस दिन से बार बार डरपा रहा है, यादों में उमड़ा आ रहा है। आज के एक भीषण यथार्थ को प्रस्तुत करती कविता के लिए जब मैंने तत्सम्बन्धी वास्तविकताओं के चित्र देखे तो तब से हाथ- पैर बँधी एक स्त्री का चित्र ठीक उस सूअरी की याद दिलाता है, जिसे जिंदा आग में झोंक दिया जाता था और उसके तड़फड़ा कर आग से बाहर उलट/ झपट पड़ने की आशंका को दूर करने के लिए चारों और लोग उसे डंडे से ताने आग पर सेंकते रहते, धकेलते रहते। यदि किसी स्त्री को आज के युग में आप ऐसी अवस्था में देखें तो क्या हो मन की स्थिति ? ऐसी ही कष्ट में बेहाल स्त्रियों के चित्र देख मेरे रोंगटे खड़े हो गए, उनकी पीड़ा से त्रस्त हूँ .
चित्र के लिए तो वहीं जाना होगा ( वहाँ पहला चित्र ), किंतु इस पीड़ा को ऋषभदेव जी ने जो शब्द दिए हैं उन्हें मैं अपनी पसंद के रूप में आप को यहीं पढ़वा रही हूँ --
औरतें औरतें नहीं हैं !
-ऋषभ देव शर्मा
वे वीर हैं
मैं वसुंधरा.
उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
'वीर भोग्या वसुंधरा.'
वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
भोगते आए हैं,
उनकी विजयलिप्सा अनादि है
अनंत है
विराट है.
जब वे मुझे नहीं जीत पाते
तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
दिखाते हैं अपनी वीरता.
युद्ध कहने को राजनीति है
पर सच में जघन्य अपराध !
अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
औरतों के खिलाफ !
युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
उनके वस्त्र उतारे जाते थे
बाल खींचे जाते थे
अंग काटे जाते थे
शील छीना जाता था ,
आज भी यही सब होता है.
पुरुष तब भी असभ्य था
आज भी असभ्य है,
तब भी राक्षस था
आज भी असुर है.
वह बदलता है हार को जीत में
औरतों पर अत्याचार करके.
सिपाही और फौजी
बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.
औरते या तो मर जाती हैं
[ लाखों मर रही हैं ]
या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
..
वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !
वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
मेरी आँखों के आगे.
पति की आँखों के आगे
पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
माता-पिता की आँखों आगे
कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.
एक एक औरत की जंघाओं पर से
फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !
औरतें औरतें हैं
न बेटियाँ हैं, न बहनें;
वे बस औरतें हैं
बेबस औरतें हैं.
दुश्मनों की औरतें !
फौजें जानती हैं
जनरल जानते हैं
सिपाही जानते हैं
औरतें औरतें नहीं होतीं
अस्मत होती हैं किसी जाति की.
औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
औरतें हैं अस्मिता
औरते हैं आज़ादी
औरतें गौरव हैं
औरतें स्वाभिमान.
औरतें औरतें नहीं
औरतें देश होती हैं.
औरत होती है जाति
औरत राष्ट्र होती है.
जानते हैं राजनीति के धुरंधर
जानते हैं रावण और दुर्योधन
जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
जानते हैं हिटलर और याहिया
कि औरतें औरतें नहीं हैं,
औरतें देश होती हैं.
औरत को रौंदो
तो देश रौंदा गया ,
औरत को भोगो
तो देश भोगा गया ,
औरत को नंगा किया
तो देश नंगा होगा,
औरत को काट डाला
तो देश कट गया.
जानते हैं वे
देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
जब तक स्वाभिमान बचा रहे!
इसीलिए
औरत के जननांग पर
फहरा दो विजय की पताका
देश हार जाएगा आप से आप!
इसी कूटनीति में
वीरगति पा रही हैं
मेरी लाखों लाख बेटियाँ
और आकाश में फहर रही हैं
कोटि कोटि विजय पताकाएँ!
इन पताकाओं की जड़ में
दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
बच्चियों की
उनकी माताओं की
उनकी दादियों-नानियों की.
उन सबको सजा मिली
औरत होने की
संस्कृति होने की
सभ्यता होने की.
औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!
औरत को जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना,
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना,
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,
इसीलिए तो
उनके लिए
औरतें ज़मीनें हैं;
वे ज़मीन जीतने के लिए
औरतों को जीतते हैं!





